ईरान की मौजूदा सूरत-ए-हाल एक दिलचस्प मगर खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ जंग का दबाव है, दूसरी तरफ अमन की बातें हो रही हैं। इसी दरमियान पार्लियामेंट के स्पीकर मोहम्मद बाक़िर ग़ालिबाफ़ एक अहम किरदार बनकर सामने आए हैं। उनका अतीत, उनकी सियासी सोच और उनकी मिलिट्री बैकग्राउंड—इन सबको समझे बिना मौजूदा हालात को समझना नामुमकिन है। साथ ही, ईरान की मिलिट्री ताक़त, उसकी कमज़ोरियाँ और अमेरिका के संभावित ग्राउंड ऑपरेशन का सवाल—ये सब मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं: क्या ये जंग रुक सकती है या अब और गहरी होगी?
ईरान की सियासत में मोहम्मद बाक़िर ग़ालिबाफ़ का नाम नया नहीं है, लेकिन मौजूदा दौर में उनकी अहमियत अचानक बढ़ गई है। जब जंग अपने पहले महीने में दाखिल हो चुकी है और अमेरिका लगातार अमन की कोशिशों का दावा कर रहा है, तब ग़ालिबाफ़ का सामने आना एक दिलचस्प मोड़ है।
उनका अतीत साफ बताता है कि वो सिर्फ एक सियासी लीडर नहीं, बल्कि एक मिलिट्री माइंड भी हैं। जवान उम्र में ईरान-इराक जंग में शामिल होना, फिर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स में तेज़ी से ऊपर उठना—ये सब उन्हें एक अलग तरह का लीडर बनाता है।
लेकिन यहाँ सवाल ये उठता है—क्या ऐसा शख्स अमन की बातचीत में भरोसेमंद हो सकता है?
अगर हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी से तुलना करें, तो ये वैसा ही है जैसे किसी सख्त पुलिस ऑफिसर को अचानक शांति वार्ता का चेहरा बना दिया जाए। वो सख्ती जानता है, लेकिन क्या वो लचीलापन दिखा पाएगा?
ग़ालिबाफ़ की सियासी सफर भी कम दिलचस्प नहीं है। चार बार राष्ट्रपति बनने की कोशिश और हर बार नाकामी—ये एक आम सियासी करियर को खत्म कर सकती थी। लेकिन उन्होंने हार को अपनी ताक़त बना लिया।
यहाँ एक अहम बात समझनी होगी—ईरान की सियासत में हार का मतलब खत्म होना नहीं होता। कई बार हार आपको सिस्टम के और करीब ले जाती है।
ग़ालिबाफ़ को सुप्रीम लीडर के नज़दीकी सर्कल का हिस्सा माना जाता है। इसका मतलब ये है कि वो सिर्फ एक पॉलिटिकल फेस नहीं, बल्कि पावर स्ट्रक्चर का हिस्सा हैं।
तो क्या उनकी अमन की इच्छा असली है, या ये सिर्फ वक्त खरीदने की कोशिश है?
जंग के शुरुआती हफ्तों में ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। कई सीनियर मिलिट्री अफसर मारे गए, इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हुआ, और मिसाइल सिस्टम पर भी असर पड़ा।
लेकिन इसके बावजूद ईरान पूरी तरह झुका नहीं है।
ये समझना जरूरी है—किसी भी मुल्क की मिलिट्री ताक़त सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि उसकी रणनीति और हौसले से तय होती है।
ईरान का रवैया यही दिखाता है कि वो सीधे टकराव में भले कमजोर पड़े, लेकिन पूरी तरह हार मानने को तैयार नहीं है।
अगर आंकड़ों की बात करें, तो ईरान के पास बड़ी ग्राउंड फोर्स है—लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा सैनिक, साथ में बसीज जैसी पैरामिलिट्री फोर्स।
लेकिन असली सवाल ये है—क्या संख्या ही ताक़त होती है?
