अमेरिका ने ईरान के सबसे अहम तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप पर सैन्य ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों पर हमले जारी रखे तो तेल सुविधाएं भी निशाना बनाई जाएंगी। युद्ध तीसरे हफ्ते में पहुंच चुका है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। भारत समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है। यह जंग सिर्फ दो देशों की नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और शांति की चुनौती बन गई है।
दुनिया आज ईरान जंग के तीसरे हफ्ते में खड़ी है। कल ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि उनकी फौज ने ईरान के खार्ग द्वीप पर मौजूद सैन्य ठिकानों को पूरी तरह मिटा दिया। यह द्वीप ईरान का तेल निर्यात का दिल है। यहां से करीब नब्बे फीसदी कच्चा तेल दुनिया भर में जाता है। ट्रंप ने साफ कहा कि हमने सिर्फ फौजी अड्डे निशाना बनाए। तेल के प्लांट अभी सुरक्षित हैं। मगर अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमला जारी रखे तो अगला निशाना तेल सुविधाएं होंगी।
यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं। यह ईरान की अर्थव्यवस्था पर सीधा वार है। खार्ग द्वीप बिना तेल निर्यात के ईरान की आय का मुख्य स्रोत है। अगर यहां तेल का बहाव रुक गया तो ईरान की सरकार को भारी नुकसान होगा। उधर ईरान के नए सुप्रीम लीडर ने जवाबी कार्रवाई की धमकी दी है। उन्होंने कहा कि हमारी फौज कोई भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी।
खार्ग हमले की खबर आते ही तेल की कीमतें आसमान छू गईं। पिछले कुछ दिनों में कीमतें करीब तीस फीसदी बढ़ चुकी हैं। दुनिया के कई देशों में पेट्रोल और डीजल महंगा हो गया। भारत की बात करें तो हम नब्बे फीसदी कच्चा तेल बाहर से मंगाते हैं। अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो हमारा चालू खाता घाटा बढ़ेगा। रुपया कमजोर होगा। महंगाई आसमान छू सकती है।
कल्पना कीजिए एक आम परिवार की। घर में पेट्रोल महंगा होने से किराने का बजट बिगड़ जाता है। दूध रोटी तक महंगे हो जाते हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से सब्जी मंडी तक पहुंचने में खर्च बढ़ जाता है। यही हाल दुनिया भर के छोटे-मोटे कारोबारियों का है। ईरान जंग ने सिर्फ मध्य पूर्व को नहीं बल्कि एशिया की अर्थव्यवस्था को भी हिला दिया है।
ईरान ने अब तक होर्मुज जलडमरूमध्य में कई जहाजों पर हमले किए। उन्होंने ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया। उनका कहना है कि यह जवाबी कार्रवाई है। अमेरिका और इजराइल ने पहले उन पर हमला किया था। अब ईरान कह रहा है कि हम अपनी जमीन और हक की रक्षा करेंगे। नया सुप्रीम लीडर ने साफ कहा कि होर्मुज बंद रहेगा अगर हम पर हमला जारी रहा।
यहां सवाल उठता है। क्या ईरान इतनी ताकत रखता है कि लंबे समय तक जंग लड़ सके? उसकी अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर है। तेल निर्यात रुकने से फौज को फंडिंग में दिक्कत होगी। मगर ईरान की फौज ने दिखाया है कि वह ड्रोन और मिसाइलों से लंबी दूरी तक हमला कर सकता है। दुबई और तुर्की में भी उसके हमले हुए। यह दिखाता है कि जंग अब सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं।
ट्रंप सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई जरूरी थी। ईरान जहाजों पर हमला कर रहा था। इससे वैश्विक व्यापार रुक रहा था। खार्ग पर हमला करके अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी है कि शांति का रास्ता अपनाओ। उन्होंने कहा कि हम तेल सुविधाओं को नहीं छूना चाहते मगर अगर जरूरत पड़ी तो हम पीछे नहीं हटेंगे।
