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चीन का 66 अरब पौधों का मिशन, 50 साल बाद सामने आई चौंकाने वाली ग्रोथ रिपोर्ट

Shahana 2026-07-10 09:00:51
चीन का 66 अरब पौधों का मिशन, 50 साल बाद सामने आई चौंकाने वाली ग्रोथ रिपोर्ट

चीन के मेगा फॉरेस्ट मिशन पर नई स्टडी, प्राकृतिक जंगलों से तेज बढ़ रहे पौधे

66 अरब पौधे लगाने के 50 साल बाद चीन को मिला बड़ा वैज्ञानिक संकेत

 

Location:- Beijing, China

Date:- 10 July 2026

Byline:- Shahana


गोबी रेगिस्तान रोकने की मुहिम पर बड़ा खुलासा, क्या सफल हुआ चीन का सबसे बड़ा अभियान?

करीब 50 वर्ष पहले चीन ने रेगिस्तानी विस्तार रोकने के उद्देश्य से दुनिया का सबसे बड़ा वृक्षारोपण अभियान शुरू किया था। अब एक नई वैज्ञानिक स्टडी बताती है कि लगाए गए जंगल शुरुआती दशकों में प्राकृतिक जंगलों की तुलना में अधिक तेज़ी से विकसित हो रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल तेज़ वृद्धि ही सफलता का पैमाना नहीं हो सकती, क्योंकि दीर्घकालिक कार्बन भंडारण, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

चीन के हरित अभियान पर आधी सदी बाद नया वैज्ञानिक जायज़ा

करीब पाँच दशक पहले जब चीन ने गोबी और तकलामाकान जैसे विशाल रेगिस्तानों के फैलाव को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान शुरू किया था, तब इसे दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय अभियानों में गिना गया। उस समय लक्ष्य केवल पेड़ लगाना नहीं था, बल्कि मिट्टी के कटाव को कम करना, धूल भरी आंधियों पर नियंत्रण पाना और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर को सीमित करना भी था। आज, लगभग 50 साल बाद, इस अभियान की प्रगति पर सामने आई नई वैज्ञानिक स्टडी ने वैश्विक पर्यावरण समुदाय का ध्यान फिर से चीन की ओर खींचा है।

नई रिसर्च के अनुसार, इस अभियान के तहत लगाए गए युवा जंगल शुरुआती दशकों में प्राकृतिक जंगलों की तुलना में अधिक तेज़ी से विकसित हो रहे हैं। वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट डेटा, विभिन्न प्रांतों के वन क्षेत्रों और कई वर्षों के ग्रोथ रिकॉर्ड का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला कि इन कृत्रिम रूप से विकसित जंगलों की शुरुआती वृद्धि उल्लेखनीय रही है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि कम उम्र के पेड़ वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड का अधिक प्रभावी उपयोग करते हुए तेजी से नई पत्तियां और जैविक द्रव्यमान विकसित करते हैं।

केवल तेज़ वृद्धि ही सफलता की गारंटी नहीं

हालांकि अध्ययन का निष्कर्ष उत्साहजनक दिखाई देता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसके साथ महत्वपूर्ण सावधानियां भी जोड़ी हैं। उनका कहना है कि किसी भी वन परियोजना की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जा सकती कि पेड़ कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं। प्राकृतिक जंगलों का विकास भले धीमा हो, लेकिन वे सैकड़ों वर्षों तक कार्बन को सुरक्षित रखने, वर्षा चक्र को स्थिर बनाए रखने और असंख्य वन्य जीवों के लिए स्थायी आवास उपलब्ध कराने में कहीं अधिक सक्षम होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम रूप से लगाए गए जंगलों में अक्सर सीमित प्रजातियों के पेड़ लगाए जाते हैं। इससे शुरुआती वर्षों में हरियाली तेजी से दिखाई देती है, लेकिन जैव विविधता प्राकृतिक जंगलों जितनी समृद्ध नहीं बन पाती। यही कारण है कि कई पर्यावरण वैज्ञानिक वृक्षारोपण अभियानों के साथ-साथ पुराने प्राकृतिक जंगलों के संरक्षण को भी समान प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर ज़ोर दे रहे हैं।

