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Uttar Pradesh

यूपी में 41 फर्जी डॉक्टरों पर एफआईआर, पंजीयन घोटाले की जांच तेज

Asif Khan • 2026-08-25 14:26:17
यूपी में 41 फर्जी डॉक्टरों पर एफआईआर, पंजीयन घोटाले की जांच तेज

41 फर्जी पंजीयन पर एफआईआर, अब खुलेगा पूरा राज

फर्जी डिग्री से डॉक्टर बने 41 लोगों पर शिकंजा

यूपी में फर्जी डॉक्टरों का मामला, अब पुलिस जांच तेज


उत्तर प्रदेश में 41 आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सकों के कथित फर्जी पंजीयन मामले में एफआईआर की कार्रवाई आगे बढ़ी है। एनसीआईएसएम की जांच में डिग्रियां फर्जी पाए जाने के बाद पंजीयन रद्द किए गए थे। कार्रवाई में देरी ने प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं। अब पुलिस जांच और व्यापक सत्यापन पर निगाहें हैं।


लोकेशन: लखनऊ, उत्तर प्रदेश

तारीख: 25 अगस्त 2026

बाय:Mohd Naved

41 फर्जी पंजीयन पर एफआईआर, यूपी के आयुर्वेदिक बोर्ड में उठे बड़े सवाल

उत्तर प्रदेश में आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा से जुड़े 41 कथित फर्जी पंजीयन का मामला अब पुलिस जांच के चरण में पहुंच गया है। दैनिक जागरण की 25 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, आयुर्वेदिक एवं यूनानी तिब्बी चिकित्सा पद्धति बोर्ड ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कराए गए पंजीयन के मामले में एफआईआर की कार्रवाई कराई है।

यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि इन 41 लोगों के पंजीयन पहले ही रद्द किए जा चुके थे। इसके बावजूद उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई में लंबा अंतराल रहा। 24 अगस्त की अमर उजाला रिपोर्ट में बताया गया था कि बोर्ड की ओर से तहरीर भेजे जाने के बावजूद सोमवार शाम तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। अगले दिन की रिपोर्टिंग में मामला आगे बढ़ता दिखाई देता है।

क्या हुआ?

मामला आयुर्वेदिक एवं यूनानी तिब्बी चिकित्सा पद्धति बोर्ड में कराए गए पंजीयन से जुड़ा है। शिकायत के बाद राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग यानी एनसीआईएसएम की जांच में पांच संदिग्ध मामलों के अलावा 36 अन्य लोगों के दस्तावेज भी कथित तौर पर फर्जी पाए गए।

अमर उजाला के मुताबिक, कुल 41 लोगों का डॉक्टर के तौर पर पंजीयन रद्द किया गया। संबंधित जिलों के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक और यूनानी अधिकारियों को भी सूची भेजी गई थी। कुछ जिलों में डिस्पेंसरी के लाइसेंस रद्द किए गए, लेकिन कई जगह एफआईआर की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी।

25 अगस्त की रिपोर्टिंग में सामने आया कि प्रशासक के आदेश के बाद हुसैनगंज कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराने की कार्रवाई हुई। इससे अब मामले की आपराधिक जांच का रास्ता खुलता है।

पूरा संदर्भ क्या है?

इस विवाद की शुरुआत केवल अगस्त 2026 से नहीं हुई। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार फर्जी पंजीयन को लेकर शिकायत पहले ही की जा चुकी थी। बाद में एनसीआईएसएम की जांच ने 41 मामलों को कार्रवाई के दायरे में ला दिया।

दैनिक जागरण से संबंधित उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2025 में 41 फर्जी पंजीयन की पुष्टि के बाद कार्रवाई के लिए लिखा गया था और 17 अप्रैल 2025 को इन सभी के पंजीयन रद्द किए गए। संबंधित क्षेत्रीय अधिकारियों को पुलिस कार्रवाई के लिए पत्र भी भेजा गया था।

यहीं से इस प्रकरण का सबसे गंभीर प्रशासनिक सवाल सामने आता है। अगर पंजीयन रद्द करने और पुलिस कार्रवाई की सिफारिश पहले हो चुकी थी, तो एफआईआर दर्ज होने में इतना समय क्यों लगा?

