सोमनाथ मंदिर पर कितनी बार हुआ हमला? इतिहास जानिए
सोमनाथ का इतिहास: हमले, पुनर्निर्माण और आस्था की कहानी
1026 से 1951 तक: सोमनाथ मंदिर ने देखे इतिहास के कई दौर
गुजरात के सोमनाथ मंदिर का इतिहास कई सदियों में फैला है। 1026 में महमूद गजनवी के हमले को इसका पहला दर्ज प्रमुख हमला माना जाता है। 1299 और 1395 में भी मंदिर पर हमलों के सरकारी रिकॉर्ड मिलते हैं। बाद में पुनर्निर्माण होते रहे और 1951 में वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई।
📍 स्थान: प्रभास पाटन, गुजरात
📰 दिनांक: 10 अगस्त 2026
✍️ नीलम सैनी
सोमनाथ मंदिर का इतिहास कितना पुराना है?
Somnath Temple भारत के सबसे प्रसिद्ध शिव तीर्थों में शामिल है। गुजरात के प्रभास पाटन में अरब सागर के किनारे स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय इतिहास, स्थापत्य और सांस्कृतिक स्मृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। सोमनाथ को बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्यकालीन गुजरात की राजनीति, समुद्री व्यापार, क्षेत्रीय सत्ता संघर्ष और बाद के औपनिवेशिक तथा स्वतंत्र भारत के दौर से भी जुड़ता है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, सोमनाथ पर पहला दर्ज हमला 1026 में हुआ था। 2026 में सरकार ने इसी घटना से जुड़े एक हजार वर्ष पूरे होने और 1951 में वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ आयोजित किया।
पहला बड़ा हमला महमूद गजनवी के समय
सोमनाथ के इतिहास में सबसे चर्चित घटना 11वीं सदी में महमूद गजनवी का अभियान है। सरकारी दस्तावेज इसे 1026 का पहला दर्ज हमला बताते हैं, जबकि कई ऐतिहासिक विवरण इस अभियान को 1025-26 के बीच रखते हैं। गजनवी के अभियान के दौरान सोमनाथ मंदिर पर हमला हुआ और मंदिर की संपत्ति लूटे जाने का उल्लेख मिलता है। यह घटना बाद के इतिहास-लेखन में सोमनाथ की पहचान का एक अहम हिस्सा बन गई। हालांकि इस घटना को समझते समय इतिहास के स्रोतों की प्रकृति को ध्यान में रखना जरूरी है। मध्यकालीन फारसी दरबारी स्रोतों में शासकों की सैन्य सफलताओं को अक्सर राजनीतिक और धार्मिक भाषा में प्रस्तुत किया जाता था। इसलिए हर लोकप्रिय विवरण को समान स्तर का ऐतिहासिक प्रमाण मानना उचित नहीं है।
क्या इसके बाद मंदिर फिर बनाया गया?
सोमनाथ के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसका बार-बार पुनर्निर्माण है। मंदिर को नुकसान पहुंचने के बाद स्थानीय और क्षेत्रीय शासकों की ओर से इसके पुनर्निर्माण के प्रयास किए गए।भारत सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के अनुसार, 12वीं सदी में राजा कुमारपाल ने मंदिर के पुनर्स्थापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद के दौर में भी सोमनाथ में निर्माण और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया जारी रही। यहां यह समझना भी जरूरी है कि अलग-अलग स्रोत मंदिर के निर्माण और विनाश की घटनाओं की संख्या अलग तरीके से बताते हैं। कुछ लोकप्रिय लेख कई घटनाओं को अलग-अलग ‘विनाश’ के रूप में गिनते हैं, जबकि प्रशासनिक और आधुनिक ऐतिहासिक स्रोत कुछ प्रमुख घटनाओं पर ज्यादा स्पष्ट प्रमाण देते हैं।
1299 में फिर हुआ हमला
सोमनाथ मंदिर पर अगली प्रमुख दर्ज घटना 13वीं सदी के अंत से जुड़ी है। गिर सोमनाथ जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक, 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान गुजरात पर अभियान हुआ और उसकी सेना ने सोमनाथ मंदिर को लूटा। इसके बाद मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया फिर शुरू हुई। जिला प्रशासन के इतिहास के मुताबिक, चूड़ासमा शासक महिपाल प्रथम ने 1308 में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और बाद में उनके पुत्र खेंगारा ने वहां शिवलिंग की स्थापना कराई। यह दौर बताता है कि सोमनाथ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं था। यह सौराष्ट्र की राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता था।
1395 का हमला और गुजरात सल्तनत का दौर
सोमनाथ की अगली प्रमुख ऐतिहासिक घटना 14वीं सदी के अंत में दर्ज होती है। गिर सोमनाथ जिला प्रशासन के मुताबिक, 1395 में गुजरात के तत्कालीन शासक जफर खान के दौर में मंदिर को तीसरी बार नष्ट किए जाने का उल्लेख मिलता है। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। आम तौर पर इंटरनेट पर सोमनाथ मंदिर पर हुए हमलों की संख्या सात, दस या उससे भी ज्यादा बताई जाती है, लेकिन इन सभी दावों के पीछे समान स्तर के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं। इसलिए पत्रकारिता के लिहाज से यह कहना ज्यादा उचित है कि सोमनाथ पर कई बार हमले और विध्वंस हुए, लेकिन हमलों की एक सर्वमान्य संख्या इतिहासकारों और स्रोतों में तय नहीं है।
औरंगजेब के दौर में क्या हुआ?
