डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump ) को चौथी बार नोबेल शांति पुरस्कार ( Nobel Peace Prize) के लिए नॉमिनेट किया गया है। जानिए इजराइल-हमास संघर्षविराम में उनकी भूमिका, नोबेल पुरस्कार प्रक्रिया और इस नॉमिनेशन से जुड़े विवाद।
अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत में स्पष्ट किया गया है कि नोबेल शांति पुरस्कार उसे मिलना चाहिए, "जिसने राष्ट्रों के बीच भाईचारे को बढ़ाने, स्थायी सेनाओं को समाप्त करने या कम करने, तथा शांति सम्मेलनों की स्थापना और संवर्धन के लिए सबसे अधिक या सर्वोत्तम कार्य किया हो।"
हाल में जब डोनाल्ड ट्रंप का नाम फिर से इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए सामने आया, खासतौर पर इजरायल और पाकिस्तान के समर्थन के साथ, सोशल मीडिया और वैश्विक राजनीतिक हलकों में एक नई बहस शुरू हो गई।
अब तक चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों को यह सम्मान मिल चुका है:
अगर ट्रंप यह पुरस्कार जीतते हैं, तो वे पांचवें अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे जिन्हें यह सम्मान मिलेगा।
डोनाल्ड ट्रंप को इससे पहले भी कई बार नोबेल के लिए नामित किया गया है:
इस बार नॉर्वे के एक सांसद और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के समर्थन के साथ ट्रंप फिर से सुर्खियों में हैं।
ट्रंप ने इस नॉमिनेशन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
"मैं यह अहंकार से नहीं कह रहा, लेकिन मुझे नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। ओबामा को सत्ता में आने के कुछ हफ्तों में यह पुरस्कार मिल गया था। उन्होंने खुद कहा था, 'मैंने किया ही क्या?' और उन्होंने आठ साल कुछ नहीं किया!"
उन्होंने यह भी कहा कि "हम ऐसे शांति समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं, जो दशकों में नहीं हुए। यह इजरायल के प्रयासों और हमारी कूटनीतिक नीति का परिणाम है।"
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन की प्रक्रिया पारदर्शी तो है, लेकिन हमेशा विवादों से अछूती नहीं रही है।
2026 के पुरस्कार के लिए नामांकन जनवरी 2025 में किया गया, इसलिए ट्रंप की मौजूदा दावेदारी 2026 के लिए है, 2025 के लिए नहीं।
जहां एक ओर कुछ लोगों का मानना है कि ट्रंप ने इजराइल-हमास संघर्षविराम, अब्राहम समझौते और अफगानिस्तान वापसी जैसे मामलों में प्रभावी कूटनीति दिखाई, वहीं दूसरी ओर उनकी नीति, बयानबाजी और घरेलू हिंसा को बढ़ावा देने वाले बयानों को लेकर आलोचना भी होती रही है।
नोबेल की आधिकारिक वेबसाइट भी मानती है कि कई विजेता "विवादास्पद राजनीतिक एक्टिविस्ट" रहे हैं। इससे शांति पुरस्कार को अक्सर राजनीतिक हथियार की तरह भी देखा जाता है।
1901 में शुरू हुए इस पुरस्कार का उद्देश्य दुनिया में शांति की स्थापना और सशस्त्र संघर्षों को रोकना रहा है।
इन पुरस्कारों ने जहां अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों को मान्यता दी, वहीं कई बार राजनीतिक फैसलों के रूप में भी देखे गए।
डोनाल्ड ट्रंप का नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चौथी बार सामने आना यह संकेत देता है कि दुनिया के शक्तिशाली नेता अब इस पुरस्कार को एक डिप्लोमैटिक इंस्ट्रूमेंट की तरह देख रहे हैं।
इन सवालों के जवाब अभी समय के गर्भ में हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार नॉमिनेशन आने वाले दिनों में एक राजनीतिक बहस और वैश्विक संवाद का केंद्र जरूर बना रहेगा।
नोबेल पुरस्कार की विश्वसनीयता और गरिमा तब तक कायम रह सकती है जब तक उसके चयनकर्ता निष्पक्ष और मानवीय मूल्यों के आधार पर निर्णय लें। डोनाल्ड ट्रंप का नॉमिनेशन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या शांति सिर्फ कूटनीति से आती है या फिर इंसानियत, सहिष्णुता और समझदारी का भी इसमें बड़ा हाथ होता है?
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।