स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों ने 2026 में 5% से ज्यादा बर्फ खोई। कम बर्फबारी और गर्म, शुष्क मौसम ने पिघलाव बढ़ाया, जिससे भविष्य की जल सुरक्षा पर चिंता बढ़ी।
स्विट्जरलैंड | 1 अक्टूबर 2026
By Mohd Haris
स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों पर बढ़ता संकट
स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों के लिए 2026 का साल बेहद नुकसानदेह रहा है। ताजा ग्लेशियर मॉनिटरिंग आंकड़ों के मुताबिक, देश के ग्लेशियरों ने 2026 में अपने कुल बर्फीले आयतन का 5% से ज्यादा खो दिया। औसतन ग्लेशियरों की मोटाई में 2.5 से 4 मीटर तक कमी दर्ज की गई, जबकि कुछ ग्लेशियरों की बर्फीली जीभों में 10 मीटर तक की कमी देखी गई।
यह नुकसान केवल पहाड़ों तक सीमित पर्यावरणीय बदलाव नहीं है। ग्लेशियर आल्प्स के जल चक्र का अहम हिस्सा हैं। गर्म और शुष्क मौसम में बर्फ और ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी नदियों के बहाव को सहारा देता है। इसलिए ग्लेशियरों का लगातार सिकुड़ना भविष्य में पानी की उपलब्धता, कृषि, जलविद्युत और नदी तंत्र पर असर डाल सकता है।
2026 में क्या बदला
स्विस ग्लेशियर मॉनिटरिंग नेटवर्क GLAMOS की 2026 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल ग्लेशियरों के नुकसान की रफ्तार बेहद ऊंची रही। रिपोर्ट में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि 2026 में स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों का 5% से ज्यादा आयतन खत्म हुआ।
यह आंकड़ा 2022 के रिकॉर्ड पिघलाव से थोड़ा नीचे है, लेकिन मौजूदा ग्लेशियरों का आकार पहले की तुलना में काफी कम हो चुका है। इसलिए समान स्तर का पिघलाव अब बचे हुए ग्लेशियर भंडार के लिहाज से ज्यादा गंभीर असर डालता है।
2021 से 2026 के बीच स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों के कुल आयतन का लगभग 20% हिस्सा खत्म हो चुका है। कई छोटे ग्लेशियरों के पूरी तरह गायब होने की भी जानकारी सामने आई है। !
गर्मी और कम बर्फबारी ने बढ़ाया दबाव
2026 के ग्लेशियर संकट के पीछे दो प्रमुख मौसमी कारक सामने आए हैं। पहला, सर्दियों में सामान्य से कम बर्फबारी। दूसरा, मई से सितंबर के बीच गर्म और शुष्क मौसम।
आधिकारिक स्विस वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, 2025-26 की सर्दी देश की सबसे कम बर्फ वाली सर्दियों में शामिल रही। इसके बाद गर्मियों में लगातार गर्म मौसम ने ऊंचाई वाले इलाकों तक बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज कर दी।
2026 की गर्मियों में 76 दिनों तक ऐसी गर्म परिस्थितियां बनी रहीं, जिनमें हिमांक रेखा 4,000 मीटर से ऊपर पहुंच गई। यह स्थिति सामान्य औसत से काफी ज्यादा थी। सितंबर तक 3,500 मीटर की ऊंचाई पर भी कई जगह सुरक्षात्मक बर्फ की परत खत्म हो गई थी।
ग्लेशियरों के लिए बर्फ की यह परत बेहद महत्वपूर्ण होती है। नई बर्फ सूर्य की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा परावर्तित करती है और नीचे मौजूद पुरानी बर्फ को गर्मी से बचाती है। जब यह परत जल्दी खत्म हो जाती है, तो पुरानी बर्फ सीधे गर्म वातावरण और सौर विकिरण के संपर्क में आती है।
इससे पिघलाव की रफ्तार और बढ़ सकती है।
2026 में कितना पानी पिघलकर निकला
ग्लेशियरों का पिघलना इस साल स्विट्जरलैंड के लिए एक जटिल स्थिति लेकर आया। एक तरफ इससे ग्लेशियरों का स्थायी बर्फ भंडार कम हुआ। दूसरी तरफ गर्म और सूखे महीनों में पिघलने वाली बर्फ ने नदियों और जल प्रणालियों को अतिरिक्त पानी दिया।
आकलन के अनुसार, जुलाई से सितंबर के बीच स्विस ग्लेशियरों से करीब 2,200 अरब लीटर पानी निकला। यह मात्रा स्विस परिवारों की वार्षिक घरेलू पेयजल खपत से 4 गुना से ज्यादा बताई गई है। !