मुगल काल में भी सोमनाथ की स्थिति राजनीतिक बदलावों से प्रभावित हुई। ऐतिहासिक स्रोतों में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मंदिर को लेकर जारी किए गए आदेशों का उल्लेख मिलता है। कुछ स्रोत 1665 के आदेश का जिक्र करते हैं, जबकि 1706 से जुड़ा आदेश भी ऐतिहासिक विवरणों में सामने आता है। इन घटनाओं की प्रकृति और उनके वास्तविक क्रियान्वयन को लेकर इतिहास-लेखन में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। यही वजह है कि किसी एक तारीख को लेकर अत्यधिक निश्चित दावा करना इतिहास के जटिल दस्तावेजी रिकॉर्ड को सरल बना देना होगा।
क्या सोमनाथ को केवल एक समुदाय के खिलाफ संघर्ष के रूप में देखना सही है?
सोमनाथ के इतिहास पर चर्चा अक्सर धार्मिक और सामुदायिक नजरिये से होती है। लेकिन इतिहास का व्यापक अध्ययन यह भी दिखाता है कि मध्यकालीन भारत में मंदिर, राजसत्ता और आर्थिक संसाधन आपस में गहराई से जुड़े हुए थे। इंडियन एक्सप्रेस की ऐतिहासिक समीक्षा में इतिहासकार रोमिला थापर के अध्ययन का हवाला देते हुए बताया गया है कि मध्यकाल में सभी मुस्लिम शासकों का मंदिरों के प्रति एक जैसा रवैया नहीं था। उदाहरण के तौर पर अकबर के शासनकाल में सोमनाथ में पूजा की अनुमति से संबंधित उल्लेख मिलता है। इसलिए सोमनाथ के इतिहास को केवल ‘एक धर्म बनाम दूसरा धर्म’ के फ्रेम में देखना ऐतिहासिक तस्वीर को अधूरा कर सकता है। सत्ता, युद्ध, संपत्ति, राजनीतिक प्रभुत्व और धार्मिक प्रतीकों की भूमिका—इन सभी पहलुओं को साथ रखकर इतिहास को समझना अधिक संतुलित दृष्टिकोण है।
अहिल्याबाई होल्कर ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
18वीं सदी में मराठा प्रभाव बढ़ने के साथ सोमनाथ में फिर धार्मिक गतिविधियों को नया आधार मिला। भारत सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के अनुसार, इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 18वीं सदी में सोमनाथ में एक नए मंदिर का निर्माण कराया। यह मंदिर आज भी सोमनाथ की ऐतिहासिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस दौर की पुनर्निर्माण प्रक्रिया यह दिखाती है कि पुराने धार्मिक केंद्रों की स्मृति राजनीतिक सत्ता बदलने के बावजूद समाप्त नहीं हुई।
आज का सोमनाथ मंदिर कैसे बना?
