पुराने समय में खबरें एक जगह से दूसरी जगह कैसे पहुंचती थीं?
आज किसी घटना की जानकारी कुछ ही सेकंड में मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिए दुनिया के दूसरे हिस्से तक पहुंच सकती है। लेकिन संचार के आधुनिक साधन आने से बहुत पहले खबरों और संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए इंसानों, घोड़ों और निर्धारित पड़ावों पर निर्भर रहना पड़ता था।
भारत के डाक इतिहास से जुड़े सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि अलग-अलग कालखंडों में संदेशवाहक, पैदल धावक और घुड़सवार संदेश प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता था। इन व्यवस्थाओं का उपयोग खासतौर पर शासकों और प्रशासन की आधिकारिक सूचनाएं पहुंचाने में होता था।
संदेशवाहक थे संचार की अहम कड़ी
पुराने समय में राजा और शासक सूचनाएं पहुंचाने के लिए संदेशवाहकों और धावकों का इस्तेमाल करते थे। India Post के ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुसार, प्राचीन काल में शासक और राजा जानकारी भेजने तथा प्राप्त करने के लिए runners और messengers जैसी सेवाओं का इस्तेमाल करते थे।
इस व्यवस्था में संदेश एक व्यक्ति से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता था। लंबी दूरी के मामलों में बीच के पड़ाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। धावक एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक संदेश लेकर जाते और आगे की यात्रा के लिए संदेश दूसरे धावक को सौंपा जा सकता था।
पैदल धावकों की होती थी अहम भूमिका
पुराने डाक तंत्र में पैदल धावक यानी मेल रनर एक महत्वपूर्ण माध्यम थे। India Post के दस्तावेज के अनुसार, कई सदियों तक संदेशों को पैदल धावकों की relay व्यवस्था के जरिए पहुंचाया जाता था।
धावक एक गांव या निर्धारित पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक जाते थे। सरकारी विवरण में यह भी उल्लेख है कि ऐसे धावक दिन-रात काम करते थे और उन्हें रास्ते में प्राकृतिक परिस्थितियों, जंगली जानवरों और लुटेरों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता था।
घोड़ों से तेज होती थी संदेश पहुंचाने की व्यवस्था
दूरी अधिक होने पर घोड़ों का इस्तेमाल संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था। India Post के आधिकारिक Postal History के अनुसार, 1296 में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में घोड़े और पैदल दोनों तरह की डाक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
14वीं सदी में यात्री इब्न बतूता ने तुगलक काल की संचार व्यवस्था का वर्णन करते हुए घुड़सवारों और पैदल धावकों का उल्लेख किया था।
शेरशाह सूरी के समय विकसित हुई घुड़सवार डाक व्यवस्था
मध्यकालीन भारत में संचार व्यवस्था को व्यवस्थित रूप देने के महत्वपूर्ण उदाहरणों में शेरशाह सूरी का काल भी शामिल है।
India Post के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक, 1541 में शेरशाह ने बंगाल से सिंध तक करीब 2,000 मील लंबे मार्ग पर घुड़सवार डाक व्यवस्था शुरू की। इस व्यवस्था ने लंबी दूरी तक संदेश पहुंचाने के लिए घोड़ों और मार्गों की भूमिका को मजबूत किया।
India Post के एक अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुसार, शेरशाह ने संचार व्यवस्था को आगे विकसित किया और सड़क मार्गों के साथ सरायों की व्यवस्था की, जहां यात्रियों और संदेश पहुंचाने वाली व्यवस्था को सहारा मिलता था।
खबरों के साथ प्रशासनिक सूचनाएं भी पहुंचती थीं
पुराने संचार तंत्र का इस्तेमाल केवल आम खबरों के लिए नहीं होता था। इसका बड़ा हिस्सा राजकीय और प्रशासनिक संचार से जुड़ा था।
India Post के Mail Runner दस्तावेज में बताया गया है कि शुरुआती दौर में मेल रनर मुख्य रूप से शासकों के लिए आधिकारिक सूचनाएं और युद्ध संबंधी समाचार पहुंचाते थे।
यानी आज के सरकारी संचार तंत्र की तरह उस समय भी शासन चलाने के लिए तेज और भरोसेमंद सूचना पहुंचाना जरूरी था।
शिलालेख भी सूचना पहुंचाने का माध्यम थे
संदेश पहुंचाने का एक अलग और महत्वपूर्ण माध्यम शिलालेख भी रहा। Archaeological Survey of India के अनुसार, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में पूरे उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में पाए गए हैं। इनमें सम्राट अशोक की नैतिक और प्रशासनिक शिक्षाएं दर्ज थीं।
इससे पता चलता है कि सूचना को केवल व्यक्ति के माध्यम से भेजना ही तरीका नहीं था; महत्वपूर्ण संदेशों को पत्थरों और अन्य माध्यमों पर लिखकर भी व्यापक क्षेत्र तक पहुंचाया जाता था।
फिर आया संगठित डाक तंत्र
समय के साथ संदेश पहुंचाने की व्यवस्था अधिक संगठित होती गई। India Post के अनुसार, 18वीं और 19वीं शताब्दी में भारत में डाक व्यवस्था का संस्थागत विकास हुआ।
1774 में कलकत्ता GPO, 1786 में मद्रास GPO और 1794 में बॉम्बे GPO की स्थापना का उल्लेख India Post के Postal History रिकॉर्ड में मिलता है।
इसके बाद 1854 का Post Office Act भारतीय डाक व्यवस्था के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव बना। उसी वर्ष Railway Mail Service और भारत से ब्रिटेन तथा चीन के लिए Sea Mail Service शुरू होने का भी सरकारी रिकॉर्ड में उल्लेख है।
आज की तेज संचार व्यवस्था तक पहुंचा सफर
पैदल धावकों और घुड़सवारों से शुरू हुआ संचार का यह सफर धीरे-धीरे संगठित डाक, रेल, समुद्री डाक, टेलीग्राफ और बाद में आधुनिक डिजिटल संचार तक पहुंचा।
इस इतिहास को देखने पर स्पष्ट होता है कि सूचना को तेजी से पहुंचाने की जरूरत नई नहीं है। तकनीक बदलती रही, लेकिन दूर बैठे लोगों तक संदेश पहुंचाने की आवश्यकता सदियों से बनी रही।
निष्कर्ष
मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर से पहले खबरों की यात्रा काफी लंबी और मेहनत भरी होती थी। भारत में पैदल धावक, संदेशवाहक और घुड़सवार डाक इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ियां रहे। बाद में सड़क, सराय, संगठित डाकघर और रेलवे जैसी व्यवस्थाओं ने संचार को और व्यवस्थित किया।
आज संदेश कुछ सेकंड में पहुंचता है, लेकिन इस तेज संचार व्यवस्था के पीछे सदियों में विकसित हुई एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा छिपी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।