मुलायम सिंह यादव की सरकार बचाकर कांग्रेस ने यूपी में खोया जनाधार? 1990-91 का वह सियासी मोड़
Mohammad Naved
•
2026-09-25 14:08:32
Location | Date
लखनऊ | 25 सितंबर 2026
By Mohd Naved
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव का पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल एक ऐसे दौर में शुरू हुआ, जब राज्य की सियासत में कांग्रेस का पुराना दबदबा टूट रहा था और जनता दल तथा भाजपा तेजी से उभर रहे थे। 1989 के विधानसभा चुनाव में जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से दूर रही। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और उनकी सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया।
करीब एक साल बाद राजनीतिक हालात तेजी से बदले। राम मंदिर आंदोलन और एलके आडवाणी की रथयात्रा की पृष्ठभूमि में भाजपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद कांग्रेस ने मुलायम सरकार को समर्थन दिया और उनकी सरकार को तत्काल गिरने से बचाया।
बाद में कांग्रेस ने केंद्र में चंद्रशेखर सरकार से भी समर्थन वापस लिया और उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार का समर्थन भी समाप्त कर दिया। इसके बाद 1991 में विधानसभा चुनाव हुए और भाजपा ने 221 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
इसी राजनीतिक घटनाक्रम को बाद के विश्लेषणों में कांग्रेस के उत्तर प्रदेश में कमजोर होते आधार से जोड़कर देखा गया है। हालांकि इसे कांग्रेस का अपना 'डेथ वारंट' कहना एक राजनीतिक व्याख्या है, कोई आधिकारिक तथ्य या चुनावी निष्कर्ष नहीं।
1989 में कांग्रेस का पुराना किला हिला
1989 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा मोड़ था। 425 सदस्यीय विधानसभा में जनता दल 208 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बना। कांग्रेस 94 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा ने 57 सीटें जीतीं।
जनता दल बहुमत के लिए जरूरी 213 सीटों से केवल पांच सीट दूर था। पार्टी ने मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री चुना। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उनका पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल 1989 से 1991 तक रहा।
मुलायम सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया। उस समय केंद्र में भी राजनीतिक समीकरण कुछ इसी तरह के थे, जहां वीपी सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन हासिल था।
भाजपा का समर्थन और फिर बड़ा राजनीतिक टकराव
1990 में अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन की राजनीति ने राष्ट्रीय और उत्तर प्रदेश की सियासत को प्रभावित किया। अक्टूबर 1990 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने एलके आडवाणी की राम रथयात्रा रोककर उन्हें गिरफ्तार कराया।
इसके बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया। उत्तर प्रदेश में भी मुलायम सिंह यादव की सरकार के सामने संकट खड़ा हुआ। भाजपा ने यहां से भी समर्थन वापस ले लिया।
अब मुलायम सरकार के पास बहुमत बनाए रखने के लिए नया सियासी सहारा तलाशने की जरूरत थी।
कांग्रेस ने बचाई मुलायम सरकार
जनता दल के भीतर विभाजन के बाद मुलायम सिंह यादव चंद्रशेखर के नेतृत्व वाले धड़े के साथ चले गए। केंद्र में चंद्रशेखर सरकार बनी और कांग्रेस ने उसे बाहर से समर्थन दिया।
उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस ने मुलायम सिंह यादव की सरकार को समर्थन दिया। इस समर्थन से मुलायम सरकार सत्ता में बनी रही। Indian Express के राजनीतिक इतिहास के अनुसार कांग्रेस ने नवंबर 1990 में चंद्रशेखर सरकार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार को भी समर्थन दिया था।
इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि कांग्रेस, जो 1989 में सत्ता से बाहर हो चुकी थी, अब सीधे सरकार चलाने के बजाय बाहर से समर्थन देकर सत्ता के समीकरण को प्रभावित कर रही थी।
कांग्रेस के भीतर भी था मतभेद
मुलायम सरकार को समर्थन देने का फैसला कांग्रेस के भीतर पूरी तरह सहज नहीं था। फरवरी 1991 में प्रकाशित India Today की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक हिस्से में मुलायम सिंह यादव की सरकार को समर्थन जारी रखने को लेकर असंतोष था।
रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 1991 में प्रदेश कांग्रेस की संसदीय बोर्ड ने समर्थन वापस लेने की सिफारिश की थी। इसके कुछ दिन बाद केंद्रीय नेतृत्व ने यथास्थिति बनाए रखने का फैसला किया। उस समय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बने संकटों के बीच राज्य में राजनीतिक अस्थिरता से बचने का तर्क भी सामने आया था।
इससे साफ होता है कि कांग्रेस का समर्थन केवल यूपी के स्थानीय समीकरण का मामला नहीं था। इसके पीछे राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र की सरकार का समीकरण भी जुड़ा हुआ था।
फिर कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया
मुलायम सिंह यादव की सरकार कांग्रेस के समर्थन पर चलती रही, लेकिन यह गठजोड़ स्थायी नहीं था।
केंद्र में चंद्रशेखर सरकार और कांग्रेस के बीच संबंध बिगड़े। कांग्रेस ने केंद्र से समर्थन वापस लिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश में भी मुलायम सरकार का समर्थन खत्म हो गया। परिणामस्वरूप विधानसभा भंग हुई और 1991 में मध्यावधि चुनाव हुए।
यहां से उत्तर प्रदेश की राजनीति ने एक और बड़ा मोड़ लिया।
1991 में भाजपा को मिला बहुमत
1991 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 221 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। जनता दल 92 और कांग्रेस 46 सीटों पर रह गई।
1989 की तुलना में भाजपा की सीटों में 164 सीटों की बढ़ोतरी हुई। इसके विपरीत कांग्रेस की सीटें 94 से घटकर 46 रह गईं। जनता दल भी 208 से घटकर 92 सीटों पर पहुंच गया।
इस चुनाव के बाद कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई। Indian Express के अनुसार 1991 का चुनाव मंडल और राम मंदिर की राजनीति के बीच हुए बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन का हिस्सा था।
क्या कांग्रेस ने सचमुच अपना 'डेथ वारंट' साइन किया था?