भारत की आजादी के बाद सोमनाथ के पुनर्निर्माण ने इतिहास को एक नया मोड़ दिया। 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का समर्थन किया और मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। गिर सोमनाथ जिला प्रशासन के अनुसार, 12 नवंबर 1947 को पटेल के सोमनाथ पहुंचने के बाद पुनर्निर्माण का निर्णय आगे बढ़ा। इसके लिए सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की गई और पारंपरिक सोमपुरा शिल्पकारों की मदद से नए मंदिर का निर्माण कराया गया। 11 मई 1951 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नए मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह किया। यही वह मंदिर है जो आज सोमनाथ की आधुनिक पहचान का केंद्र है।
क्या सोमनाथ पर ‘कितनी बार’ हमला हुआ?
यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम सवाल है। अगर केवल स्पष्ट रूप से दर्ज प्रमुख घटनाओं को देखा जाए, तो सरकारी स्रोत 1026, 1299 और 1395 जैसी प्रमुख घटनाओं का उल्लेख करते हैं। बाद के मुगल दौर में औरंगजेब से जुड़े आदेश भी इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन सोशल मीडिया और लोकप्रिय लेखों में इससे कहीं बड़ी संख्या दिखाई देती है। कई जगह सात बार, कुछ जगह 17 बार तक मंदिर के टूटने और बनने की बातें कही जाती हैं। इन आंकड़ों को एक ही श्रेणी में रखना मुश्किल है, क्योंकि कुछ गणनाओं में हमले, विध्वंस, आदेश, क्षति और पुनर्निर्माण के अलग-अलग चरणों को अलग घटना माना जाता है। इसलिए जिम्मेदार ऐतिहासिक रिपोर्टिंग में यह कहना अधिक सटीक है कि सोमनाथ मंदिर ने सदियों के दौरान कई हमले और विध्वंस झेले, लेकिन इसकी ‘कुल हमलों की संख्या’ पर एक सर्वमान्य ऐतिहासिक आंकड़ा नहीं है।
2026 में फिर चर्चा में क्यों है सोमनाथ?
सोमनाथ का इतिहास 2026 में एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने 1026 के पहले दर्ज हमले के एक हजार वर्ष पूरे होने और 1951 में वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ आयोजित किया। इस कार्यक्रम के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं के लिए यात्राएं भी आयोजित की गईं। संस्कृति मंत्रालय ने इसे धार्मिक आस्था के साथ भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर प्रस्तुत किया है। इससे साफ है कि सोमनाथ आज सिर्फ एक प्राचीन मंदिर नहीं है। यह भारत की ऐतिहासिक स्मृति, धार्मिक आस्था, स्थापत्य परंपरा और आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की बहस में भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है।
इतिहास से सबसे बड़ी सीख क्या मिलती है?
सोमनाथ की कहानी केवल हमलों की कहानी नहीं है। यह पुनर्निर्माण की कहानी भी है। सदियों के राजनीतिक बदलावों के बावजूद इस स्थल से जुड़ी धार्मिक परंपरा अलग-अलग दौर में फिर स्थापित होती रही। इतिहास के साथ न्याय करने का अर्थ यह भी है कि प्रमाणित घटनाओं को स्पष्ट रूप से बताया जाए और उन दावों से बचा जाए जिनके प्रमाण कमजोर या विवादित हैं। सोमनाथ के मामले में यही संतुलित नज़रिया जरूरी है।
निष्कर्ष
सोमनाथ मंदिर का इतिहास भारत के मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास के कई महत्वपूर्ण अध्यायों को एक साथ जोड़ता है। 1026 का महमूद गजनवी का हमला, 1299 और 1395 की प्रमुख घटनाएं, बाद के दौर के राजनीतिक उतार-चढ़ाव और फिर 18वीं सदी तथा स्वतंत्रता के बाद हुए पुनर्निर्माण—ये सभी इस ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सोमनाथ के हमलों की एक अंतिम और सर्वमान्य संख्या बताना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद रूप से सामने आता है—इस तीर्थ का अस्तित्व कई दौर के संकटों के बावजूद बना रहा और 11 मई 1951 को वर्तमान मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के साथ इसकी आधुनिक यात्रा ने नया अध्याय शुरू किया।
सोमनाथ का इतिहास इसलिए सिर्फ पत्थरों के टूटने और फिर जुड़ने की कहानी नहीं है; यह इस बात का दस्तावेज भी है कि इतिहास में किसी विरासत की पहचान उसके संघर्षों के साथ-साथ उसके पुनर्निर्माण से भी तय होती है।