📍Goa✍️Asif Khan
गोवा के अरपोरा स्थित एक नाइट क्लब में लगी आग ने 23 जिंदगियां छीन लीं। दम घुटना मौत की वजह बना, लापरवाही सिस्टम की पहचान। यह सिर्फ हादसा नहीं, चेतावनी है।
चमकते साइनबोर्ड और दम घुटती सांसें
गोवा के अरपोरा का नाइट क्लब बाहर से एक चमकता सपना था। अंदर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए वह रोज़ की रोटियां थीं। शनिवार की आधी रात, जब शहर संगीत की धुनों पर झूम रहा था, उसी वक्त बेसमेंट में वो लोग फंसे थे, जो इस चमक को चलाते थे। सिलेंडर का विस्फोट हुआ और धुआं इस कदर फैला कि सांसें रास्ता भूल गईं। 23 लोग दम घुटने से मर गए। यह संख्या नहीं, एक-एक परिवार का सन्नाटा है।
हादसा या लापरवाही का नतीजा
हर बड़े हादसे के बाद हम एक शब्द सुनते हैं, दुर्भाग्य। मगर क्या यह सिर्फ दुर्भाग्य था। जब मुख्यमंत्री खुद कह रहे हैं कि क्लब ने अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन नहीं किया, तो यह हादसा नहीं, लापरवाही का परिणाम बन जाता है। सवाल यह भी है कि जब नियमों का पालन नहीं था तो संचालन की अनुमति किसने दी।
तहखाने में फंसी जिंदगियां
बताया गया कि अधिकतर मौतें इसलिए हुईं क्योंकि लोग घबराकर बेसमेंट की ओर भागे। यह बात अपने आप में सिस्टम पर एक बड़ी चोट है। क्या वहां आपातकालीन निकास सही था। क्या वहां संकेत थे। क्या कर्मचारियों को कभी आग से बचाव की ट्रेनिंग दी गई। इन सवालों में ही जवाब छिपा है।
पर्यटन की चमक और मजदूर की साया
गोवा को सुरक्षित माना जाता है। पर्यटक आते हैं, तस्वीरें लेते हैं, पार्टी करते हैं। लेकिन जो लोग रात भर काम करते हैं, उनके लिए सुरक्षा अक्सर आखिरी प्राथमिकता होती है। इस हादसे में मारे गए ज़्यादातर लोग स्थानीय कर्मचारी थे। यह वही वर्ग है जो हर पार्टी को सफल बनाता है और खुद सबसे ज्यादा असुरक्षित रहता है।
प्रशासन की भूमिका या खामोशी
यह मान लेना आसान है कि गलती सिर्फ क्लब मालिक की थी। लेकिन सच्चाई यह भी है कि जिस विभाग ने एनओसी दी, जिस अधिकारी ने फाइल पर दस्तखत किए, वह भी इस त्रासदी का हिस्सा है। सवाल यह नहीं कि कार्रवाई होगी या नहीं, सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ एक-दो नामों तक सीमित रहेगी या सिस्टम तक पहुंचेगी।
जांच और वादों की पुरानी कहानी
हर बार हादसे के बाद जांच होती है। रिपोर्ट बनती है। दो महीने, चार महीने, फिर फाइलों में धूल जम जाती है। आम आदमी भूल जाता है। क्लब बदल जाता है, नाम नया हो जाता है। बस इंतजार रहता है अगले हादसे का। यह पैटर्न अब पहचान में आने लगा है।
राजनीति की संवेदनाएं और जवाबदेही का फर्क
प्रधानमंत्री मोदी ने शोक जताया, मुआवजा घोषित हुआ। यह जरूरी है। लेकिन क्या केवल मुआवजा किसी परिवार का पिता लौटाता है। क्या पैसे किसी मां का बेटा वापस ला सकते हैं। संवेदनाएं ज़रूरी हैं, लेकिन उनके साथ जवाबदेही उससे भी ज़्यादा जरूरी है।
सेफ्टी ऑडिट एक औपचारिकता या ज़रूरत
विधायक माइकल लोबो ने सभी क्लबों के सेफ्टी ऑडिट की बात कही। यह बात सही है। मगर सवाल यह है कि जब तक कोई मरता नहीं, तब तक ऑडिट क्यों नहीं होता। सेफ्टी ऑडिट अगर एक रूटीन प्रक्रिया होती, तो शायद अरपोरा की रात इतनी काली न होती।
शहरों की रात और कानून की नींद
भारत के कई शहरों में नाइट कल्चर तेजी से बढ़ा है। इससे रोजगार मिलता है, अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। लेकिन कानून अकसर इन रातों में सोता दिखाई देता है। अग्निशमन इंतजाम, निकास के रास्ते, भीड़ की सीमा, सब कागज पर सही होते हैं, ज़मीन पर नहीं।
काम करने वालों की अदृश्य दुनिया
एक साधारण उदाहरण लें। जब हम किसी रेस्तरां में खाना खाते हैं तो हमें प्लेट दिखती है, शेफ नहीं। क्लब में हमें रोशनी दिखती है, कबाड़ से लकड़ी निकालने वाला कर्मचारी नहीं। हादसे के बाद पहली बार समाज उन चेहरों को देखता है जो हमेशा परदे के पीछे होते हैं।
कानून सख्त है या सिर्फ शब्दों में
भारत में अग्नि सुरक्षा के नियम मौजूद हैं। दंड भी तय हैं। लेकिन उनका पालन कराने की इच्छाशक्ति कमजोर है। छोटे दुकानदार पर तो तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े क्लब और होटल अक्सर नियमों से ऊपर माने जाते हैं।
क्या यह आखिरी चेतावनी होगी
हर बड़ी त्रासदी अपने साथ एक चेतावनी लाती है। अरपोरा की आग ने भी वही किया है। सवाल यह नहीं कि चेतावनी आई या नहीं, सवाल यह है कि क्या इस बार सुनी जाएगी।
समाज की भूमिका भी कम नहीं
हम भी अक्सर उन जगहों पर जाते हैं जहां हमें खुद शक होता है कि सुरक्षा पुख्ता नहीं है। हम सोचते हैं कि आज तो कुछ नहीं होगा। यही “आज” कई बार किसी का आखिरी दिन बन जाता है। सवाल यह भी है कि क्या हम उपभोक्ता होने के नाते सुरक्षित जगहों को चुनने की आदत डालते हैं।
सिस्टम को आईने में देखने की जरूरत
अरपोरा की आग सिर्फ एक घटना नहीं, एक आईना है। इस आईने में प्रशासन, राजनीति, कारोबारी और हम सबका चेहरा दिखाई देता है। कोई भी पूरी तरह निर्दोष नहीं है।
आख़िर में एक सीधी बात
यह हादसा हमें डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। अगर अब भी सुरक्षा सिर्फ कागज पर रही, अगर अब भी नियम सिर्फ भाषणों में रहे, तो अगली खबर किस शहर से आएगी, यह हम नहीं जानते। लेकिन इतना तय है कि फिर हम वही शब्द दोहराएंगे, दुर्भाग्यपूर्ण, दुखद, जांच होगी।
और शायद फिर कोई बेसमेंट में दम घुटने से मर जाएगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।