भारत में गोल्ड सिर्फ़ ज्वेलरी नहीं, बल्कि इमोशन, निवेश और सिक्योरिटी का बड़ा ज़रिया माना जाता है। लेकिन हालिया अपील में प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए गोल्ड खरीद कम करने की बात कही। सवाल उठ रहा है कि जब भारत के पास पहले से बड़ा गोल्ड रिजर्व मौजूद है, तब सरकार को यह संदेश क्यों देना पड़ा? इस रिपोर्ट में समझिए भारत का गोल्ड स्टॉक, दुनिया के बड़े गोल्ड रिजर्व वाले देश, डॉलर पर असर, इम्पोर्ट बिल और भारतीय इकॉनमी की असली तस्वीर।
📍नई दिल्ली📰12 मई 2026✍️ Asif Khan
भारत में सोना सिर्फ़ एक धातु नहीं माना जाता। शादी-ब्याह से लेकर इमरजेंसी सेविंग तक, गोल्ड भारतीय समाज की फाइनेंशियल और कल्चरल लाइफ़ का अहम हिस्सा रहा है। लेकिन जब देश का नेतृत्व विदेशी मुद्रा बचाने की बात करते हुए गोल्ड खरीद पर संयम की अपील करता है, तब मामला केवल ज्वेलरी या निवेश तक सीमित नहीं रहता। इसके पीछे पूरी इकॉनमिक स्ट्रैटेजी जुड़ी होती है।
हाल के बयान के बाद यह सवाल तेज़ी से चर्चा में आया कि भारत के पास कुल कितना गोल्ड रिजर्व है, दुनिया में सबसे ज्यादा सोना किस देश के पास है और आखिर सरकार को गोल्ड इम्पोर्ट को लेकर चिंता क्यों रहती है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समय-समय पर अपने गोल्ड रिजर्व के आंकड़े जारी करता है। उपलब्ध आधिकारिक डेटा के मुताबिक भारत के पास 800 टन से अधिक गोल्ड रिजर्व मौजूद है। अलग-अलग रिपोर्ट्स में यह संख्या समय के साथ बदलती रहती है क्योंकि आरबीआई इंटरनेशनल मार्केट और रिजर्व मैनेजमेंट के हिसाब से खरीद-बिक्री करता रहता है।
भारत का एक हिस्सा देश के भीतर सुरक्षित रखा जाता है जबकि कुछ गोल्ड विदेशी वॉल्ट्स, खासकर ब्रिटेन की बैंकिंग व्यवस्था में स्टोर रहता है। इसका उद्देश्य इंटरनेशनल ट्रेड और लिक्विडिटी मैनेजमेंट को आसान बनाना होता है।
हाल के वर्षों में आरबीआई ने लगातार गोल्ड खरीद बढ़ाई है। इसकी बड़ी वजह डॉलर पर निर्भरता कम करना, वैश्विक अनिश्चितता से बचाव और रिजर्व पोर्टफोलियो को मजबूत करना माना जाता है।
दुनिया में सबसे बड़ा आधिकारिक गोल्ड रिजर्व अमेरिका के पास माना जाता है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व और ट्रेज़री सिस्टम के अंतर्गत हजारों टन सोना सुरक्षित रखा गया है। इसके बाद जर्मनी, इटली, फ्रांस, रूस और चीन जैसे देश भी बड़े गोल्ड होल्डर्स में गिने जाते हैं।
चीन और रूस ने पिछले कुछ वर्षों में डॉलर आधारित सिस्टम के जोखिम को देखते हुए गोल्ड रिजर्व तेजी से बढ़ाया है। यही वजह है कि कई एक्सपर्ट इसे “डी-डॉलराइजेशन स्ट्रैटेजी” से जोड़कर देखते हैं।
भारत भी अब उन देशों में शामिल हो चुका है जो अपने विदेशी मुद्रा भंडार में गोल्ड का हिस्सा धीरे-धीरे बढ़ा रहे हैं। हालांकि भारत अभी भी अमेरिका या यूरोपियन देशों के मुकाबले काफी पीछे है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर देश के पास सैकड़ों टन गोल्ड रिजर्व मौजूद है तो फिर गोल्ड खरीद कम करने की अपील क्यों?
