हड़प्पा सभ्यता के नगरों में घरों और सड़कों से जुड़ी नालियां, ढकी हुई जल निकासी संरचनाएं और जल प्रबंधन की योजनाबद्ध व्यवस्था मिलती है, जो प्राचीन नगर नियोजन की उन्नति दिखाती है।
हड़प्पा सभ्यता के शहरों में इतनी बेहतरीन नालियां कैसे बनाई जाती थीं?
आज किसी शहर की पहचान सिर्फ ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं होती, बल्कि उसकी जल निकासी और स्वच्छता व्यवस्था भी उतनी ही अहम मानी जाती है। हैरानी की बात यह है कि हजारों वर्ष पहले सिंधु घाटी यानी हड़प्पा सभ्यता के नगरों में भी जल निकासी को नगर नियोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया था। मोहनजोदड़ो, कालीबंगन और धोलावीरा जैसे पुरातात्विक स्थलों से ऐसी संरचनाएं मिली हैं, जो उस दौर की योजनाबद्ध शहरी व्यवस्था की तस्वीर पेश करती हैं।
सिर्फ नालियां नहीं, पूरा था जल निकासी तंत्र
हड़प्पा सभ्यता के नगरों में जल निकासी को अलग-अलग संरचनाओं के रूप में नहीं, बल्कि शहर की समग्र योजना के हिस्से के तौर पर देखा गया था। सड़कों, आवासीय क्षेत्रों और जल स्रोतों के साथ जल निकासी की संरचनाएं विकसित की गई थीं। मोहनजोदड़ो के पुरातात्विक अवशेषों में व्यवस्थित सड़कों के साथ जल निकासी व्यवस्था, कुएं और गंदे पानी के निपटारे के लिए सोख्ता गड्ढों के प्रमाण मिले हैं। यूनेस्को के अनुसार यहां की नगरीय व्यवस्था एक संगठित नागरिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की ओर संकेत करती है।
ईंटों से बनाई जाती थीं नालियां
हड़प्पाई नगरों में निर्माण के लिए पकी हुई ईंटों का व्यापक इस्तेमाल हुआ। जल निकासी की कई संरचनाएं भी ईंटों से बनाई गई थीं।
कालीबंगन की खुदाई से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट में अलग-अलग चरणों की नालियों के प्रमाण दर्ज हैं। इनमें कुछ नालियां ढकी हुई थीं, जबकि कुछ खुली थीं। एक दर्ज नाली करीब १४ मीटर लंबी थी और उसे ईंटों से बनाया गया था। इससे यह संकेत मिलता है कि जल निकासी की संरचना स्थानीय जरूरत, स्थान और नगर के विकास के अलग-अलग चरणों के अनुसार बनाई और बदली जाती थी।
ढकी हुई नालियां क्यों थीं खास?
कई स्थानों पर नालियों को ऊपर से ढकने की व्यवस्था भी दिखाई देती है। इसका एक महत्वपूर्ण फायदा यह रहा होगा कि नाली का मार्ग सड़क या आवासीय क्षेत्र के बीच खुला अवरोध नहीं बनता था। कालीबंगन में पुरातात्विक खुदाई से ढकी हुई नालियों के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट में अलग-अलग दिशाओं में चलने वाली नालियों और विभिन्न निर्माण चरणों का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि किसी खास नाली का हर हिस्सा किस उद्देश्य से इस्तेमाल होता था, इसका निर्धारण पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर ही किया जाता है। इसलिए आधुनिक सीवर व्यवस्था के साथ पूरी तरह समानता स्थापित करना उचित नहीं होगा।
घरों से लेकर सड़कों तक थी योजना
मोहनजोदड़ो की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में व्यवस्थित नगर नियोजन शामिल है। यूनेस्को के मुताबिक यहां सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं और आवासीय क्षेत्रों में गलियों का नेटवर्क था। इसी शहरी ढांचे में स्वच्छता और जल निकासी की व्यवस्था भी शामिल थी। यानी नालियां शहर की योजना से अलग बनाई गई कोई बाद की व्यवस्था नहीं थीं। उनका संबंध नगर के निर्माण और दैनिक जीवन से था।
धोलावीरा ने दिखाया जल प्रबंधन का अलग मॉडल
