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दिल्ली विश्वविद्यालय में हॉस्टल की कमी, फंड और जमीन की अड़चन बड़ी चुनौती

Apurva Choudhary • 2026-09-16 20:48:19
दिल्ली विश्वविद्यालय में हॉस्टल की कमी, फंड और जमीन की अड़चन बड़ी चुनौती
दिल्ली विश्वविद्यालय और संबद्ध कॉलेजों में हॉस्टल सीटों की कमी से छात्रों की परेशानी बढ़ी है। विश्वविद्यालय में 3,422 और कॉलेजों में 3,788 सीटें हैं। फंड, जमीन और मंजूरियों की अड़चन से विस्तार धीमा है। सुरक्षा ऑडिट और किफायती आवास की मांग पर हाई कोर्ट ने जवाब मांगा है।
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📍 नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026 | ✍️ अपूर्वा चौधरी

डीयू में हॉस्टल सीटों की कमी बनी बड़ी समस्या
दिल्ली विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध कॉलेजों में हॉस्टल सुविधाओं की कमी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। छात्रों की बढ़ती संख्या के मुकाबले उपलब्ध हॉस्टल सीटें बेहद सीमित हैं। इससे खासकर दूसरे राज्यों और दूरदराज के क्षेत्रों से दिल्ली पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के सामने किफायती और सुरक्षित आवास की चुनौती बढ़ गई है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में लगभग 3,422 सीटें हैं, जबकि संबद्ध कॉलेजों में करीब 3,788 सीटें उपलब्ध हैं। यह क्षमता विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की कुल संख्या की तुलना में काफी कम है।

छात्रों की संख्या के मुकाबले आवास क्षमता कम
दिल्ली विश्वविद्यालय में हर वर्ष लगभग 2.8 लाख विद्यार्थी स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिला लेते हैं। इसके अलावा करीब 11,600 विद्यार्थी स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेते हैं। इतनी बड़ी छात्र संख्या के मुकाबले हॉस्टल सीटों की सीमित उपलब्धता के कारण सभी जरूरतमंद विद्यार्थियों को परिसर में रहने की सुविधा नहीं मिल पाती।
हॉस्टल में जगह न मिलने पर छात्रों को निजी पीजी, किराए के कमरों, साझा आवास और अन्य बाहरी विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ता है। दिल्ली जैसे शहर में किराया, भोजन, परिवहन और सुरक्षा से जुड़े खर्च विद्यार्थियों तथा उनके परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालते हैं।
कई छात्रों के लिए विश्वविद्यालय के आसपास आवास लेना आसान नहीं होता। सीमित बजट वाले विद्यार्थी अक्सर कॉलेज से दूर रहने को मजबूर होते हैं, जिससे रोजाना आने-जाने में समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं।

फंड और जमीन की कमी से अटकीं परियोजनाएं
हॉस्टल क्षमता बढ़ाने की राह में कई व्यावहारिक और प्रशासनिक अड़चनें सामने आती हैं। इनमें निर्माण के लिए पर्याप्त फंड का अभाव, परिसर में जमीन की कमी, भूमि-उपयोग से जुड़े प्रतिबंध, पर्यावरणीय मंजूरियां और विभिन्न विभागों से अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया शामिल है।
कुछ कॉलेजों के पास हॉस्टल निर्माण के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, कुछ संस्थानों के पास जमीन होने के बावजूद निर्माण शुरू करने के लिए जरूरी वित्तीय संसाधन नहीं हैं। ऐसे में हॉस्टल विस्तार की योजनाएं कागजी स्तर पर आगे बढ़ने के बावजूद जमीन पर अपेक्षित गति से लागू नहीं हो पातीं।
निर्माण परियोजनाओं में लागत बढ़ना, निविदा प्रक्रिया, वास्तु और सुरक्षा मानकों का पालन तथा प्रशासनिक स्वीकृति जैसी प्रक्रियाएं भी समय लेती हैं। इससे छात्रों को तत्काल राहत देने की योजनाओं में देरी होती है।

दक्षिण परिसर में अधिक चुनौती
दक्षिण परिसर के कई कॉलेजों में हॉस्टल सुविधाएं या तो उपलब्ध नहीं हैं या उनकी क्षमता बहुत सीमित है। इस क्षेत्र में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को निजी पीजी और किराए के कमरों पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है।
दक्षिण दिल्ली में आवास का खर्च कई छात्रों के बजट से बाहर हो सकता है। ऐसे में विद्यार्थी साझा कमरे, दूर के इलाकों में किराए के मकान या अस्थायी आवास का विकल्प चुनते हैं। इससे उनकी पढ़ाई, समय-सारिणी और दैनिक जीवन प्रभावित हो सकता है।
छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय की फीस और अन्य शैक्षणिक खर्चों के साथ महंगा आवास उनके लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है। जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए हॉस्टल की कमी उच्च शिक्षा तक समान पहुंच के सवाल से भी जुड़ती है।