लेकिन इस आंकड़े को पानी की उपलब्धता में स्थायी बढ़ोतरी के रूप में देखना सही नहीं होगा।
यह पानी असल में ग्लेशियरों के लंबे समय से जमा बर्फीले भंडार के नुकसान का हिस्सा है। यानी मौजूदा सूखे में ग्लेशियरों ने पानी की कमी को कुछ हद तक कम किया, लेकिन इसकी कीमत ग्लेशियरों के भविष्य के भंडार में कमी के रूप में चुकानी पड़ी।
यही इस संकट का सबसे अहम पहलू है।
ग्लेशियर अभी राहत दे रहे हैं, लेकिन भविष्य में यही स्रोत कमजोर हो सकता है।
स्विट्जरलैंड में पहले से था सूखे का दबाव
ग्लेशियरों का पिघलाव ऐसे समय में बढ़ा जब स्विट्जरलैंड खुद गंभीर सूखे और जल संकट जैसी परिस्थितियों से गुजर रहा था।
स्विस संघीय वैज्ञानिक संस्थानों के अगस्त 2026 के आकलन में बताया गया था कि गर्मियों के दौरान देश के कई हिस्सों में नदियों का जलस्तर रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। कुछ जलाशयों और झीलों में भी असामान्य रूप से कम जलस्तर दर्ज किया गया।
कम वर्षा, कम बर्फबारी और लगातार गर्म मौसम ने स्थिति को और जटिल किया। कई क्षेत्रों में मिट्टी और भूजल पर भी दबाव बढ़ा।
अगस्त में देश के संघीय भूजल निगरानी नेटवर्क के करीब आधे माप केंद्रों पर भूजल स्तर औसत से नीचे दर्ज किया गया था। जल संकट का असर कृषि और अन्य जल-निर्भर क्षेत्रों पर भी पड़ा।
कुछ पर्वतीय किसानों को पानी और चारे की कमी के कारण अपने मवेशियों को सामान्य समय से पहले घाटियों की ओर लाना पड़ा। कुछ इलाकों में कृषि सिंचाई पर भी प्रतिबंध लगाए गए।
ग्लेशियर और यूरोप की बड़ी नदियां
स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों का महत्व केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। आल्प्स से निकलने वाली जल प्रणालियां यूरोप के बड़े नदी तंत्रों से जुड़ी हैं।
राइन और रोन जैसी प्रमुख नदियों के जल प्रवाह में गर्म और शुष्क मौसम के दौरान ग्लेशियरों का योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है। स्विस जलवायु अनुसंधान के अनुसार, ग्लेशियर गर्मियों में खासकर उन परिस्थितियों में जल प्रवाह को सहारा देते हैं, जब वर्षा और बर्फ पिघलने से मिलने वाला पानी कम हो।
एक वैज्ञानिक अध्ययन में 2022 के सूखे का विश्लेषण करते हुए पाया गया कि अत्यधिक गर्म और शुष्क परिस्थितियों में ग्लेशियरों से आने वाला अतिरिक्त पिघला पानी कुछ जलग्रहण क्षेत्रों में वर्षा और बर्फ पिघलने की कमी को काफी हद तक संतुलित कर रहा था।
लेकिन उसी अध्ययन ने एक महत्वपूर्ण बदलाव भी दर्ज किया। ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में कमी के कारण कुल ग्लेशियर पिघलाव से मिलने वाले पानी की मात्रा पहले की तुलना में घट रही है।
यही बदलाव भविष्य की जल सुरक्षा के लिए अहम है।
पानी का अस्थायी सहारा, स्थायी समाधान नहीं
ग्लेशियरों से आने वाला अतिरिक्त पानी गर्मियों के सूखे के दौरान राहत देता है। लेकिन इसे जल सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था नहीं माना जा सकता।
ग्लेशियर एक प्राकृतिक जल भंडार की तरह काम करते हैं। सर्दियों में बर्फ जमा होती है और गर्म महीनों में धीरे-धीरे पिघलकर नदियों और झरनों में पानी पहुंचाती है।
जब ग्लेशियर का आकार घटता है, तो यह भंडारण क्षमता भी कम होती जाती है।
शुरुआती चरण में तेज पिघलाव से नदी में पानी बढ़ सकता है। लेकिन लंबे समय में जब बर्फ का भंडार काफी घट जाता है, तब अत्यधिक गर्मी के दौरान भी पहले जैसी मात्रा में पानी उपलब्ध नहीं रहती।
वैज्ञानिक शोध में 2022 के सूखे के दौरान इसी बदलाव के संकेत मिले थे। ग्लेशियरों के छोटे होने के कारण कुल पिघलने वाले पानी की मात्रा कई जलग्रहण क्षेत्रों में कम हुई थी।
कुछ ग्लेशियर पूरी तरह गायब
2026 के आंकड़ों में कई छोटे ग्लेशियरों का पूरी तरह खत्म होना भी दर्ज किया गया है।
GLAMOS आधारित रिपोर्ट के अनुसार, बेल्ला टोला और ग्रीसफिर्न जैसे छोटे ग्लेशियरों के पूरी तरह गायब होने की पुष्टि हुई है। रोन, एलेट्श और क्लारिडेन समेत कई बड़े ग्लेशियरों में भी इस साल रिकॉर्ड स्तर का पिघलाव दर्ज किया गया।
यह बदलाव पर्वतीय भू-दृश्य को भी प्रभावित करता है।
