By Mohd Haris
ईरान को आर्थिक तौर पर अलग-थलग करने की अमेरिकी कोशिश के बीच चीन ने वॉशिंगटन के दबाव को खारिज कर दिया है। बीजिंग ने साफ किया है कि ईरान के साथ उसका सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में है और किसी बाहरी दबाव से इसे बाधित नहीं किया जाना चाहिए। चीन के इस रुख से तेहरान में भी संतोष है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़ेर क़ालीबाफ ने चीन के बयान का स्वागत करते हुए कहा कि ईरान-चीन व्यापक रणनीतिक साझेदारी आपसी सम्मान, पारस्परिक लाभ और बहुध्रुवीय विश्व की साझा सोच पर आधारित है। उन्होंने कहा, इस रिश्ते के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है।
अमेरिकी प्रशासन ने 24 अगस्त को ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की नई मुहिम शुरू की। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि जो देश या संस्थाएं ईरान के साथ कारोबार जारी रखेंगी, उन्हें आगे चलकर अमेरिकी सेकेंडरी पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिका ने तत्काल सभी कारोबारी साझेदारों पर कार्रवाई नहीं की, बल्कि उन्हें ईरान के साथ रिश्ते कम करने का वक्त देने की बात कही। इसी रणनीति के तहत करीब 60 व्यक्तियों, संस्थाओं और जहाजों पर नई पाबंदियां लगाई गईं। इनमें चीन और हांगकांग से जुड़ी कुछ संस्थाएं भी शामिल थीं। हालांकि चीन के बड़े वित्तीय संस्थानों को इस सूची में शामिल नहीं किया गया। यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन ईरान पर दबाव बढ़ाने के साथ बीजिंग के साथ सीधे बड़े आर्थिक टकराव से फिलहाल बचने की कोशिश कर रहा है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने अमेरिकी नीति पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि चीन एकतरफा ऐसी पाबंदियों का विरोध करता है जिनका आधार अंतरराष्ट्रीय कानून या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का आदेश नहीं है। बीजिंग का कहना है कि आर्थिक युद्ध और अधिकतम दबाव किसी समस्या का समाधान नहीं करते। इसके बजाय इससे तनाव बढ़ता है, क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा होती है और वैश्विक आर्थिक एवं वित्तीय व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। लिन जियान ने यह भी कहा कि चीन ईरान के साथ अपने सहयोग को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संचालित करता है। उन्होंने संकेत दिया कि बीजिंग अपने वैध अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
चीन के बयान के बाद ईरानी संसद के अध्यक्ष क़ालीबाफ ने बीजिंग की तारीफ की। उन्होंने कहा कि चीन का रुख दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी की बुनियाद के अनुरूप है। क़ालीबाफ ने अपने बयान में आपसी सम्मान, पारस्परिक लाभ और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उल्लेख किया। उनका कहना था कि ईरान और चीन के रिश्ते किसी तीसरे देश की अनुमति पर निर्भर नहीं हैं। यह बयान ऐसे वक्त आया है जब अमेरिका ईरान के व्यापारिक साझेदारों पर भी दबाव डाल रहा है। इसलिए तेहरान के लिए चीन का रुख कूटनीतिक समर्थन के साथ आर्थिक महत्व भी रखता है।
चीन लंबे समय से ईरान का प्रमुख कारोबारी साझेदार और ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। रिपोर्टें के मुताबिक, 2025 में चीन ने ईरान से औसतन करीब 1.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा था। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 2025 में चीन ने ईरान के समुद्री तेल निर्यात का 80% से अधिक हिस्सा खरीदा था। हालांकि 2026 में हालात बदल गए हैं। अमेरिका की ओर से ईरान की शिपिंग और बंदरगाहों पर नाकाबंदी फिर लागू किए जाने के बाद चीन तक ईरानी तेल की आपूर्ति में गिरावट आई है। रिपोर्ट के अनुसार जून में चीन को ईरानी तेल की आपूर्ति करीब 785,000 बैरल प्रतिदिन रही, जबकि अगस्त में अब तक यह आंकड़ा करीब 534,000 बैरल प्रतिदिन था। इससे पता चलता है कि चीन ईरान के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा है, लेकिन अमेरिकी कार्रवाई ने दोनों देशों के ऊर्जा कारोबार पर वास्तविक दबाव डाला है।
चीन में ईरानी तेल के प्रमुख खरीदार स्वतंत्र रिफाइनर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार चीन की बड़ी सरकारी रिफाइनरियां 2019 से अमेरिकी पाबंदियों के कारण ईरानी तेल की सीधी खरीद से दूरी बनाए हुए हैं। ईरानी तेल की खरीद में जटिल व्यापारिक नेटवर्क, मध्यस्थ कंपनियां और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था का इस्तेमाल होने की रिपोर्टें सामने आई हैं। रिपोर्ट ने यह भी बताया है कि ईरानी तेल को कई मामलों में दूसरे देशों के नाम से कारोबार किए जाने के आरोप लगे हैं। यह पूरा तंत्र अब अमेरिकी निगरानी और पाबंदियों के दबाव में है। इसलिए चीन का राजनीतिक समर्थन अपने आप में ईरान के तेल निर्यात को पहले जैसी स्थिति में नहीं ला देता।
ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की अमेरिकी रणनीति के सामने चीन सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। वजह साफ है, चीन ईरान का प्रमुख तेल खरीदार है और दोनों देशों के बीच व्यापक व्यापारिक रिश्ते हैं। अमेरिका के लिए समस्या यह है कि चीन पर व्यापक पाबंदियां लगाने से केवल ईरान पर असर नहीं पड़ेगा। इससे दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक तनाव भी बढ़ सकता है। अमेरिका और चीन पहले से व्यापार, तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज और रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखलाओं को लेकर प्रतिस्पर्धा में हैं। ऐसे में ईरान का मुद्दा दोनों शक्तियों के बीच एक और टकराव का मोर्चा बन सकता है।
अमेरिकी प्रशासन ने ईरान से जुड़े कई चीनी और हांगकांग स्थित संस्थानों पर कार्रवाई की है, लेकिन प्रमुख चीनी बैंकों पर व्यापक सेकेंडरी पाबंदी लगाने से अभी परहेज किया गया है। इसके पीछे एक बड़ा कारण अमेरिका-चीन रिश्तों की संवेदनशीलता है। अमेरिकी प्रशासन ईरान पर अधिकतम आर्थिक दबाव बनाना चाहता है, लेकिन चीन के साथ ऐसा टकराव नहीं चाहता जिससे व्यापक वैश्विक आर्थिक नुकसान हो। एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों के सामने ईरान पर दबाव और चीन के साथ द्विपक्षीय तनाव को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन की चुनौती है।
ईरान और चीन के संबंध ऊर्जा कारोबार से आगे जाते हैं। दोनों देशों ने 2021 में 25 वर्षीय व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत आर्थिक, ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और अन्य क्षेत्रों में सहयोग का ढांचा तैयार किया गया। चीन के लिए ईरान मध्य पूर्व में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। वहीं तेहरान के लिए बीजिंग अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच एक बड़ा कारोबारी और कूटनीतिक सहारा है। हालांकि दोनों देशों के रिश्ते को औपचारिक सैन्य गठबंधन मानना सही नहीं होगा। चीन ईरान के साथ रणनीतिक सहयोग रखता है, लेकिन उसने तेहरान के लिए ऐसी स्पष्ट सुरक्षा गारंटी नहीं दी है जैसी किसी औपचारिक रक्षा संधि में होती है।
अमेरिकी पाबंदियों का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पहले से दिखाई दे रहा है। तेल निर्यात में गिरावट, शिपिंग में रुकावट और वित्तीय प्रतिबंधों ने तेहरान की आर्थिक स्थिति को मुश्किल बनाया है। फिर भी ईरान ने अमेरिकी दबाव के सामने झुकने का संकेत नहीं दिया है। ईरानी अधिकारियों ने नई पाबंदियों को अंतरराष्ट्रीय कानून और ईरानी संप्रभुता के खिलाफ बताया है। तेहरान ने यह भी कहा है कि वह इन कदमों का जवाब देने के लिए तैयार है। ऐसे माहौल में चीन का समर्थन ईरान को कूटनीतिक स्तर पर अतिरिक्त गुंजाइश देता है। लेकिन आर्थिक दबाव से बच निकलना कितना संभव होगा, यह चीन के साथ वास्तविक व्यापार और तेल प्रवाह पर निर्भर करेगा।
ईरान पर अमेरिकी आर्थिक दबाव का एक बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ रहा है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है और ईरानी तेल की आपूर्ति में भी गिरावट आई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए अमेरिका और ईरान के बीच तनाव केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है। इसका असर एशिया, यूरोप और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ता है।
अब निगाह इस बात पर है कि अमेरिका अपनी सेकेंडरी पाबंदियों को किस स्तर तक लागू करता है और चीन इस दबाव का जवाब कैसे देता है।
अगर वॉशिंगटन चीनी बैंकों या बड़े ऊर्जा कारोबार को सीधे निशाना बनाता है, तो अमेरिका-चीन तनाव बढ़ने की आशंका होगी। अगर कार्रवाई सीमित रहती है, तो चीन ईरान के साथ अपने मौजूदा कारोबारी रिश्तों को किसी हद तक जारी रख सकता है। फिलहाल तेहरान के लिए बीजिंग का संदेश अहम है। चीन ने ईरान के साथ अपने सहयोग को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में बताया है और अमेरिकी दबाव को खारिज किया है। ईरान ने भी साफ कर दिया है कि वह चीन के साथ अपने रिश्ते को किसी तीसरे देश की मंजूरी से जोड़कर नहीं देखता। लेकिन इस कूटनीतिक समर्थन की वास्तविक परीक्षा तब होगी, जब अमेरिका चीनी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर सेकेंडरी पाबंदियों को और आगे बढ़ाएगा।
अमेरिका की नई पाबंदियों ने चीन-ईरान रिश्ते को एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ला दिया है। वॉशिंगटन आर्थिक दबाव से तेहरान को अलग-थलग करना चाहता है, जबकि बीजिंग अपने ईरान संबंधों में अमेरिकी हस्तक्षेप स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रहा।
तेहरान के लिए चीन का रुख राहत की खबर है, लेकिन केवल राजनीतिक समर्थन से ईरान की आर्थिक मुश्किलें खत्म नहीं होंगी। आने वाले दिनों में तेल कारोबार, सेकेंडरी पाबंदियां और अमेरिका-चीन कूटनीति यह तय करेगी कि यह साझेदारी दबाव के बीच कितनी मजबूती से आगे बढ़ती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।