मिलिट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान के पास पुराना इक्विपमेंट और सीमित ट्रेनिंग है। एयर फोर्स में पुराने फाइटर जेट्स हैं, जो आधुनिक जंग के लिए पूरी तरह तैयार नहीं माने जाते।
यहाँ एक आसान उदाहरण लें—अगर आपके पास बड़ी टीम है लेकिन ट्रेनिंग कम है, तो वो टीम हमेशा एक छोटी लेकिन बेहतर ट्रेनिंग वाली टीम से हार सकती है।
जहाँ ईरान पीछे नहीं है, वो है उसके मिसाइल और ड्रोन सिस्टम।
सस्ते, तेजी से बनने वाले और मुश्किल से ट्रैक होने वाले ड्रोन—ये उसकी सबसे बड़ी ताक़त हैं।
यही वजह है कि भारी नुकसान के बावजूद ईरान जवाब देने में सक्षम बना हुआ है।
लेकिन यहाँ भी एक सवाल है—क्या ये लगातार जारी रह सकता है?
अगर प्रोडक्शन नेटवर्क पर लगातार हमले होते रहे, तो क्या ईरान अपनी क्षमता बनाए रख पाएगा?
या फिर वो जानबूझकर अपनी ताक़त छुपाकर रख रहा है?
अमेरिका के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या ग्राउंड ऑपरेशन शुरू किया जाए?
हवाई हमले एक हद तक असर डाल सकते हैं, लेकिन किसी देश की मिलिट्री को पूरी तरह खत्म करना हवा से मुमकिन नहीं होता।
अगर ग्राउंड ऑपरेशन होता है, तो ये जंग का नया और ज्यादा खतरनाक चरण होगा।
खार्ग आइलैंड जैसे इलाकों में ईरान अपनी डिफेंस मजबूत कर रहा है। यहाँ अमेरिकी फोर्सेज को मिसाइल और ड्रोन दोनों का खतरा रहेगा।
यह वैसा ही है जैसे किसी दुश्मन के घर में घुसकर लड़ाई करना—जहाँ हर कोना उसके लिए फायदेमंद है।
ईरान की नेवी भले बड़ी ताक़त ना हो, लेकिन उसकी रणनीति बेहद अलग है।
छोटी तेज़ नावें, माइन बिछाने की क्षमता और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर कंट्रोल—ये सब उसे खतरनाक बनाते हैं।
तेल और गैस की सप्लाई पर असर डालकर वो पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है।
यहाँ एक दिलचस्प बात है—कई बार कमजोर खिलाड़ी सीधे मुकाबले में नहीं, बल्कि सप्लाई चेन पर वार करके खेल जीतता है।
ईरान ठीक यही कर रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या ग़ालिबाफ़ सच में अमन की राह खोल सकते हैं?
उनका अतीत सख्ती का है, उनका सिस्टम से जुड़ाव गहरा है, और उनकी महत्वाकांक्षा भी साफ नजर आती है।
ऐसे में उनकी भूमिका दो तरह से देखी जा सकती है:
एक सख्त नेता जो अमन के लिए मजबूर हुआ है
एक रणनीतिक खिलाड़ी जो वक्त खरीद रहा है
सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
अमेरिका अगर ग्राउंड ऑपरेशन करता है, तो वो जल्दी जीत की उम्मीद कर सकता है। लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसी जंगें जल्दी खत्म नहीं होतीं।
इराक और अफगानिस्तान इसके बड़े उदाहरण हैं।
तो क्या अमेरिका वही गलती दोहराने जा रहा है?
या इस बार रणनीति अलग होगी?
ईरान की मौजूदा हालत एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ हर फैसला दूरगामी असर डाल सकता है।
ग़ालिबाफ़ का उभार, मिलिट्री की हालत, और अमेरिका का अगला कदम—ये सब मिलकर एक ऐसी कहानी लिख रहे हैं जिसका अंत अभी तय नहीं है।
एक बात साफ है—ये सिर्फ जंग नहीं, बल्कि सियासत, रणनीति और मनोविज्ञान की लड़ाई है।
और इस लड़ाई में जीत सिर्फ ताक़त से नहीं, बल्कि समझदारी से तय होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।