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चीन ने अमेरिका इजरायल ईरान टकराव पर सख्त लहजे में जताई चिंता 

None 2026-03-01 18:18:32
चीन ने अमेरिका इजरायल ईरान टकराव पर सख्त लहजे में जताई चिंता 

 चीन की चेतावनी: जंग से मिडिल ईस्ट और अस्थिर, सैन्य कार्रवाई हल नहीं,

अमेरिका इजरायल ईरान टकराव पर बीजिंग की चिंता

 


अमेरिका, इजरायल और ईरान के दरमियान बढ़ते टकराव पर चीन ने संयुक्त राष्ट्र में सख्त लहजे में चिंता जताई है। चीन का कहना है कि सैन्य कार्रवाई से मसला हल नहीं होगा और मिडिल ईस्ट में हिंसा का फैलाव सबके लिए नुकसानदेह साबित होगा। सवाल यह है कि क्या चीन वाकई अमन का हामी है या यह उसकी रणनीतिक सियासत का हिस्सा है। यह विश्लेषण इसी पेचीदा तस्वीर को समझने की कोशिश है।

यूएन में चीन की अपील, बातचीत ही रास्ता

जंग की आग और चीन की आवाज

मिडिल ईस्ट एक बार फिर शोला बनता दिख रहा है। अमेरिका और इजरायल की तरफ से ईरान पर हमले, और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई ने फिजा को सख्त और संगीन बना दिया है। इसी माहौल में चीन ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि सैन्य ताकत किसी भी विवाद का हल नहीं। सुनने में यह बात सीधी और समझदार लगती है। आखिर कौन चाहेगा कि इलाका और जल उठे।

लेकिन यहां ठहर कर सोचना जरूरी है। जब कोई बड़ी ताकत अमन की बात करती है, तो उसके पीछे सिर्फ इंसानी हमदर्दी होती है या कोई स्ट्रेटेजिक कैलकुलेशन भी। चीन का बयान महज नैतिक अपील है या ग्लोबल पावर पॉलिटिक्स का हिस्सा।

चीन की फिक्र या सियासी दांव

चीन के राजदूत फू कोंग ने साफ कहा कि ईरान की हिफाजत और उसकी सरहदों का एहतराम होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि फौजी कार्रवाई नफरत और तसादुम को बढ़ाती है। यह बात किताबों में भी लिखी मिलती है और तजुर्बे में भी दिखती है। इराक, सीरिया, अफगानिस्तान, हर जगह लंबी जंग ने मसला हल नहीं किया, उल्टा नई मुश्किलें पैदा कीं।

मगर सवाल यह है कि चीन खुद कब और कहां फौजी ताकत के इस्तेमाल से परहेज करता है। दक्षिण चीन सागर को लेकर उसकी पॉलिसी, ताइवान पर उसका स्टैंड, इन सब पर भी दुनिया नजर रखती है। तो क्या चीन का यह बयान पूरी तरह उसूलों पर आधारित है या मौजूदा हालात में उसे फायदा दिख रहा है।

अमेरिका और इजरायल की दलील

दूसरी तरफ अमेरिका और इजरायल का कहना है कि ईरान की पॉलिसी और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क से इलाके की सिक्योरिटी को खतरा है। उनका तर्क है कि अगर अभी एक्शन नहीं लिया गया तो आगे हालात और बिगड़ेंगे। यह लॉजिक नया नहीं है। नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर कई मुल्क पहले भी फौजी कदम उठाते रहे हैं।

लेकिन यहां भी एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है। क्या हर खतरे का जवाब मिसाइल और बम है। क्या डिटरेंस का मतलब सिर्फ मिलिट्री स्ट्राइक है। या फिर डिप्लोमेसी, बैक चैनल टॉक्स और मल्टीलेटरल प्रेशर ज्यादा असरदार हो सकता है।

ईरान की पोजीशन और रिएक्शन

ईरान ने जवाबी कार्रवाई की है और उसने साफ कहा कि वह अपनी सलामती पर समझौता नहीं करेगा। यह एक मुल्क की नेचुरल प्रतिक्रिया मानी जा सकती है। जब किसी पर हमला होता है तो वह चुप नहीं बैठता। मगर जवाबी कार्रवाई से सर्किल ऑफ वायलेंस और तेज हो जाता है। एक मिसाइल का जवाब दूसरी मिसाइल से दिया जाए तो आखिर यह सिलसिला कहां रुकेगा।