असल वजह “गोल्ड रिजर्व” और “गोल्ड इम्पोर्ट” के फर्क में छिपी है।
आरबीआई का गोल्ड रिजर्व सरकार और सेंट्रल बैंक की फाइनेंशियल सिक्योरिटी का हिस्सा होता है। लेकिन भारत में आम लोग और ज्वेलरी इंडस्ट्री जो सोना खरीदते हैं, उसका बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड इम्पोर्टर्स में शामिल है।
जब भारत भारी मात्रा में गोल्ड इम्पोर्ट करता है, तब डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है। अगर लगातार ज्यादा डॉलर बाहर जाएं तो करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है और रुपये पर भी असर पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री की अपील को कई आर्थिक जानकार सीधे तौर पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन से जोड़कर देख रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों, जियोपॉलिटिकल तनाव और डॉलर की मजबूती के बीच भारत का इम्पोर्ट बिल पहले से दबाव में रहता है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का आयात करता है। अगर उसी समय गोल्ड इम्पोर्ट भी बहुत तेजी से बढ़े तो डॉलर की मांग और बढ़ जाती है। इससे रिजर्व पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
यानी संदेश यह है कि गैर-जरूरी गोल्ड खरीद कम हो तो विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
यह सवाल आसान नहीं है। भारत में गोल्ड केवल निवेश नहीं बल्कि सामाजिक परंपरा का हिस्सा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आज भी कई परिवार बैंकिंग सिस्टम से ज्यादा भरोसा सोने पर करते हैं।
शादी सीजन, त्योहार और अनिश्चित आर्थिक माहौल में गोल्ड की मांग अक्सर बढ़ जाती है। कई लोग इसे “सेफ हेवन एसेट” मानते हैं। शेयर बाजार गिरने या ग्लोबल संकट के दौरान भी लोग गोल्ड की तरफ भागते हैं।
इसलिए केवल अपील से गोल्ड डिमांड अचानक कम हो जाएगी, ऐसा मानना जल्दबाज़ी हो सकता है।
भारत सरकार पहले भी कई बार गोल्ड इम्पोर्ट कम करने की कोशिश कर चुकी है। इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाना, गोल्ड बॉन्ड स्कीम, डिजिटल गोल्ड और गोल्ड मॉनेटाइजेशन जैसी योजनाएं इसी दिशा में लाई गई थीं।
सरकार की कोशिश रही है कि लोग फिजिकल गोल्ड खरीदने की बजाय फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स की तरफ जाएं। इससे डॉलर आउटफ्लो कम हो सकता है।
हालांकि इन स्कीम्स को उम्मीद के मुताबिक व्यापक सफलता नहीं मिली। इसकी वजह भारतीय उपभोक्ताओं की पारंपरिक मानसिकता और फिजिकल गोल्ड के प्रति भरोसा माना जाता है।
दुनिया की कई सेंट्रल बैंक संस्थाएं मानती हैं कि गोल्ड रिजर्व आर्थिक संकट के समय सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। डॉलर, बॉन्ड मार्केट या जियोपॉलिटिकल तनाव के दौर में गोल्ड एक स्थिर संपत्ति माना जाता है।
इसी कारण रूस, चीन और कई एशियाई देशों ने हाल के वर्षों में गोल्ड खरीद बढ़ाई है। भारत भी इसी ट्रेंड का हिस्सा दिखाई देता है।
लेकिन कुछ एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि बहुत अधिक गोल्ड रिजर्व रखने से रिटर्न सीमित रहता है क्योंकि गोल्ड ब्याज नहीं देता। इसलिए रिजर्व मैनेजमेंट में संतुलन जरूरी होता है।
अगर सरकार गोल्ड इम्पोर्ट कम करने की दिशा में आगे बढ़ती है तो ज्वेलरी मार्केट, कीमतों और टैक्स स्ट्रक्चर पर असर दिख सकता है। इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ने से घरेलू बाजार में गोल्ड महंगा हो सकता है।
दूसरी तरफ अगर वैश्विक तनाव बढ़ता है तो इंटरनेशनल मार्केट में गोल्ड कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। ऐसे में भारतीय उपभोक्ताओं पर दोहरी मार पड़ सकती है।
हालांकि अभी तक ऐसी कोई आधिकारिक नीति घोषित नहीं हुई है जिसमें गोल्ड खरीद पर सीधे प्रतिबंध की बात कही गई हो। इसलिए मौजूदा स्थिति को अपील और आर्थिक सलाह के रूप में देखा जा रहा है।
इस मुद्दे पर अलग-अलग राय मौजूद है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी मजबूत स्थिति में है और तत्काल संकट जैसी तस्वीर नहीं दिखती। वहीं दूसरी राय यह कहती है कि लगातार बढ़ते इम्पोर्ट बिल और वैश्विक अस्थिरता के दौर में सावधानी जरूरी है।
भारत की इकॉनमी दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है। लेकिन ऊर्जा आयात और गोल्ड इम्पोर्ट जैसे क्षेत्रों में डॉलर निर्भरता अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
आने वाले समय में भारत गोल्ड रिजर्व बढ़ाने और गोल्ड इम्पोर्ट नियंत्रित करने की दोहरी रणनीति पर काम जारी रख सकता है। डिजिटल गोल्ड, गोल्ड बॉन्ड और घरेलू रिसाइक्लिंग मॉडल को और बढ़ावा दिया जा सकता है।
इसके साथ ही सरकार विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रखने के लिए निर्यात, निवेश और डॉलर इनफ्लो बढ़ाने पर भी जोर दे सकती है।
अगर वैश्विक तनाव और तेल कीमतें बढ़ती हैं तो गोल्ड और डॉलर दोनों भारतीय आर्थिक नीति के केंद्र में बने रह सकते हैं।
भारत का गोल्ड रिजर्व मजबूत माना जाता है, लेकिन देश की विशाल गोल्ड डिमांड विदेशी मुद्रा पर लगातार दबाव डालती है। यही वजह है कि सरकार समय-समय पर संयमित खरीद की सलाह देती रही है। यह मुद्दा केवल ज्वेलरी मार्केट का नहीं बल्कि रुपये, डॉलर, विदेशी मुद्रा और राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता से जुड़ा हुआ है।
दुनिया ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां गोल्ड फिर से रणनीतिक एसेट बनता दिखाई दे रहा है। ऐसे में भारत के लिए संतुलन सबसे बड़ी चुनौती होगी, रिजर्व भी मजबूत रहे और इम्पोर्ट बिल भी नियंत्रण में।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।