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सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों पर सुनवाई, नगर निकायों पर सवाल

None 2026-01-08 16:46:51
सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों पर सुनवाई, नगर निकायों पर सवाल

आवारा कुत्ते और सार्वजनिक सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट में आवारा जानवरों से जुड़े खतरों पर बहस


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आवारा कुत्तों और अन्य आवारा जानवरों से जुड़े मामलों पर सुनवाई दोबारा शुरू की। बेंच ने नगर निकायों की भूमिका, सार्वजनिक सुरक्षा और मौजूदा नियमों के पालन पर सवाल उठाए।

📍New Delhi ✍️ Asif Khan 

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आवारा कुत्तों के मुद्दे पर लंबित याचिकाओं की सुनवाई फिर से शुरू की। यह मामला सार्वजनिक सुरक्षा, नागरिक अधिकारों और नगर निकायों की जिम्मेदारी से जुड़ा है। बेंच में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल थे। कोर्ट ने पहले भी इस विषय पर कई निर्देश दिए हैं और कहा है कि नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

नगर निकायों पर सवाल

बेंच ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों से जुड़े जोखिम केवल कुत्तों के काटने तक सीमित नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि सड़कों पर आवारा जानवरों की मौजूदगी से दुर्घटनाएं भी होती हैं, जिनमें जान का नुकसान तक हो सकता है। बेंच ने इस बात पर नाराज़गी जताई कि कई नगर निकाय नियमों और अदालत के निर्देशों का सही ढंग से पालन नहीं कर रहे हैं।

रोकथाम पर ज़ोर

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी जानवर के व्यवहार का अनुमान लगाना हमेशा संभव नहीं होता। बेंच ने इस सिद्धांत को दोहराया कि रोकथाम इलाज से बेहतर है। कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है।

अन्य जानवरों का सवाल

बुधवार की पिछली सुनवाई का ज़िक्र करते हुए बेंच ने कहा कि बहस केवल कुत्तों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने पूछा कि मुर्गियों, बकरियों और अन्य जानवरों की सुरक्षा का क्या होगा। बेंच ने यह संकेत दिया कि सभी आवारा जानवरों से जुड़े मामलों को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

संवेदनशील इलाकों से हटाने के निर्देश

कोर्ट ने याद दिलाया कि पिछले साल नवंबर में स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंड, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए गए थे। इन जानवरों को तय शेल्टर में ट्रांसफर करने का आदेश भी दिया गया था।

कोर्ट की टिप्पणियां

गुरुवार की सुनवाई के दौरान बेंच ने जानवरों के व्यवहार पर कुछ टिप्पणियां कीं, जिन्हें जजों ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित बताया। कोर्ट ने कहा कि कुत्ते इंसानों में डर को महसूस कर सकते हैं और ऐसे मामलों में उनके हमला करने की संभावना बढ़ जाती है। कोर्टरूम में मौजूद कुछ लोगों की प्रतिक्रिया पर बेंच ने दखल देते हुए शांति बनाए रखने को कहा।

फीडिंग ज़ोन पर चिंता

याचिकाकर्ताओं में से एक के वकील ने दलील दी कि फीडिंग ज़ोन कई इलाकों में परेशानी का कारण बन गए हैं। उन्होंने कहा कि जहां एक जगह बड़ी संख्या में कुत्ते इकट्ठा होते हैं, वहां स्थानीय निवासियों को आने-जाने में दिक्कत होती है। वकील ने यह भी कहा कि कुछ पालतू कुत्तों के मालिक नियमों का उल्लंघन करते हैं और सार्वजनिक स्थानों पर बिना पट्टे के कुत्ते रखते हैं।

जिम्मेदारी का दायरा

सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि आवारा कुत्तों की जिम्मेदारी किसकी है। एक वकील ने कहा कि राज्य आवारा कुत्तों का मालिक नहीं है और उसकी जिम्मेदारी टीकाकरण और नसबंदी तक सीमित है। उन्होंने जोर दिया कि सड़कें और सार्वजनिक रास्ते सुरक्षित और साफ़ होने चाहिए, ताकि नागरिक बिना डर अपने घर और कार्यस्थल तक पहुंच सकें।

निवासियों के अधिकार

याचिकाकर्ता विजय गोयल की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह मामला किसी समूह के समर्थन या विरोध का नहीं है, बल्कि निवासियों के सुरक्षित आवागमन के अधिकार से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि कुत्ते अपने इलाके को लेकर स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होते हैं और जब उनका इलाका बदलता है तो टकराव की संभावना बढ़ जाती है।