जहां पहले स्थायी बर्फ और हिमनद मौजूद थे, वहां अब चट्टानी सतह और अस्थिर बर्फीले क्षेत्र तेजी से सामने आ रहे हैं। ग्लेशियर पीछे हटने के साथ नई झीलें और जल निकासी के नए रास्ते भी विकसित हो सकते हैं। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़े अन्य जोखिमों की निगरानी की जरूरत बढ़ती है।
जलविद्युत पर संभावित असर
स्विट्जरलैंड की जलविद्युत व्यवस्था के लिए भी ग्लेशियरों और पर्वतीय जल प्रणालियों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
अल्पावधि में ज्यादा पिघलाव से कुछ नदी प्रणालियों में पानी बढ़ सकता है। लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों के घटते आयतन का अर्थ है कि गर्मियों में उपलब्ध अतिरिक्त पानी का प्राकृतिक भंडार भी घटेगा।
जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक परिदृश्यों में स्विस अधिकारियों ने गर्मियों में नदी और जलधाराओं के बहाव में कमी की संभावना जताई है। बिना पर्याप्त जलवायु शमन के, सदी के अंत तक गर्मियों में औसत जल प्रवाह आज की तुलना में 30% से 50% तक कम हो सकता है। मौजूदा ग्लेशियर-प्रभावित जलधाराओं में कमी 60% तक पहुंचने का अनुमान भी दर्ज है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर साल या हर क्षेत्र में समान कमी होगी। क्षेत्रीय परिस्थितियां, वर्षा, बर्फबारी, तापमान और जल प्रबंधन की नीतियां परिणाम बदल सकती हैं।
लेकिन दीर्घकालिक दिशा स्पष्ट रूप से जल उपलब्धता पर बढ़ते दबाव की ओर इशारा करती है।
कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर
पानी की कमी का सीधा असर कृषि पर पड़ता है।
2026 में स्विट्जरलैंड के कई क्षेत्रों में नदी और झरनों के कम प्रवाह के कारण जल उपयोग पर प्रतिबंध लगाए गए। कुछ कृषि क्षेत्रों में सिंचाई की क्षमता प्रभावित हुई।
पर्वतीय कृषि विशेष रूप से संवेदनशील है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पशुपालन पानी और चारे की उपलब्धता पर निर्भर करता है। सूखे के कारण कई अल्पाइन फार्मों को पशुओं को सामान्य समय से पहले नीचे लाना पड़ा।
झीलों और नदियों के कम जलस्तर का असर परिवहन और स्थानीय पर्यटन पर भी पड़ सकता है। कम जलस्तर वाले इलाकों में नौकायन और नदी परिवहन प्रभावित होने की स्थिति सामने आई।
इससे स्पष्ट है कि ग्लेशियर संकट को केवल पर्यावरणीय मुद्दा मानना अधूरा होगा। इसका संबंध कृषि, ऊर्जा, परिवहन, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी है।
जलवायु परिवर्तन का व्यापक संदर्भ
स्विस ग्लेशियरों का मौजूदा संकट लंबे समय से चल रहे तापमान वृद्धि के रुझान का हिस्सा है।
स्विस जलवायु आकलनों के अनुसार, बढ़ते तापमान के साथ गर्मियों में वाष्पीकरण की मांग बढ़ रही है और मिट्टी तथा जल प्रणालियों पर सूखे का दबाव बढ़ रहा है। भविष्य में गर्म और शुष्क अवधि अधिक लंबी तथा अधिक बार होने की संभावना जताई गई है।
ग्लेशियर इस बदलाव का संवेदनशील संकेतक भी हैं। तापमान बढ़ने पर बर्फ पिघलने की अवधि लंबी होती है। यदि सर्दियों में नई बर्फ पर्याप्त मात्रा में जमा नहीं होती, तो गर्मियों में ग्लेशियरों के पास पुराने बर्फीले भंडार से नुकसान पूरा करने की गुंजाइश कम हो जाती है।
2026 में यही स्थिति दिखाई दी। कम बर्फबारी के बाद गर्मी और सूखे ने ग्लेशियरों पर दोहरा दबाव बनाया।
सबसे बड़ी चुनौती आगे की है
2026 के आंकड़े स्विट्जरलैंड के सामने एक कठिन जल प्रबंधन चुनौती रखते हैं।
एक तरफ गर्मियों में पानी की मांग बढ़ रही है। दूसरी तरफ प्राकृतिक जल भंडार के रूप में काम करने वाले ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं।
ऐसे में जल प्रबंधन को केवल संकट के दौरान पानी उपलब्ध कराने की नीति तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। जलाशयों का प्रबंधन, भूजल संरक्षण, कृषि सिंचाई की दक्षता, नदी पारिस्थितिकी और पर्वतीय जल प्रणालियों की निगरानी को साथ लेकर चलना होगा।
वैज्ञानिक निगरानी भी महत्वपूर्ण रहेगी। GLAMOS जैसे दीर्घकालिक मॉनिटरिंग नेटवर्क ग्लेशियरों के आयतन, बर्फ की मोटाई और मौसमी बदलावों को दर्ज करते हैं। ऐसे आंकड़े नीति निर्माण और जल संसाधन योजना के लिए आधार उपलब्ध कराते हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।