Synopsis
भारत में अगस्त के दौरान कई क्षेत्रों में बारिश ने कुछ राहत जरूर दी, लेकिन पूरे मानसून सीजन की तस्वीर अब भी चिंताजनक बनी हुई है। 1 जून से शुरू हुए मानसून में देश की संचयी बारिश सामान्य स्तर से करीब 14 प्रतिशत नीचे पहुंच गई है। इससे साफ है कि अगस्त में हुई बारिश जून और जुलाई के दौरान बनी कमी को पूरी तरह भरने में कामयाब नहीं रही।
Location: नई दिल्ली, भारत
Date: 30 अगस्त 2026
Byline: अपूर्वा चौधरी
भारतीय मौसम विभाग के 29 अगस्त तक के वर्षा आंकड़ों में दैनिक, साप्ताहिक, मासिक और 1 जून से संचयी बारिश की निगरानी जारी है। विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि अगले एक सप्ताह में प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की गतिविधियां अपेक्षाकृत कमजोर रह सकती हैं।
अगस्त की बारिश के बावजूद क्यों नहीं घटा घाटा?
मानसून की सबसे बड़ी समस्या इस साल सिर्फ कम बारिश नहीं, बल्कि उसका असमान वितरण रहा है। कुछ इलाकों में अच्छी या सामान्य से अधिक बारिश हुई, जबकि कई राज्यों में लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रही।
जून में कमजोर शुरुआत के बाद जुलाई में बारिश की स्थिति में कुछ सुधार देखने को मिला था। अगस्त में भी कई क्षेत्रों में बारिश हुई, लेकिन इससे पूरे देश के संचयी आंकड़े में पर्याप्त सुधार नहीं आया। नतीजतन मानसून का कुल घाटा करीब 14 प्रतिशत तक पहुंच गया।
यानी किसी इलाके में कुछ दिनों तक तेज बारिश होना पूरे सीजन की कमी को अपने आप खत्म नहीं करता। मानसून की वास्तविक स्थिति समझने के लिए लंबे समय की संचयी बारिश और उसके क्षेत्रीय वितरण को देखना जरूरी है।
बिहार, आंध्र प्रदेश और पंजाब समेत कई क्षेत्रों में कमी
बारिश की कमी का असर देश के अलग-अलग हिस्सों में एक जैसा नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार बिहार, आंध्र प्रदेश, पंजाब और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में कम बारिश ने राष्ट्रीय मानसूनी आंकड़े को प्रभावित किया है। देश के कई राज्यों में 20 प्रतिशत से अधिक बारिश की कमी भी दर्ज की गई है।
बिहार के लिए स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य की खेती का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर निर्भर करता है। हालिया रिपोर्टों में कमजोर मानसून को धान की खेती के लिए चिंता का कारण बताया गया है।
वहीं पंजाब जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में बारिश की कमी मिट्टी की नमी और सिंचाई की जरूरत को प्रभावित कर सकती है।
खेती पर क्या पड़ सकता है असर?
मानसून की असमान बारिश का सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। जिन क्षेत्रों में समय पर पर्याप्त बारिश नहीं हुई, वहां बुआई, फसल की शुरुआती बढ़वार और मिट्टी की नमी प्रभावित हो सकती है।
कम बारिश का असर केवल मौजूदा खरीफ फसल तक सीमित नहीं रहता। मिट्टी में नमी कम होने पर रबी सीजन की शुरुआत में भी सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है। कमजोर मानसून से कपास, सोयाबीन, मक्का और दलहन जैसी फसलों के उत्पादन पर भी दबाव पड़ने की आशंका जताई गई है।
हालांकि किसी फसल के अंतिम उत्पादन का आकलन अभी करना जल्दबाजी होगा, क्योंकि मानसून सीजन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और सितंबर की बारिश तस्वीर बदल सकती है।
महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
बारिश और कृषि उत्पादन का संबंध खाद्य कीमतों से भी जुड़ा हुआ है। यदि मानसून की कमी के कारण किसी महत्वपूर्ण खरीफ फसल का उत्पादन प्रभावित होता है, तो उसकी कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
दूसरी ओर, जिन इलाकों में अत्यधिक बारिश हुई है वहां फसल नुकसान, जलभराव और कटाव जैसी समस्याएं अलग तरह का आर्थिक नुकसान पैदा कर सकती हैं। इसलिए इस साल मानसून की चुनौती सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं बल्कि उसका असमान वितरण भी है।
जल संसाधनों के लिए भी चिंता
कम बारिश वाले क्षेत्रों में जलाशयों, भूजल और स्थानीय जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर ऐसे इलाके जहां सिंचाई और पेयजल व्यवस्था मानसूनी recharge पर काफी निर्भर करती है, वहां कमजोर बारिश का असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
हालांकि देश के सभी जलाशयों और राज्यों की स्थिति समान नहीं है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के बारिश घाटे को हर राज्य में समान जल संकट के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
सितंबर की बारिश पर टिकी उम्मीद
अब मानसून की अंतिम अवधि महत्वपूर्ण हो गई है। सितंबर में सामान्य से अच्छी बारिश होती है तो देश के कुछ हिस्सों में मौजूदा कमी कम हो सकती है। लेकिन अगर बारिश कमजोर रहती है तो पूरे सीजन का घाटा और बढ़ सकता है।
IMD के 29 अगस्त के अपडेट के अनुसार अगले एक सप्ताह में प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की गतिविधियां कमजोर रहने की संभावना है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में क्षेत्रीय स्तर पर मौसम की स्थिति अलग-अलग रह सकती है।
इसलिए अगले कुछ सप्ताह कृषि, जल संसाधन और खाद्य कीमतों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।
क्या यह सूखे जैसी स्थिति है?
करीब 14 प्रतिशत का राष्ट्रीय बारिश घाटा अपने आप पूरे देश में सूखे की स्थिति साबित नहीं करता। सूखे का आकलन स्थानीय बारिश, मिट्टी की नमी, जल उपलब्धता, फसल की स्थिति और अन्य मौसम संबंधी संकेतकों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
इसी तरह किसी राज्य में बारिश की कमी होने का अर्थ यह भी नहीं है कि वहां हर जिले में समान स्थिति है। IMD जिला और क्षेत्र स्तर पर बारिश के आंकड़ों की अलग-अलग निगरानी करता है।
अगस्त की बारिश ने देश के कई हिस्सों में राहत जरूर दी, लेकिन 2026 के मानसून की संचयी कमी अभी खत्म नहीं हुई है। जून से अब तक करीब 14 प्रतिशत का बारिश घाटा और कई क्षेत्रों में असमान वर्षा कृषि और जल संसाधनों के लिए चुनौती बनी हुई है।
अब सितंबर की बारिश सबसे अहम होगी। अगर मानसून की आखिरी अवधि में अच्छी बारिश होती है तो कुछ क्षेत्रों में स्थिति सुधर सकती है, लेकिन लंबे समय तक कमजोर गतिविधि रहने पर खरीफ उत्पादन, मिट्टी की नमी और आने वाले रबी सीजन पर दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्रीय औसत के साथ-साथ राज्य और जिला स्तर पर बारिश के वितरण को देखा जाए, क्योंकि इसी से वास्तविक स्थिति की बेहतर तस्वीर सामने आएगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।