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, बोर्ड ने फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर पंजीयन कराने वालों की सूची संबंधित क्षेत्रीय अधिकारियों को भेजी थी और उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने का निर्देश दिया था। सीतापुर, गाजियाबाद और जौनपुर सहित कुछ जिलों में लाइसेंस रद्द किए गए, लेकिन एफआईआर के मामले में एक समान कार्रवाई नहीं हुई।

अगस्त 2026 में मामला फिर चर्चा में आया। बोर्ड की ओर से संबंधित अधिकारियों से पूछा गया कि रिपोर्ट अभी तक क्यों दर्ज नहीं हुई। इसके बाद मुख्यमंत्री स्तर पर शिकायत किए जाने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई।

25 अगस्त की रिपोर्टिंग इस घटनाक्रम में नया मोड़ दिखाती है। अब मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस जांच की दिशा में बढ़ गया है।

प्रमुख पक्षकारों का रुख

बोर्ड के रजिस्ट्रार डॉ. अखिलेश वर्मा के हवाले से अमर उजाला ने बताया कि फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर पंजीयन कराने वालों के नाम तत्कालीन बोर्ड अध्यक्ष के सामने रखे गए थे और संबंधित जिलों को सूची भेजी गई थी।

दूसरी तरफ बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. शैलेश कुमार राय ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। उन्होंने कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों को हटाने की मांग भी की है, ताकि जांच की निष्पक्षता पर सवाल न उठें। यह उनके आरोप और मांग हैं, इन्हें जांच में प्रमाणित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

नए प्रशासक मदन गर्ज्याल के हवाले से उपलब्ध रिपोर्टिंग में कहा गया है कि संदिग्ध पंजीयन की जांच के लिए टीम बनाई जा रही है और पुराने पंजीयन रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है।

उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि एनसीआईएसएम की जांच के बाद 41 पंजीयन रद्द किए गए थे। यह केवल मीडिया रिपोर्ट पर आधारित दावा नहीं है, बल्कि संबंधित बोर्ड और नियामकीय प्रक्रिया से जुड़ी कार्रवाई के रूप में रिपोर्ट किया गया है।

राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग अधिनियम, 2020 भारतीय चिकित्सा प्रणालियों की शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था के नियमन का वैधानिक ढांचा तय करता है। आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा में वैध शिक्षा तथा पेशेवर पंजीकरण इसी नियामकीय व्यवस्था का अहम हिस्सा है।

हालांकि, उपलब्ध स्रोतों से अभी यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सभी 41 लोगों ने जानबूझकर फर्जीवाड़ा किया था या इस प्रक्रिया में कितने अन्य व्यक्ति या अधिकारी शामिल थे। इसका निर्धारण पुलिस जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया से होगा।

संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?

इस मामले का पहला असर मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ेगा। अगर कोई व्यक्ति फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज के आधार पर चिकित्सकीय पंजीकरण हासिल करता है, तो सवाल केवल दस्तावेजी धोखाधड़ी का नहीं रहता। मरीजों के इलाज की सुरक्षा भी सीधे प्रभावित होती है।

दूसरा असर नियामकीय संस्थाओं की जवाबदेही पर पड़ेगा। पंजीयन रद्द होने के बाद भी पुलिस कार्रवाई में देरी हुई, तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया की निगरानी पर गंभीर सवाल पैदा करता है।

तीसरा असर उन वैध आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सकों पर पड़ सकता है जो निर्धारित शैक्षणिक और पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करके पेशे में हैं। ऐसे मामलों से पूरे पेशे की सार्वजनिक विश्वसनीयता प्रभावित होने का जोखिम रहता है।

राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव

इस मामले में राजनीतिक आरोपों से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। यदि जांच में यह सामने आता है कि दस्तावेजों के सत्यापन में जानबूझकर लापरवाही हुई, तो जिम्मेदारी केवल पंजीयन हासिल करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रह सकती।

लेकिन अभी किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी घोषित करना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध रिपोर्टों में कुछ पदाधिकारियों पर आरोप और जांच की मांग जरूर सामने आई है, लेकिन इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।

नीतिगत स्तर पर सबसे बड़ा सवाल डिजिटल वेरिफिकेशन और संस्थागत क्रॉस-चेक का है। शैक्षणिक डिग्री, विश्वविद्यालय रिकॉर्ड, इंटर्नशिप और पेशेवर पंजीकरण के बीच सीधा सत्यापन तंत्र फर्जी दस्तावेजों की गुंजाइश कम कर सकता है।

