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हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ, राजनीति और आत्मसम्मान की बहस

None 2025-12-07 21:16:26
हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ, राजनीति और आत्मसम्मान की बहस

विकास, विरासत और विवाद का नया अध्याय

ग्रोथ की रफ्तार और सियासत की धार,अतीत के जुमले और आज की अर्थव्यवस्था

📍New Delhi✍️ Asif Khan

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” पर दिए गए बयान ने राजनीतिक बहस को फिर तेज़ कर दिया है। कांग्रेस इसे इतिहास की गलत व्याख्या बता रही है, जबकि सरकार इसे आत्मसम्मान और मानसिक गुलामी से जोड़ रही है। यह लेख इसी टकराव को संतुलित नजर से समझने की कोशिश करता है।

 एक जुमला, कई अर्थ

हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” एक ऐसा जुमला है जो सालों से किताबों में बंद था, लेकिन एक बयान ने उसे फिर सियासत की सड़क पर ला खड़ा किया। प्रधानमंत्री ने इसे गुलामी की मानसिकता का प्रतीक बताया, तो विपक्ष ने इसे इतिहास से छेड़छाड़ कहा। असल सवाल यह नहीं है कि किसने यह शब्द कहा था, बल्कि यह है कि हम आज इस शब्द को किस नजर से देखते हैं। जैसे मोहल्ले की किसी पुरानी इमारत पर अचानक चर्चा शुरू हो जाए, तो सवाल उसकी उम्र से ज्यादा उसके आज के हाल पर होता है।

इतिहास का संदर्भ और विवाद की जड़

यह शब्द उस दौर से जुड़ा है जब भारत की विकास दर दो से तीन प्रतिशत के बीच सिमटी रहती थी। तब इसे आर्थिक सुस्ती का प्रतीक माना गया। प्रधानमंत्री का तर्क है कि यह शब्द पूरे समाज को हीन भावना से देखने का प्रतीक था। कांग्रेस का पलटवार यह है कि यह शब्द किसी एक राजनीतिक धारा की देन नहीं था, बल्कि एक अकादमिक बहस का हिस्सा था। सियासत यहीं से शुरू होती है, जब इतिहास को आज की लड़ाई का हथियार बना लिया जाता है।

आज की ग्रोथ और आत्मविश्वास का सवाल

आज भारत की विकास दर, वैश्विक मंच पर उसकी मौजूदगी और निवेश की धार पहले से अलग है। सड़क पर चाय पीते दो लोग भी अब शेयर बाजार, निर्यात और स्टार्टअप की बातें करने लगे हैं। प्रधानमंत्री इसी बदले हुए माहौल को आत्मविश्वास का नाम देते हैं। उनका कहना है कि अगर देश दुनिया की तेज़ अर्थव्यवस्थाओं में है, तो पुराने नकारात्मक जुमलों को ढोते रहना क्यों जरूरी है।

विपक्ष की आपत्ति और तर्क

कांग्रेस का कहना है कि शब्दों को भावनात्मक रंग देकर राजनीतिक संदेश देना ठीक नहीं। उनका तर्क है कि विकास दर का विश्लेषण नीतियों, वैश्विक हालात और संसाधनों से होता है, किसी सांस्कृतिक पहचान से नहीं। वे इसे प्रधानमंत्री की भाषा की आक्रामकता से जोड़ते हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या हर ऐतिहासिक शब्द को आज की राजनीति के तराजू पर तोला जाना चाहिए।

गुलामी की मानसिकता या आलोचना की संस्कृति

प्रधानमंत्री जिस गुलामी की मानसिकता की बात करते हैं, वह केवल विदेशी शासन तक सीमित नहीं है। वह उस सोच की ओर इशारा करते हैं, जिसमें अपनी ताकत पर भरोसा कम और बाहर की मुहर पर भरोसा ज्यादा रहा। आलोचकों का कहना है कि आत्मसम्मान जरूरी है, लेकिन आत्मालोचना भी उतनी ही जरूरी है। वरना विकास का रास्ता आत्मप्रशंसा की गली में भटक सकता है।

आर्थिक सुधार और जमीनी बदलाव

भाषण में जीएसटी, कर सुधार, छोटे उद्योगों की नई परिभाषा और गुणवत्ता नियंत्रण जैसे कई कदमों का जिक्र हुआ। यह सब कागजों पर अच्छे लगते हैं, लेकिन असली परीक्षा गांव, कस्बों और छोटे व्यापारियों की जिंदगी में होती है। बनारस के किसी छोटे दुकानदार से पूछिए, उसे जीएसटी से कितना सुकून और कितनी परेशानी मिली। यही असली पैमाना है।

गांव, छोटे शहर और नई उम्मीद

प्रधानमंत्री ने पूर्वी भारत, उत्तर पूर्व और छोटे शहरों में निवेश की बात की। आज सच्चाई यह है कि बड़े शहरों की भीड़ से अलग छोटे शहरों में भी सपने पलने लगे हैं। कहीं महिला समूह छोटे उद्योग चला रहे हैं, कहीं युवा स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं। यह बदलाव चुपचाप आता है, बिना बड़े नारों के।

