भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों की परंपरा कैसे विकसित हुई?
आज पुस्तकालयों को किताबें पढ़ने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने, शोध करने और नई जानकारी हासिल करने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। लेकिन भारत में ज्ञान को सुरक्षित रखने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने की परंपरा बहुत पुरानी है। समय के साथ यह परंपरा धार्मिक एवं शैक्षणिक केंद्रों, राजकीय पुस्तक संग्रहों और संस्थागत पुस्तकालयों से आगे बढ़कर आम नागरिकों के लिए उपलब्ध सार्वजनिक पुस्तकालयों तक पहुंची। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि प्राचीन भारत के शिक्षा-केंद्रों और आधुनिक अर्थों में सार्वजनिक पुस्तकालयों के बीच अंतर था। पुराने समय में कई संग्रह विशेष संस्थानों, विद्वानों, धार्मिक समुदायों या राजपरिवारों से जुड़े होते थे। आज जिस सार्वजनिक पुस्तकालय की कल्पना की जाती है, उसमें आम लोगों को निर्धारित नियमों के तहत किताबें पढ़ने और कई मामलों में उन्हें घर ले जाने की सुविधा मिलती है।
प्राचीन भारत में कैसे सुरक्षित रखा जाता था ज्ञान?
भारत में छपाई की आधुनिक तकनीक के व्यापक प्रसार से पहले ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए मौखिक परंपरा, ताड़पत्रों, भोजपत्रों और अन्य लेखन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता था। धार्मिक ग्रंथों, दर्शन, चिकित्सा, गणित, व्याकरण और साहित्य से जुड़ी सामग्री को लिखकर संरक्षित किया जाता था।गुरुकुलों, मठों, विहारों और अन्य शिक्षा-केंद्रों में अध्ययन-अध्यापन की परंपराएं मौजूद थीं। हालांकि, इन सभी संस्थानों को आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालय कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। इनके संग्रह तक पहुंच संस्थान की प्रकृति और उस समय की व्यवस्थाओं पर निर्भर करती थी।
नालंदा और तक्षशिला जैसे शिक्षा-केंद्रों की भूमिक
प्राचीन भारत के नालंदा महाविहार जैसे शिक्षा-केंद्रों ने अध्ययन, बौद्धिक विमर्श और ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नालंदा में विभिन्न विषयों का अध्ययन होता था और वहां विद्वानों तथा विद्यार्थियों का बड़ा समुदाय जुड़ा हुआ था। तक्षशिला भी प्राचीन शिक्षा-परंपरा के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। लेकिन इन संस्थानों के पुस्तक संग्रहों के आकार, उनकी व्यवस्था और आम लोगों के लिए उपलब्धता के बारे में लिखते समय प्रमाणित ऐतिहासिक स्रोतों का सहारा लेना जरूरी है। इनके बारे में प्रचलित हर विवरण को समान रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता।
आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालयों की शुरुआत कब हुई?
भारत में आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास को समझने के लिए 19वीं सदी का कोलकाता एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, 21 मार्च 1836 को कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना हुई थी। इसका उद्देश्य पाठकों को संदर्भ सामग्री देखने और किताबें उधार लेने की सुविधा देना था। इसे भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों के इतिहास की प्रमुख शुरुआती संस्थाओं में गिना जाता है।
इस दौर में पुस्तकालयों का विकास शिक्षा, अध्ययन और शोध की जरूरतों के साथ जुड़ा हुआ था। हालांकि, उस समय की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण हर व्यक्ति के लिए पुस्तकालयों तक पहुंच समान रूप से आसान नहीं थी।
एशियाटिक सोसाइटी की लाइब्रेरी ने भी निभाई अहम भूमिक
कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना 15 जनवरी 1784 को हुई थी। इस संस्था ने एशिया के इतिहास, भाषाओं, साहित्य और संस्कृति के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। इसकी लाइब्रेरी में दुर्लभ पांडुलिपियां, ऐतिहासिक दस्तावेज और विभिन्न भाषाओं की पुस्तकें संरक्षित हैं। यह मुख्य रूप से विद्वानों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण केंद्र रही है, इसलिए इसे आधुनिक अर्थ में हर नागरिक के लिए खुले सार्वजनिक पुस्तकालय के समान नहीं समझना चाहिए।
चेन्नई की कॉनेमारा लाइब्रेरी का इतिहास
भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख संस्थाओं में चेन्नई की कॉनेमारा पब्लिक लाइब्रेरी भी शामिल है। इसका शिलान्यास 22 मार्च 1890 को हुआ और यह 5 दिसंबर 1896 को औपचारिक रूप से खुली।तमिलनाडु सरकार के पुस्तकालय निदेशालय के अनुसार, यह पुस्तकालय बाद में राज्य केंद्रीय पुस्तकालय बना। आज यह भारत में प्रकाशित पुस्तकों, समाचारपत्रों और पत्रिकाओं की प्रतियां प्राप्त करने वाली चार राष्ट्रीय निक्षेपागार पुस्तकालयों में से एक है।