कृत्रिम जंगलों की तेज़ रफ्तार के पीछे क्या वजह है

नई रिसर्च का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष यह है कि लगाए गए युवा जंगल शुरुआती तीन से चार दशकों तक प्राकृतिक जंगलों की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़ते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह पेड़ों की कम उम्र है। युवा पौधे अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा नई शाखाओं, पत्तियों और तनों के विकास में लगाते हैं। इसके साथ ही वातावरण में लगातार बढ़ रही कार्बन डाइऑक्साइड भी उनके विकास की रफ्तार को प्रभावित करती है।

शोधकर्ताओं ने मौसम, वर्षा, तापमान और मिट्टी की गुणवत्ता जैसे कई कारकों का अलग-अलग विश्लेषण किया। इन सभी प्रभावों को संतुलित करने के बाद भी यह पाया गया कि कृत्रिम रूप से विकसित जंगलों की शुरुआती वृद्धि प्राकृतिक जंगलों से अधिक तेज़ बनी रही। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष केवल शुरुआती विकास चरण से जुड़ा है और इसे पूरे जीवनकाल की सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

कार्बन अवशोषण में क्या है इन जंगलों की भूमिका

जलवायु परिवर्तन के दौर में पेड़ों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करना मानी जाती है। अध्ययन के अनुसार, तेजी से बढ़ने वाले युवा पेड़ शुरुआती वर्षों में बड़ी मात्रा में कार्बन को अपने भीतर संग्रहित कर सकते हैं। यही कारण है कि कई देशों ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण को अपनी जलवायु रणनीति का हिस्सा बनाया है।

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बन अवशोषण केवल एक पहलू है। प्राकृतिक जंगलों में विकसित जटिल पारिस्थितिकी तंत्र सैकड़ों वर्षों तक कार्बन को सुरक्षित रखता है। यदि पुराने जंगल नष्ट होते हैं और उनकी जगह केवल नए पौधे लगाए जाते हैं, तो दीर्घकाल में कुल पर्यावरणीय लाभ अपेक्षा से कम हो सकता है। इसलिए वृक्षारोपण और प्राकृतिक वनों का संरक्षण, दोनों साथ-साथ चलना आवश्यक है।

चीन का सबसे बड़ा पर्यावरणीय अभियान

चीन ने वर्ष 1978 में "थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट प्रोग्राम" की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य उत्तरी, उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी चीन में फैलते रेगिस्तानी इलाकों को नियंत्रित करना था। समय के साथ यह अभियान दुनिया के सबसे बड़े वृक्षारोपण कार्यक्रमों में शामिल हो गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक अरबों पौधे लगाए जा चुके हैं और कई क्षेत्रों में हरित आवरण पहले की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।

गोबी और तकलामाकान जैसे रेगिस्तानों के आसपास वृक्षारोपण का मकसद केवल हरियाली बढ़ाना नहीं था। इसके पीछे धूल भरी आंधियों को कम करना, कृषि भूमि की रक्षा करना, मिट्टी का कटाव रोकना और स्थानीय आबादी के जीवन स्तर में सुधार लाना भी शामिल था। कई इलाकों में इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं, हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता का स्तर समान नहीं रहा।

क्या केवल पेड़ लगाना ही पर्याप्त है

पर्यावरण विशेषज्ञ इस अध्ययन को सकारात्मक संकेत मानते हैं, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अपने आप में हर समस्या का समाधान नहीं है। यदि किसी क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और उपलब्ध जल संसाधनों को ध्यान में रखे बिना पेड़ लगाए जाएं, तो कई बार अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। कुछ स्थानों पर अत्यधिक वृक्षारोपण से भूजल पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका भी जताई गई है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि एक ही प्रजाति के बड़े पैमाने पर लगाए गए जंगल प्राकृतिक जैव विविधता की बराबरी नहीं कर सकते। प्राकृतिक जंगलों में पेड़, झाड़ियां, घास, कीट, पक्षी और वन्यजीव मिलकर एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्थाएं वृक्षारोपण के साथ स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और पुराने जंगलों की सुरक्षा को भी समान महत्व देने की सलाह देती हैं।