तकनीक, अंतरिक्ष और नई पहचान

हैदराबाद में स्पेस स्टार्टअप का उदाहरण दिया गया। पहले रॉकेट सुनते ही लोगों को सरकारी प्रयोगशालाएं याद आती थीं, अब निजी कंपनियों के नाम भी जुड़ने लगे हैं। यह बदलाव सिर्फ तकनीक का नहीं, सोच का भी है। एक समय था जब लोग नौकरी की सुरक्षा खोजते थे, आज जोखिम उठाने का साहस भी दिख रहा है।

ऊर्जा, सोलर और आम आदमी

सोलर ऊर्जा की क्षमता बढ़ने का आंकड़ा प्रभावशाली है, लेकिन असली कहानी उस घर की है जहां बिजली का बिल पहले चिंता की वजह होता था और अब राहत की। बनारस में छत पर लगे सोलर पैनल सिर्फ तकनीक नहीं, भरोसे की तस्वीर हैं। यही वह जगह है जहां नीतियां आम जिंदगी से जुड़ती हैं।

मोबाइल निर्माण और आत्मनिर्भरता

मोबाइल फोन अब सिर्फ जेब की चीज नहीं, राष्ट्रीय क्षमता का भी प्रतीक बन गया है। कभी अधिकतर फोन बाहर से आते थे, आज देश में बन रहे हैं। इसका अर्थ सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि रोजगार, कौशल और आत्मविश्वास से भी जुड़ा है। हालांकि यह भी सच है कि आयात के कई पुर्जों पर निर्भरता अभी खत्म नहीं हुई है।

भरोसा, गवर्नेंस और अनक्लेम्ड धन

सरकार द्वारा लावारिस धन को असली हकदारों तक पहुंचाने की बात भरोसे की राजनीति को मजबूत करती है। कई परिवारों के लिए यह पैसा किसी भूले हुए रिश्तेदार की याद की तरह लौटता है। पर सवाल यह भी है कि ऐसे खातों की संख्या इतनी ज्यादा क्यों हुई। क्या व्यवस्था में खामियां थीं या जागरूकता की कमी।

रक्षा, जहाज निर्माण और इतिहास

प्रधानमंत्री ने रक्षा और शिपबिल्डिंग के पुराने गौरव की बात की। सच यह है कि भारत का समुद्री इतिहास समृद्ध रहा है। लेकिन आधुनिक दौर में प्रतिस्पर्धा सिर्फ गौरव से नहीं, निवेश, तकनीक और प्रबंधन से जीती जाती है। आत्मनिर्भरता का नारा तभी सार्थक होगा जब गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति की कसौटी पर खरा उतरा जाए।

राजनीति की भाषा और समाज का मन

यह बहस केवल आर्थिक शब्‍दों की नहीं, राजनीतिक भाषा की भी है। जब शीर्ष नेतृत्व भावनात्मक शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो असर भी गहरा होता है। समर्थकों में गर्व जागता है, विरोधियों में आशंका। एक ही वाक्य किसी के लिए प्रेरणा और किसी के लिए उत्तेजना बन जाता है।

क्या हर आलोचना को गुलामी कहा जाए

यह सबसे नाजुक सवाल है। क्या देश की नीतियों या इतिहास की आलोचना करना हमेशा मानसिक गुलामी का संकेत है। एक दोस्त की गलती बताना उसके खिलाफ होना नहीं होता, बल्कि उसके बेहतर होने की चाह हो सकती है। लोकतंत्र की ताकत यही है कि असहमति को भी देशप्रेम का हिस्सा माना जाए।

अर्थव्यवस्था और आम आदमी की दूरी

कई बार आंकड़ों की चमक आम आदमी की परेशानी से दूरी बना लेती है। महंगाई, बेरोजगारी और आय की असमानता जैसे मुद्दे जमीन पर ज्यादा दिखते हैं। विकास दर तेज़ हो और थाली खाली रहे, तो जश्न अधूरा लगता है। यही संतुलन सबसे कठिन है।

मीडिया, बुद्धिजीवी और जवाबदेही

प्रधानमंत्री ने तथाकथित बुद्धिजीवियों पर भी तीखा हमला बोला। मीडिया और विचारकों की भूमिका सत्ता से सवाल पूछने की होती है। अगर सवाल पूछना देशद्रोह और गुलामी के दायरे में डाल दिया जाए, तो बहस का स्पेस सिकुड़ने लगता है। स्वस्थ समाज में बहस की जगह हमेशा खुली रहती है।

आने वाले दस साल और असली चुनौती

आने वाला दशक भारत के लिए निर्णायक हो सकता है। जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है, आकांक्षाएं ऊंची हैं और धैर्य सीमित। सरकार के सामने चुनौती सिर्फ योजनाएं बनाने की नहीं, उन्हें भरोसे के साथ जमीन पर उतारने की है। जनता के सामने चुनौती सिर्फ उम्मीद रखने की नहीं, सवाल पूछते रहने की भी है।

जुमले से आगे की लड़ाई

“हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” पर मचा घमासान असल में शब्दों से ज्यादा सोच की लड़ाई है। एक तरफ आत्मसम्मान और गर्व की बात है, दूसरी तरफ आलोचना और इतिहास की समझ की। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है। जैसे सड़क के दो किनारे होते हैं और सही रास्ता बीच से निकलता है। भारत की असली परीक्षा शब्दों में नहीं, काम और उनके असर में होगी।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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