यहां तथ्य और राजनीतिक व्याख्या के बीच फर्क जरूरी है।
यह तथ्य है कि कांग्रेस ने 1990 में मुलायम सिंह यादव की सरकार को समर्थन दिया। यह भी तथ्य है कि बाद में कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया और 1991 के चुनाव में कांग्रेस की सीटें 94 से घटकर 46 रह गईं। उसी चुनाव में भाजपा 57 से बढ़कर 221 सीटों पर पहुंची।
लेकिन यह कहना कि मुलायम सरकार को समर्थन देना ही कांग्रेस के उत्तर प्रदेश में पतन का एकमात्र कारण था, उपलब्ध चुनावी आंकड़ों से साबित नहीं होता।
कांग्रेस का संकट पहले से चल रहा था। 1989 में ही पार्टी को 269 से घटकर 94 सीटों पर आना पड़ा था। जनता दल और भाजपा का उभार, मंडल राजनीति, राम मंदिर आंदोलन और कांग्रेस विरोधी राजनीतिक माहौल ने राज्य के पुराने सत्ता समीकरण को बदल दिया था।
इसलिए 'डेथ वारंट' को तथ्य के बजाय एक राजनीतिक रूपक के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।
1992 में बनी समाजवादी पार्टी
मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार गिरने के बाद भी उनकी राजनीतिक यात्रा खत्म नहीं हुई। 1991 के चुनाव में उनके नेतृत्व वाले राजनीतिक धड़े को बड़ा नुकसान हुआ, लेकिन मुलायम खुद सक्रिय रहे।
4 अक्टूबर 1992 को मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। समाजवादी पार्टी के आधिकारिक इतिहास में भी 1992 को पार्टी के गठन का वर्ष बताया गया है।
1993 में मुलायम सिंह यादव दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इस बार राजनीतिक समीकरण अलग था। समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया और भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए नया सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ तैयार हुआ।
37 साल पुराने घटनाक्रम का आज के लिए संदर्भ
1989 से 1991 के बीच के घटनाक्रम को समझने के लिए केवल कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव के रिश्ते पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।
यह वह दौर था जब उत्तर प्रदेश में तीन बड़े राजनीतिक प्रवाह एक साथ मजबूत हो रहे थे। मंडल के बाद पिछड़ा वर्ग आधारित राजनीति का विस्तार हुआ। राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा के जनाधार को बढ़ाया। वहीं कांग्रेस का पारंपरिक सामाजिक और चुनावी गठजोड़ कमजोर होता गया।
इसी दौर में मुलायम सिंह यादव ने खुद को उत्तर प्रदेश की गैर-कांग्रेसी राजनीति के प्रमुख चेहरों में स्थापित किया। बाद में समाजवादी पार्टी राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल हुई।
महत्वपूर्ण तारीखें
1989: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता दल 208 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बना।
5 दिसंबर 1989: मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
1990: भाजपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया और कांग्रेस ने सरकार को समर्थन दिया।
1991: कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया और उत्तर प्रदेश में मध्यावधि चुनाव हुए।
1991: भाजपा ने 221 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया। कांग्रेस 46 सीटों पर रह गई।
4 अक्टूबर 1992: मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की।
1993: मुलायम सिंह यादव दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
आगे क्या समझना जरूरी है
मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार का इतिहास उत्तर प्रदेश में गठबंधन राजनीति, बाहरी समर्थन और बदलते सामाजिक समीकरणों का अहम उदाहरण है।
कांग्रेस ने जिस सरकार को तत्काल राजनीतिक संकट से बचाया, वही सरकार कुछ महीनों बाद कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद गिर गई। इसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस और जनता दल दोनों कमजोर हुए, जबकि भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला।
बाद की राजनीति में मुलायम सिंह यादव और उनकी बनाई समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में लंबी राजनीतिक भूमिका निभाई। इस लिहाज से 1990-91 का घटनाक्रम केवल एक सरकार बचाने या गिराने की कहानी नहीं था। यह उस दौर के बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन का हिस्सा था।
मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार का सफर तीन अलग राजनीतिक चरणों में दिखाई देता है। 1989 में जनता दल की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद भाजपा के बाहरी समर्थन से सरकार बनी। 1990 में भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद कांग्रेस ने मुलायम सरकार को सहारा दिया। 1991 में कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार गिर गई और भाजपा ने चुनाव में बहुमत हासिल कर लिया।
इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस के 'डेथ वारंट' के रूप में पेश करना एक राजनीतिक व्याख्या है। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड इससे इतना जरूर दिखाते हैं कि कांग्रेस 1989 में ही बड़े नुकसान से गुजर चुकी थी और 1991 में उसकी स्थिति और कमजोर हुई। साथ ही भाजपा का विस्तार और मंडल-राम मंदिर के दौर का सामाजिक ध्रुवीकरण उत्तर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे चुका था।
वीडियो देखें
ADVERTISEMENT
Mohammad Naved
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।