आर्थिक और सामाजिक असर

फर्जी पंजीयन का असर स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ सामाजिक भरोसे पर भी पड़ता है। मरीज आमतौर पर डॉक्टर की डिग्री और पंजीकरण की स्वतंत्र जांच नहीं करते। वे नियामकीय संस्थाओं पर भरोसा करते हैं।

अगर यही सत्यापन प्रक्रिया कमजोर हो, तो नुकसान मरीज को उठाना पड़ सकता है। ग्रामीण और छोटे शहरों में यह जोखिम अधिक गंभीर हो सकता है, क्योंकि वहां मरीजों के पास डॉक्टर की पेशेवर योग्यता जांचने के सीमित साधन होते हैं।

क्षेत्रीय और राष्ट्रीय प्रभाव

उत्तर प्रदेश का यह मामला व्यापक नियामकीय चुनौती की ओर भी इशारा करता है। भारतीय चिकित्सा प्रणाली के तहत आयुर्वेद, यूनानी और अन्य मान्य चिकित्सा पद्धतियों में पेशेवर मानकों और पंजीकरण की निगरानी महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्तर पर एनसीआईएसएम इसी व्यवस्था का हिस्सा है।

अगर यूपी में पुराने पंजीयनों की व्यापक जांच होती है और उसमें अतिरिक्त अनियमितताएं सामने आती हैं, तो यह राज्य के नियामकीय ढांचे के लिए बड़ा परीक्षण होगा। फिलहाल ऐसी संभावित संख्या को तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं है।

कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?

सबसे बड़ा सवाल है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पंजीयन हासिल करने की प्रक्रिया में कौन-कौन से सत्यापन स्तर पार किए गए।

दूसरा सवाल है कि 41 पंजीयन रद्द होने के बाद भी पुलिस कार्रवाई में देरी क्यों हुई।

तीसरा सवाल यह है कि क्या सभी संबंधित जिलों में इन लोगों के चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों की जांच और लाइसेंस सत्यापन पूरा हुआ।

चौथा सवाल है कि क्या जांच केवल 41 मामलों तक सीमित रहेगी या पुराने पंजीयनों का भी व्यापक ऑडिट होगा।

इन सवालों के जवाब पुलिस जांच, बोर्ड के रिकॉर्ड और आगे सामने आने वाले आधिकारिक दस्तावेजों से मिलेंगे।

आगे क्या होगा?

अब पुलिस के सामने दस्तावेजों की सत्यता, पंजीयन प्रक्रिया, संबंधित संस्थानों के रिकॉर्ड और संभावित मिलीभगत की जांच जैसे पहलू होंगे।

बोर्ड स्तर पर भी पुराने रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण होगी। उपलब्ध रिपोर्टिंग में लंबे समय के पंजीकरण रिकॉर्ड की समीक्षा की बात सामने आई है।

जांच में यदि अतिरिक्त फर्जी पंजीयन सामने आते हैं, तो उनके खिलाफ अलग-अलग कार्रवाई की जरूरत होगी। वहीं यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका प्रमाणित होती है, तो विभागीय और आपराधिक दोनों स्तरों पर कार्रवाई का सवाल उठ सकता है।

संपादकीय निष्कर्ष

41 कथित फर्जी पंजीयन का मामला उत्तर प्रदेश की आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा व्यवस्था में दस्तावेज सत्यापन और प्रशासनिक जवाबदेही की गंभीर परीक्षा है। पंजीयन रद्द करना पहला कदम था। अब निष्पक्ष पुलिस जांच यह तय करेगी कि फर्जी दस्तावेज कहां से आए, सत्यापन कैसे हुआ और कार्रवाई में देरी क्यों हुई।

इस पूरे प्रकरण में दोष तय करने से पहले जांच पूरी होना जरूरी है। लेकिन एक बात स्पष्ट है। चिकित्सकीय पंजीकरण व्यवस्था में किसी भी तरह की लापरवाही का सीधा असर जनता के स्वास्थ्य और संस्थागत भरोसे पर पड़ता है। इसलिए जांच का दायरा तथ्य, दस्तावेज और जवाबदेही तक सीमित रहते हुए पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ना चाहिए।

वीडियो देखें

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Asif Khan

Asif Khan

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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