गुजरात का धोलावीरा हड़प्पा सभ्यता की जल प्रबंधन तकनीक का एक अलग और बेहद महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह क्षेत्र अपेक्षाकृत शुष्क था, इसलिए यहां पानी को जमा करने और नियंत्रित करने की विशेष व्यवस्था विकसित की गई। यूनेस्को के अनुसार धोलावीरा में जलाशयों, जल संचयन और जल निकासी की जटिल व्यवस्था के प्रमाण मिले हैं। शहर में वर्षाजल और सतही बहाव को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न संरचनाओं का इस्तेमाल किया जाता था। धोलावीरा की व्यवस्था से यह भी पता चलता है कि हड़प्पाई नगरों में जल प्रबंधन स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित किया जाता था।
पानी को सिर्फ बाहर निकालना ही उद्देश्य नहीं था
धोलावीरा की खासियत यह है कि वहां जल निकासी और जल संचयन दोनों को एक साथ समझा गया था। यूनेस्को के दस्तावेज के अनुसार वहां जलाशयों, सतही जल के प्रवाह को नियंत्रित करने वाली संरचनाओं और भूमिगत जल निकासी व्यवस्था के प्रमाण मौजूद हैं। इससे यह समझ आता है कि उस दौर के नगर नियोजन में पानी को सिर्फ बेकार पदार्थ मानकर बाहर निकालने के बजाय उसे एक संसाधन के रूप में भी देखा जाता था।
लोटल में भी मिलती है योजनाबद्ध व्यवस्था
गुजरात का लोटल भी हड़प्पा सभ्यता के महत्वपूर्ण नगरों में शामिल है। यूनेस्को के अनुसार यहां ऊपरी और निचले नगर के अवशेषों के साथ चौड़ी सड़कों, नालियों और स्नान मंचों के प्रमाण मिले हैं। लोटल की स्थिति समुद्री और नदीय गतिविधियों से जुड़ी थी। यहां मिले जल संबंधी ढांचे इस बात की ओर संकेत करते हैं कि नगर की संरचना स्थानीय पर्यावरण और आर्थिक गतिविधियों को ध्यान में रखकर विकसित की गई थी।
क्या हड़प्पाई लोग आधुनिक सीवर सिस्टम जानते थे?
यहां सावधानी जरूरी है। हड़प्पा सभ्यता की नालियों को सीधे आज की आधुनिक सीवर व्यवस्था कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि जल निकासी और स्वच्छता के लिए संगठित संरचनाएं मौजूद थीं, लेकिन उनके तकनीकी उद्देश्य और संचालन को आधुनिक प्रणाली के समान बताना उचित नहीं है। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि तीसरी और दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान हड़प्पाई नगरों में शहर की योजना, जल प्रबंधन और जल निकासी पर पर्याप्त ध्यान दिया गया था। धोलावीरा को यूनेस्को ने हड़प्पाई नगर नियोजन और जल प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण माना है।
आखिर इतनी व्यवस्थित व्यवस्था कैसे संभव हुई?
पुरातात्विक अवशेषों से संकेत मिलता है कि हड़प्पाई नगरों में निर्माण, सड़क व्यवस्था और जल प्रबंधन एक व्यापक नगर योजना का हिस्सा थे। स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल, ईंट निर्माण की तकनीक, सड़कों और आवासीय क्षेत्रों का नियोजन तथा जल निकासी की संरचनाएं इस शहरी सोच को दर्शाती हैं। धोलावीरा के मामले में पत्थर का व्यापक इस्तेमाल भी दिखाई देता है और यूनेस्को ने वहां के नगर नियोजन, निर्माण तकनीक तथा जल प्रबंधन को हड़प्पाई सभ्यता की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल किया है।
निष्कर्ष
हड़प्पा सभ्यता की नालियां सिर्फ ईंटों से बनी कुछ पुरानी संरचनाएं नहीं हैं। वे इस बात का पुरातात्विक प्रमाण हैं कि हजारों वर्ष पहले भी शहर बसाने वालों को स्वच्छता, पानी के बहाव, जल संचयन और नगर नियोजन की जरूरतों का व्यावहारिक ज्ञान था। मोहनजोदड़ो की जल निकासी व्यवस्था, कालीबंगन की ढकी और खुली नालियां तथा धोलावीरा के जलाशय और जल निकासी तंत्र—इन सभी को साथ देखने पर हड़प्पाई शहरी संस्कृति की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसमें नगर निर्माण के साथ पानी का प्रबंधन भी केंद्रीय भूमिका में था।