आम आदमी की नजर से देखें तो उसे फर्क नहीं पड़ता कि किसने पहले वार किया। उसे सिर्फ इतना दिखता है कि महंगाई बढ़ेगी, तेल के दाम ऊपर जाएंगे, और खौफ का माहौल गहराएगा।

मिडिल ईस्ट की सियासी शतरंज

मिडिल ईस्ट हमेशा से पावर बैलेंस की शतरंज रहा है। यहां हर चाल के पीछे कई परतें होती हैं। चीन का इस मसले पर आगे आना सिर्फ बयान भर नहीं। वह खुद को एक जिम्मेदार ग्लोबल प्लेयर के तौर पर पेश करना चाहता है। वह यह दिखाना चाहता है कि वेस्ट के मुकाबले वह बातचीत और स्टेबिलिटी की बात करता है।

लेकिन यहां एक काउंटर प्वाइंट भी है। अगर चीन वाकई इतना ही एक्टिव है, तो क्या वह सिर्फ बयान देगा या कोई ठोस मेडिएशन रोल भी निभाएगा। क्या वह सभी पक्षों को एक टेबल पर लाने की कोशिश करेगा। या यह मामला सिर्फ यूएन स्पीच तक सीमित रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं

यूएन में इमरजेंसी मीटिंग हुई, अपीलें की गईं। मगर हकीकत यह है कि जब बड़ी ताकतें आमने सामने होती हैं तो यूएन की ताकत सीमित दिखती है। वीटो पावर की सियासत अक्सर किसी ठोस रिजोल्यूशन को रोक देती है। ऐसे में चीन की अपील कितनी असरदार होगी, यह भी देखना होगा।

इतिहास बताता है कि इंटरनेशनल सिस्टम में ताकत का संतुलन अक्सर नैतिक अपील से ज्यादा प्रभावी रहता है। फिर भी, बयान और डिप्लोमेसी बेकार नहीं होते। वे कम से कम दरवाजे बंद नहीं होने देते।

क्या बातचीत सचमुच मुमकिन है

चीन ने कहा कि सलह मशविरा ही रास्ता है। सुनने में यह आसान लगता है। मगर जमीन पर भरोसा टूट चुका है। जब खून बह चुका हो, तब बातचीत की मेज पर बैठना दोनों पक्षों के लिए सियासी रिस्क बन जाता है। कोई भी लीडर कमजोर दिखना नहीं चाहता।

फिर भी, अगर जरा आम जिंदगी का उदाहरण लें। घर में दो लोग लड़ पड़ें तो अगर कोई तीसरा समझदार शख्स बीच में आए और दोनों को बैठा दे, तो मसला हल होने की गुंजाइश बनती है। लेकिन अगर दोनों ही जिद पर अड़े हों, तो समझौता मुश्किल हो जाता है। मिडिल ईस्ट का हाल कुछ ऐसा ही है।

चीन का असली इम्तिहान

यह वक्त चीन के लिए भी टेस्ट है। क्या वह सिर्फ बयानबाजी करेगा या प्रैक्टिकल डिप्लोमेसी दिखाएगा। अगर वह सचमुच शांति चाहता है, तो उसे अपने असर और रिश्तों का इस्तेमाल कर के एक रोडमैप देना होगा। सिर्फ यह कहना कि जंग गलत है, काफी नहीं।

साथ ही यह भी जरूरी है कि दुनिया चीन के इरादों को आंख बंद कर के न माने। हर बड़ी ताकत अपने हित देखती है। सवाल यह नहीं कि कौन सही है। सवाल यह है कि कौन स्थायी अमन के लिए सच्चे कदम उठाता है।

अमन की राह या नई ध्रुवीकरण

अमेरिका, इजरायल और ईरान का टकराव सिर्फ तीन मुल्कों का मसला नहीं। यह पूरी दुनिया की इकॉनमी, सिक्योरिटी और पॉलिटिकल क्लाइमेट पर असर डाल सकता है। चीन की चेतावनी एक अहम आवाज है, मगर असली कसौटी यह है कि क्या इससे जमीन पर फर्क पड़ेगा।

जंग आसान फैसला होता है। बातचीत मुश्किल होती है। लेकिन लंबी दौड़ में वही रास्ता टिकता है जो इंसानी जान, इज्जत और स्टेबिलिटी को बचाए। अब देखना यह है कि ताकतवर मुल्क अपने अहम को बड़ा रखते हैं या इंसानियत को।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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