वैश्विक जलवायु नीति के लिए क्या संकेत देता है यह अध्ययन

चीन के इस दीर्घकालिक अभियान पर सामने आई नई रिसर्च केवल एक देश की पर्यावरणीय उपलब्धि तक सीमित नहीं है। ऐसे समय में जब दुनिया के अधिकांश देश नेट-ज़ीरो उत्सर्जन, कार्बन कटौती और जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियों पर काम कर रहे हैं, यह अध्ययन बताता है कि बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अल्पकाल में सकारात्मक परिणाम दे सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि इसे जलवायु संकट का एकमात्र समाधान मानना उचित नहीं होगा।

जलवायु परिवर्तन से लड़ाई कई मोर्चों पर एक साथ लड़ी जाती है। इसमें जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रित करना, प्राकृतिक जंगलों की रक्षा करना और टिकाऊ भूमि प्रबंधन जैसी नीतियां समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। केवल नए पौधे लगाने से उन पारिस्थितिक तंत्रों की भरपाई नहीं हो सकती, जिन्हें विकसित होने में सदियां लगती हैं।

वैज्ञानिकों की चेतावनी को समझना क्यों जरूरी है

रिसर्च से यह स्पष्ट हुआ है कि युवा जंगल शुरुआती 30 से 40 वर्षों तक तेजी से बढ़ते हैं और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर सकते हैं। लेकिन इसके बाद उनकी वृद्धि की गति धीरे-धीरे कम होने लगती है। दूसरी ओर, प्राकृतिक जंगल अपेक्षाकृत धीमी गति से विकसित होते हैं, फिर भी वे लंबे समय तक कार्बन भंडारण, जल संरक्षण और जैव विविधता को बनाए रखने में अधिक प्रभावी माने जाते हैं।

इसीलिए वैज्ञानिक इस अध्ययन को "वृक्षारोपण बनाम प्राकृतिक जंगल" की बहस नहीं मानते। उनका कहना है कि दोनों की अपनी अलग भूमिका है। यदि नई पौध तैयार की जाती है और साथ ही पुराने जंगलों को भी संरक्षित रखा जाता है, तभी जलवायु परिवर्तन के खिलाफ दीर्घकालिक और संतुलित परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

दुनिया के लिए चीन का अनुभव कितना उपयोगी

चीन का अनुभव उन देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है जो बड़े स्तर पर हरित अभियान चला रहे हैं। भारत, अफ्रीका, मध्य एशिया और मध्य पूर्व के कई क्षेत्रों में भी मरुस्थलीकरण, जल संकट और भूमि क्षरण जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में चीन का मॉडल कुछ उपयोगी सीख देता है, लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि किसी भी देश को स्थानीय जलवायु, मिट्टी, वर्षा और स्थानीय वनस्पतियों को ध्यान में रखकर ही वृक्षारोपण की रणनीति तैयार करनी चाहिए। पर्यावरण नीति में अब केवल यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं रह गया है कि कितने पेड़ लगाए गए। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनमें से कितने पेड़ लंबे समय तक जीवित रहे, कितनी प्रजातियां विकसित हुईं, स्थानीय पारिस्थितिकी पर उनका क्या असर पड़ा और उन्होंने जलवायु परिवर्तन से निपटने में वास्तविक योगदान कितना दिया। यही पैमाने भविष्य की पर्यावरणीय नीतियों की दिशा तय करेंगे।

 

करीब पचास वर्षों तक चले चीन के विशाल वृक्षारोपण अभियान पर आई नई वैज्ञानिक स्टडी शुरुआती परिणामों के लिहाज से उत्साहजनक तस्वीर पेश करती है। अध्ययन बताता है कि लगाए गए युवा जंगल तेज़ी से बढ़ रहे हैं और वातावरण से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि तेज़ वृद्धि अपने आप में स्थायी पर्यावरणीय सफलता का प्रमाण नहीं है।

दीर्घकालिक जलवायु सुरक्षा के लिए वृक्षारोपण, प्राकृतिक जंगलों का संरक्षण, जैव विविधता की रक्षा और टिकाऊ पर्यावरणीय नीतियों को साथ लेकर चलना होगा। चीन का अनुभव दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी सीख यही है कि हरियाली केवल संख्या से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, स्थायित्व और पारिस्थितिक संतुलन से मापी जानी चाहिए। आने वाले वर्षों में वैश्विक जलवायु रणनीतियों की सफलता इसी संतुलित दृष्टिकोण पर निर्भर करेगी।

 

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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