इलाकों और टकराव का मुद्दा

वकील ने बताया कि आमतौर पर कुत्तों के इलाके हर 200 से 300 मीटर में बदलते हैं। जब खाने की जगहें उनके इलाकों से दूर बनाई जाती हैं, तो वे दूसरे इलाकों में चले जाते हैं। इससे कुत्तों के बीच टकराव और स्थानीय लोगों के लिए खतरा बढ़ सकता है।

आदेशों के विस्तार की मांग

दलीलों के दौरान यह मांग भी उठी कि संस्थागत इलाकों से कुत्तों को हटाने का आदेश रिहायशी इलाकों में भी लागू किया जाए। वकील ने कहा कि ABC नियमों का मकसद कुत्तों की आबादी बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे नियंत्रित करना है।

ट्रैप न्यूटर रिलीज़ मॉडल

सीनियर एडवोकेट नकुल दीवान ने ट्रैप, न्यूटर और रिलीज़ मॉडल का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि कुत्तों को उसी जगह वापस छोड़ा जाना चाहिए, जहां से उन्हें पकड़ा गया था, ताकि क्षेत्रीय संतुलन बना रहे। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ शहरों में माइक्रो-चिपिंग की शुरुआत हो चुकी है और यह बहुत महंगी प्रक्रिया नहीं है।

एक्सपर्ट कमेटी का सुझाव

नकुल दीवान ने आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि कम्युनिटी कुत्तों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण जरूरी है और यह समस्या एक दिन में खत्म नहीं हो सकती।

संतुलित नजरिया

वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने दलील दी कि यह मुद्दा केवल कुत्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी आवारा जानवरों से जुड़ा है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी इलाके से कुत्तों को अचानक हटाने से चूहों और बंदरों की आबादी बढ़ सकती है, जिससे नई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

पारिस्थितिक संतुलन

सीयू सिंह ने कहा कि चूहे कई बीमारियां फैलाते हैं और कुत्तों की मौजूदगी से उनकी संख्या नियंत्रित रहती है। अचानक हस्तक्षेप से यह संतुलन बिगड़ सकता है। कोर्ट ने इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए जानवरों के आपसी संबंधों का ज़िक्र किया।

कोर्ट की हल्की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि कुत्ते और बिल्लियां स्वाभाविक दुश्मन होते हैं और बिल्लियां चूहों को नियंत्रित करती हैं। बेंच ने यह सवाल भी उठाया कि अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक इमारतों में कितने कुत्तों की मौजूदगी उचित होगी।

पुराने आदेशों में बदलाव की मांग

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि सभी आवारा कुत्तों को पकड़ना समाधान नहीं है। उन्होंने मानव और जानवर के बीच टकराव को कम करने के लिए वैज्ञानिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य तरीकों की मांग की।

CSVR मॉडल पर जोर

कपिल सिब्बल ने पकड़ो, नसबंदी करो, टीका लगाओ और छोड़ दो मॉडल का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि इससे कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने और काटने की घटनाओं में धीरे-धीरे कमी लाने में मदद मिल सकती है।

सड़क सुरक्षा पर चिंता

कोर्ट ने यह भी कहा कि देश में मौतें केवल कुत्तों के काटने से नहीं होतीं, बल्कि आवारा जानवरों से जुड़े सड़क हादसों से भी होती हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि सड़कें आवारा जानवरों से मुक्त होनी चाहिए और नगर निकायों को नियमों का सख्ती से पालन कराना होगा।

पीड़ितों की दलील

सुनवाई के दौरान पीड़ितों की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि लोग आवारा कुत्तों की वजह से परेशान हैं और मानवाधिकारों की रक्षा जरूरी है। एक याचिकाकर्ता द्वारा तस्वीर दिखाने की कोशिश पर कोर्ट ने कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय उदाहरण

कुछ वकीलों ने जापान और USA के उदाहरण दिए, जहां छोड़े गए कुत्तों के लिए शेल्टर सिस्टम मौजूद है। उन्होंने बताया कि इन देशों में सख्त नियमों के चलते आवारा कुत्तों की समस्या सीमित है।

आगे की सुनवाई

दिन की सुनवाई समाप्त करते हुए जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि मामले पर आगे की चर्चा शुक्रवार को जारी रहेगी। कोर्ट ने वकीलों से एक रिपोर्ट पढ़कर तैयार होकर आने को कहा, ताकि तथ्यों के आधार पर आगे की सुनवाई की जा सके।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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