आजादी के बाद सार्वजनिक पुस्तकालयों को मिला नया विस्तार
भारत की स्वतंत्रता के बाद पुस्तकालयों को ज्ञान, शिक्षा और नागरिकों की जानकारी तक पहुंच के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया।राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता का इतिहास कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी से जुड़ा है। 1902 में कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी और इम्पीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी के संग्रहों को मिलाकर इम्पीरियल लाइब्रेरी बनाई गई। स्वतंत्रता के बाद 1948 में इसका नाम बदलकर नेशनल लाइब्रेरी किया
गया और 1 फरवरी 1953 को इसे जनता के लिए खोला गया। एक अन्य महत्वपूर्ण पड़ाव दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना थी। इसे 1951 में यूनेस्को की तकनीकी सहायता और भारत सरकार के सहयोग से शुरू किया गया। इसका उद्घाटन 27 अक्टूबर 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। इसका उद्देश्य आम लोगों तक पढ़ने और सीखने की सुविधाएं पहुंचाना था।
सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास में कानून और सरकारी संस्थाओं की भूमिका
भारत में पुस्तकालयों को व्यवस्थित करने के लिए संस्थागत प्रयास भी किए गए। डिलीवरी ऑफ बुक्स एंड न्यूजपेपर्स (पब्लिक लाइब्रेरीज) एक्ट, 1954 के तहत भारत में प्रकाशित पुस्तकों और अन्य निर्धारित प्रकाशनों की प्रतियां निर्दिष्ट पुस्तकालयों तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई। 1956 में इस कानून में संशोधन कर पत्रिकाओं, समाचारपत्रों और मानचित्रों को भी शामिल किया गया। इससे देश की प्रकाशित सामग्री को सुरक्षित रखने में राष्ट्रीय पुस्तकालय की भूमिका मजबूत हुई।
सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास और उन्हें सहयोग देने के लिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन भी महत्वपूर्ण संस्था है। यह राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर सार्वजनिक पुस्तकालय सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए काम करती है।
डिजिटल दौर में बदलती पुस्तकालयों की भूमिका
आज पुस्तकालय केवल किताबें रखने की जगह नहीं रह गए हैं। वे विद्यार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों, शोधकर्ताओं और सामान्य पाठकों के लिए अध्ययन और संदर्भ के केंद्र हैं। कई संस्थाएं अपनी दुर्लभ पुस्तकों और पांडुलिपियों को डिजिटल स्वरूप में भी उपलब्ध करा रही हैं। राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता ने पुरानी और महत्वपूर्ण सामग्री के डिजिटलीकरण का काम किया है। इससे ऐसी सामग्री तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है, जिसे भौतिक रूप में संभालना और बार-बार उपयोग करना कठिन हो सकता है। फिर भी, डिजिटल संसाधनों का विस्तार पारंपरिक पुस्तकालयों की जरूरत को समाप्त नहीं करता। इंटरनेट, उपकरणों और डिजिटल सामग्री तक पहुंच सभी लोगों के लिए समान नहीं है। ऐसे में स्थानीय पुस्तकालय अध्ययन के लिए स्थान, पुस्तकों तक पहुंच और सामुदायिक सीखने के अवसर प्रदान कर सकते हैं।
आगे क्या है?
सार्वजनिक पुस्तकालयों की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि वे स्थानीय जरूरतों के अनुसार किताबें, समाचारपत्र, डिजिटल संसाधन और पाठकों के लिए सुविधाएं उपलब्ध करा पाते हैं या नहीं। बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करना, विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना और दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेजों को सुरक्षित रखना इनके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं।
निष्कर्ष
भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों की परंपरा किसी एक दिन या एक संस्था से शुरू होकर विकसित नहीं हुई। इसकी जड़ें पुरानी ज्ञान-संरक्षण परंपराओं में हैं, जबकि आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालयों का संस्थागत विकास खास तौर पर 19वीं और 20वीं सदी में आगे बढ़ा। कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी, कॉनेमारा पब्लिक लाइब्रेरी और राष्ट्रीय पुस्तकालय जैसी संस्थाएं इस सफर के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
पुस्तकालयों का इतिहास हमें याद दिलाता है कि ज्ञान का महत्व केवल उसे संचित करने में नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रखने, साझा करने और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में भी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।