जम्मू में एक निजी शादी समारोह के दौरान जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला पर फायरिंग की घटना ने पूरे मुल्क की सियासत और सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गनीमत रही कि वह और उनके साथ मौजूद उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी सुरक्षित बच गए।
हमलावर कमल सिंह जामवाल को मौके पर ही हिरासत में ले लिया गया। शुरुआती पूछताछ में उसने दावा किया कि वह पिछले बीस वर्षों से फारूक अब्दुल्ला को निशाना बनाना चाहता था।
यह घटना केवल एक सुरक्षा चूक नहीं बल्कि उस सियासी माहौल की भी झलक है, जिसमें नफरत, नाराज़गी और निजी एजेंडा कभी-कभी हिंसा की शक्ल ले लेते हैं। यह सवाल भी उठ रहा है कि जब उच्च स्तर की सुरक्षा मौजूद थी तो हथियार लेकर कोई व्यक्ति इतना करीब कैसे पहुंच गया।
जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित एक मैरिज कार्यक्रम में माहौल पूरी तरह खुशगवार था। मेहमान बातचीत कर रहे थे, दूल्हा-दुल्हन के रिश्तेदार रस्मों में मशगूल थे और सियासी हलकों की कई जानी-मानी शख्सियतें भी मौजूद थीं।
इसी माहौल के बीच अचानक एक शख्स ने पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के बेहद करीब पहुंचकर बंदूक तान दी और फायर कर दिया।
खुशकिस्मती से गोली सीधे उन्हें नहीं लगी और सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत हमलावर को काबू कर लिया।
यह घटना भले कुछ सेकंड की रही हो, मगर इसके असर दूर तक महसूस किए जा रहे हैं।
क्योंकि जब किसी बड़े सियासी नेता पर इस तरह हमला होता है, तो वह सिर्फ एक शख्स पर हमला नहीं माना जाता बल्कि पूरी सियासी व्यवस्था और अमन-ओ-अमान के ढांचे पर सवाल बन जाता है।
पुलिस के मुताबिक हमलावर का नाम कमल सिंह जामवाल है और वह जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का रहने वाला है।
बताया जा रहा है कि वह कई दुकानों का मालिक है और किराये से अपनी गुजर-बसर करता है।
पूछताछ के दौरान उसने जो बयान दिया वह और भी ज्यादा हैरान करने वाला है।
उसने दावा किया कि वह लगभग बीस साल से फारूक अब्दुल्ला को मारने की इच्छा रखता था और यह उसका निजी एजेंडा था।
यह बयान कई नए सवाल पैदा करता है।
क्या यह सिर्फ एक शख्स की व्यक्तिगत दुश्मनी थी?
या फिर इसके पीछे कोई सियासी नफरत या कट्टर सोच काम कर रही थी?
इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा, मगर इतना जरूर है कि इस बयान ने पूरे मामले को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू सुरक्षा व्यवस्था है।
फारूक अब्दुल्ला जैसे वरिष्ठ सियासी नेता को उच्च स्तर की सुरक्षा प्राप्त होती है। ऐसे में कोई व्यक्ति हथियार लेकर इतनी नजदीक कैसे पहुंच गया, यह सबसे बड़ा सवाल है।
उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने भी इस पर नाराज़गी जताते हुए कहा कि कार्यक्रम स्थल पर स्थानीय पुलिस की मौजूदगी बेहद कम थी।
यह एक गंभीर मसला है।
क्योंकि अगर किसी नेता की सुरक्षा में जरा भी ढिलाई हो जाए तो उसका अंजाम बहुत खतरनाक हो सकता है।
भारत में अतीत में कई ऐसे हादसे हो चुके हैं जहां सुरक्षा में छोटी सी चूक ने बड़े राजनीतिक हादसों को जन्म दिया।
इसलिए यह घटना केवल एक स्थानीय घटना नहीं बल्कि सुरक्षा ढांचे की समीक्षा की जरूरत का संकेत भी है।
जम्मू-कश्मीर की सियासत हमेशा से बेहद संवेदनशील रही है।
यहां राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं बल्कि पहचान, इतिहास और भावनाओं से भी जुड़ी हुई है।
फारूक अब्दुल्ला लंबे समय से कश्मीर की राजनीति के अहम किरदार रहे हैं।
उनका परिवार कई दशकों से क्षेत्रीय राजनीति में प्रभावशाली रहा है।
ऐसे में उन पर हमला केवल एक व्यक्ति को निशाना बनाने की कोशिश नहीं बल्कि उस राजनीतिक विरासत को चुनौती देने जैसा भी माना जा सकता है।
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हमले के पीछे कोई संगठित साजिश थी या नहीं।
लेकिन यह सच है कि कश्मीर की राजनीति में तनाव और मतभेद अक्सर बेहद तीखे रहे हैं।
इस घटना को केवल सुरक्षा चूक मानकर नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं होगा।
क्योंकि अगर कोई व्यक्ति दो दशकों तक किसी सियासी नेता के प्रति इतनी नफरत पालता रहे कि अंततः हथियार उठा ले, तो यह समाज के भीतर बढ़ती कटुता का भी संकेत हो सकता है।
आज के दौर में सोशल मीडिया, अफवाहें और सियासी ध्रुवीकरण अक्सर लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं।
कई बार लोग किसी नेता को अपनी सभी परेशानियों का जिम्मेदार मानने लगते हैं।
यह सोच धीरे-धीरे गुस्से और फिर हिंसा में बदल सकती है।
इसलिए इस घटना को सामाजिक मनोविज्ञान के नजरिये से भी समझना जरूरी है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि यहां असहमति की पूरी आजादी होती है।
कोई भी नागरिक किसी नेता की नीतियों से असहमत हो सकता है, आलोचना कर सकता है और चुनाव में उसे हरा सकता है।
लेकिन जब असहमति की जगह हिंसा ले लेती है तो लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है।
फारूक अब्दुल्ला पर हुआ हमला इसी खतरे की याद दिलाता है।
अगर हर राजनीतिक मतभेद का जवाब बंदूक से दिया जाने लगे तो लोकतांत्रिक संवाद खत्म हो जाएगा।
इसलिए जरूरी है कि समाज में राजनीतिक बहस और आलोचना को स्वस्थ तरीके से स्वीकार करने की संस्कृति मजबूत हो।
हमले के बाद कई नेताओं ने प्रतिक्रिया दी है।
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि यह ऊपर वाले की मेहरबानी है कि उनके पिता सुरक्षित हैं।
उनका बयान भावनात्मक भी था और चेतावनी भी।
उन्होंने यह भी पूछा कि इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद कोई व्यक्ति इतने करीब कैसे पहुंच गया।
यह सवाल केवल एक परिवार का नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे का है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जांच से क्या सामने आएगा।
पुलिस कई पहलुओं पर जांच कर रही है।
जैसे कि
हमलावर की मानसिक स्थिति
उसके संपर्क और पृष्ठभूमि
हथियार कहां से आया
सुरक्षा व्यवस्था में कौन सी कमी रही
अगर जांच पारदर्शी और गंभीर तरीके से होती है तो यह भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने में मदद कर सकती है।
यह घटना अंततः एक चेतावनी की तरह है।
सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।
सियासी संवाद को संयमित बनाने की जरूरत है।
और समाज में नफरत की जगह समझदारी को बढ़ावा देने की जरूरत है।
फारूक अब्दुल्ला का सुरक्षित बच जाना राहत की बात है, मगर इस घटना से जो सवाल उठे हैं उन्हें अनसुना नहीं किया जा सकता।
क्योंकि कभी-कभी एक गोली केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज को आईना दिखा देती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।