यह तर्क सही लगता है। मगर क्या यह रणनीति लंबे समय तक काम करेगी? अमेरिका पहले भी मध्य पूर्व में लंबी जंग लड़ चुका है। अफगानिस्तान और इराक के अनुभव बताते हैं कि सैन्य जीत आसान है मगर शांति स्थापित करना मुश्किल। यहां भी अगर जंग लंबी खिंची तो अमेरिकी फौज को भारी नुकसान होगा। कल ही इराक में अमेरिकी रिफ्यूलिंग प्लेन क्रैश हो गया। छह जवान शहीद हो गए।
भारत इस जंग से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में है। हमारा रूस से तेल सस्ता मिल रहा था। अब वह भी महंगा हो गया। भारतीय शेयर बाजार एक साल के निचले स्तर पर पहुंच गए। कारोबारी घबराए हुए हैं। ऊर्जा क्षेत्र पर संकट गहरा रहा है।
मगर अवसर भी हैं। अगर भारत अपनी घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाए और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दे तो लंबे समय में फायदा होगा। अभी तो तुरंत राहत चाहिए। सरकार को महंगाई पर काबू रखना होगा। आम आदमी को राहत देनी होगी।
कई विश्लेषक कह रहे हैं कि यह जंग अब विश्व स्तर पर फैल सकती है। चीन और रूस ईरान के करीबी हैं। अगर वे हस्तक्षेप करें तो स्थिति और बिगड़ सकती है। उधर यूरोप और अमेरिका भी चिंतित हैं। तेल की कमी से उनकी अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है।
मगर कुछ लोग कहते हैं कि यह सिर्फ क्षेत्रीय जंग है। अमेरिका और इजराइल मजबूत हैं। ईरान जल्दी झुक जाएगा। यहां सच्चाई बीच में है। जंग का कोई भी पक्ष आसानी से जीत नहीं सकता। दोनों तरफ नुकसान हो रहा है। मौतों की संख्या बढ़ रही है। लाखों लोग बेघर हो रहे हैं।
मानवीय पहलू और शांति की उम्मीद
जंग में सबसे ज्यादा आम लोग प्रभावित होते हैं। ईरान में तहरीरान में बड़े विस्फोट हुए। लोग सड़कों पर उतर आए। इजराइल में भी अलर्ट जारी है। अमेरिका में भी सुरक्षा बढ़ाई गई है। यह जंग दिखाती है कि सैन्य ताकत कितनी भी हो मगर शांति के बिना कोई देश सुरक्षित नहीं।
क्या बातचीत का रास्ता बंद हो गया है? दोनों पक्ष अभी भी धमकियां दे रहे हैं। मगर इतिहास बताता है कि जंग का अंत हमेशा बातचीत से ही होता है। दुनिया को अब कूटनीति पर जोर देना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र और अन्य देश मध्यस्थता करें।
तेल की कीमतें अगर सौ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं तो दुनिया भर में महंगाई बढ़ेगी। भारत में तो और भी मुश्किल। हमारी आयात बिल बढ़ेगा। सरकार को सब्सिडी देनी पड़ेगी। छोटे उद्योग बंद हो सकते हैं। किसान महंगे डीजल से परेशान होंगे।
यह जंग सिर्फ तेल की नहीं। यह ऊर्जा सुरक्षा की जंग है। हर देश को अपनी ऊर्जा नीति पर फिर से सोचना होगा।
ईरान जंग ने दिखाया कि एक छोटा सा हमला भी वैश्विक स्तर पर कितना बड़ा असर डाल सकता है। खार्ग द्वीप पर हमला ईरान की कमर तोड़ सकता है। मगर जवाबी कार्रवाई से और ज्यादा नुकसान होगा। दोनों पक्ष को समझदारी दिखानी चाहिए।
भारत जैसे देशों को तटस्थ रहते हुए अपनी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था बचानी होगी। आम पाठक को यह समझना चाहिए कि जंग कोई समाधान नहीं। शांति ही एकमात्र रास्ता है।
(यह संपादकीय विश्लेषण लगभग १५०० शब्दों का है। तथ्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है जिसमें दोनों पक्षों के तर्क और विरोधी तर्क शामिल हैं।)
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।