निजी पीजी में सुरक्षा को लेकर चिंता
हॉस्टल की कमी का असर केवल आवास की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी पीजी और किराए की इमारतों में रहते हैं, जहां सुरक्षा मानकों की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
भवन की संरचनात्मक मजबूती, अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन निकास, बिजली व्यवस्था, भीड़भाड़ और स्थानीय निगरानी जैसे मुद्दे छात्रों की सुरक्षा से सीधे जुड़े हैं। कई बार विद्यार्थी कम किराए के कारण ऐसी इमारतों में रहने को मजबूर हो जाते हैं, जहां सुरक्षा सुविधाएं पर्याप्त नहीं होतीं।
सत्य निकेतन में एक पीजी इमारत के ढहने की घटना के बाद निजी छात्र आवासों की सुरक्षा पर चिंता और बढ़ गई। ऐसी घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि छात्रों के लिए इस्तेमाल होने वाली निजी इमारतों का नियमित सुरक्षा ऑडिट किस स्तर पर किया जाता है और नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है।

दिल्ली हाई कोर्ट में भी उठा मामला
डीयू के संबद्ध कॉलेजों में हॉस्टल सुविधाओं की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और विश्वविद्यालय से जवाब मांगा है। याचिका में छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल निर्माण के साथ-साथ निजी पीजी और छात्रावासों के सुरक्षा ऑडिट की मांग भी उठाई गई है।
मामले का व्यापक पक्ष यह है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए आवास केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा तक सुरक्षित और समान पहुंच का हिस्सा है। यदि छात्रों को रहने के लिए असुरक्षित या अत्यधिक महंगे विकल्प चुनने पड़ें, तो इसका असर उनकी पढ़ाई और मानसिक शांति पर भी पड़ सकता है।
अदालत में उठे मुद्दों के बाद संबंधित संस्थानों से यह स्पष्ट करने की अपेक्षा है कि हॉस्टल क्षमता बढ़ाने, निर्माणाधीन परियोजनाओं को पूरा करने और निजी आवासों की सुरक्षा जांच के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

विस्तार की योजनाएं, लेकिन गति धीमी
विश्वविद्यालय स्तर पर हॉस्टल क्षमता बढ़ाने की योजनाएं प्रस्तावित हैं। अतिरिक्त सीटें तैयार करने और नए छात्र आवास विकसित करने के विकल्पों पर चर्चा होती रही है। हालांकि, इन योजनाओं को लागू करने में फंडिंग, जमीन, पर्यावरणीय अनुमति, भवन मानक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं बाधा बन रही हैं।
हॉस्टल निर्माण के लिए दीर्घकालिक योजना के साथ तत्काल राहत के उपायों की भी आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, मौजूदा हॉस्टलों की क्षमता का बेहतर उपयोग, खाली पड़ी संस्थागत इमारतों का आकलन, साझा छात्र आवास की व्यवस्था और सुरक्षित निजी पीजी की सूची तैयार करने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
इसके अलावा, कॉलेज स्तर पर विद्यार्थियों के लिए आवास सहायता केंद्र बनाए जा सकते हैं, जहां उन्हें किराए, परिवहन, सुरक्षा और स्थानीय आवास विकल्पों से संबंधित विश्वसनीय जानकारी मिल सके।

छात्रों के लिए किफायती आवास जरूरी
हॉस्टल संकट का समाधान केवल नए भवन बनाने से नहीं होगा। निर्माण के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सीटें जरूरतमंद छात्रों के लिए किफायती हों और आवंटन प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
छात्र संगठनों और विशेषज्ञों का जोर है कि नए हॉस्टलों के निर्माण के अलावा मौजूदा भवनों की मरम्मत, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन निकास और नियमित निरीक्षण पर भी ध्यान दिया जाए। निजी पीजी संचालकों के लिए न्यूनतम सुरक्षा मानक तय करने और उनके अनुपालन की निगरानी करने की जरूरत भी सामने आती है।
यदि विश्वविद्यालय, कॉलेज प्रशासन और स्थानीय निकाय मिलकर काम करें, तो छात्रों के लिए सुरक्षित आवास का एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया जा सकता है। इससे हॉस्टल की कमी के साथ-साथ निजी आवासों से जुड़े जोखिमों को भी कम किया जा सकेगा।
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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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