सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने उठाया ‘पैटर्न’ का सवाल, CJI सूर्यकांत की बेंच ने कहा, पहले खुद आईना देखें
Wasi Siddiqui
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2026-09-29 15:59:55
TMC के बागी विधायकों की अयोग्यता पर सुनवाई, कपिल सिब्बल ने उठाया देरी का मुद्दा
विधायक अयोग्यता मामले में ‘पैटर्न’ पर बहस, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के आत्मनिरीक्षण की बात कही
स्पीकर के फैसले में देरी पर सुप्रीम कोर्ट में बहस, 8 अक्टूबर तक निर्णय की उम्मीद
📍 नई दिल्ली
🗓️ 29 सितंबर 2026
✍️ Wasi siddiqui
Introduction
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 10 बागी विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को स्पीकर के स्तर पर फैसले में देरी और ऐसे मामलों के कथित पैटर्न पर चर्चा हुई।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने दलील दी कि अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला टलने का एक पैटर्न दिखाई देता है। उन्होंने अदालत से इस पहलू की भविष्य में जांच करने की बात कही। इसके जवाब में जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि निर्देश जारी करने से पहले न्यायपालिका को भी अपने कामकाज का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।
Essential Facts
मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा के 10 ऐसे विधायकों से जुड़ा है, जिनके खिलाफ तृणमूल कांग्रेस की ओर से अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की गई हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक ये याचिकाएं 8 जुलाई 2026 को दाखिल हुई थीं और 3 महीने की अवधि 8 अक्टूबर को पूरी हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
Main Development
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने अदालत से स्पीकर के कार्यालय से जवाब लेने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अयोग्यता मामलों में फैसला लंबित रहने से राजनीतिक परिस्थितियों पर असर पड़ सकता है और ऐसे मामलों में देरी का एक पैटर्न देखने को मिलता है।
सिब्बल ने अदालत के 2020 के केइशाम मेघचंद्र सिंह मामले में दिए गए फैसले का संदर्भ भी उठाया। उस फैसले में स्पीकर द्वारा अयोग्यता याचिकाओं पर उचित समय में फैसला लेने से जुड़े सिद्धांत निर्धारित किए गए थे।
अदालत में क्या हुआ
पीठ ने संकेत दिया कि वह अलग से कोई नया निर्देश जारी करने के बजाय पहले से स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप स्पीकर से कार्रवाई की उम्मीद जताएगी।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान न्यायपालिका के अपने मामलों में समयसीमा का पालन करने के रिकॉर्ड पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दूसरे संवैधानिक प्राधिकारों को समयसीमा का निर्देश देने से पहले अदालत को खुद अपने कामकाज को देखना चाहिए।
यह टिप्पणी सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा रही, क्योंकि बहस केवल स्पीकर की भूमिका तक सीमित नहीं रही। इसमें न्यायपालिका के अपने लंबित मामलों और निर्धारित समयसीमाओं के पालन का सवाल भी सामने आया।
कपिल सिब्बल का तर्क
सिब्बल ने यह तर्क रखा कि अदालत को ऐसे मामलों में फैसले में देरी के व्यापक पैटर्न की समीक्षा करनी चाहिए। उनका संकेत उन परिस्थितियों की ओर था, जहां अयोग्यता याचिकाओं पर समय पर फैसला नहीं होने से राजनीतिक घटनाक्रम आगे बढ़ता रहता है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार सिब्बल ने यह नहीं कहा कि अदालत तत्काल किसी विशेष निष्कर्ष पर पहुंचे। उन्होंने भविष्य में इस कथित पैटर्न की न्यायिक जांच की संभावना पर जोर दिया।
संवैधानिक संदर्भ
भारत के संविधान की 10वीं अनुसूची दल-बदल से जुड़े मामलों में विधायकों की अयोग्यता का प्रावधान करती है। ऐसे मामलों में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
2020 में केइशाम मेघचंद्र सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। अदालत ने उचित समय में निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया था।
मौजूदा मामले में इसी न्यायिक सिद्धांत का संदर्भ सामने आया है।
महत्वपूर्ण तारीखें
10 बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं 8 जुलाई 2026 को दाखिल की गईं।
3 महीने की अवधि 8 अक्टूबर 2026 को पूरी हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि विधानसभा अध्यक्ष कानून और संबंधित न्यायिक फैसले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार समय पर उचित निर्णय लेंगे।
‘पैटर्न’ का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है
सिब्बल की दलील का केंद्र केवल मौजूदा 10 विधायकों का मामला नहीं था। सवाल यह था कि क्या अयोग्यता याचिकाओं पर फैसले में देरी अलग-अलग मामलों में बार-बार दिखाई देती है।
इस दावे को अदालत ने इस सुनवाई में किसी अंतिम निष्कर्ष के रूप में स्वीकार नहीं किया है। इसलिए इसे स्थापित तथ्य के बजाय सिब्बल की ओर से उठाए गए कानूनी तर्क के रूप में देखना जरूरी है।
न्यायपालिका का आत्मनिरीक्षण
सुनवाई का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू न्यायपालिका के अपने कामकाज से जुड़ा रहा। जस्टिस बागची की टिप्पणी का आशय था कि यदि अदालत दूसरे संवैधानिक संस्थानों के लिए समयसीमा तय करती है, तो उसे यह भी देखना चाहिए कि न्यायपालिका खुद ऐसी वैधानिक समयसीमाओं का कितना पालन करती है।
यह टिप्पणी किसी विशेष मामले में न्यायपालिका के प्रदर्शन पर अंतिम फैसला नहीं थी। यह अदालत के कामकाज में आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता पर एक व्यापक टिप्पणी थी।
आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को इस उम्मीद के साथ निपटाने का संकेत दिया कि विधानसभा अध्यक्ष 8 अक्टूबर तक संबंधित अयोग्यता याचिकाओं पर कानून के अनुरूप फैसला करेंगे।
अदालत ने 2020 के केइशाम मेघचंद्र सिंह फैसले में निर्धारित सिद्धांतों के पालन की उम्मीद जताई है। अब आगे की कार्रवाई पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष के स्तर पर होगी।
पश्चिम बंगाल के 10 बागी विधायकों की अयोग्यता का मामला एक बार फिर दल-बदल कानून के तहत स्पीकर की भूमिका और फैसले की समयसीमा को केंद्र में ले आया है।
सुनवाई में कपिल सिब्बल ने अयोग्यता मामलों में देरी के कथित पैटर्न पर सवाल उठाया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे संवैधानिक प्राधिकारों को समयसीमा से जुड़े निर्देश देने से पहले न्यायपालिका के अपने रिकॉर्ड पर भी नजर डालने की जरूरत बताई।
फिलहाल अदालत का रुख स्पष्ट रूप से इस बात पर केंद्रित है कि संबंधित अयोग्यता याचिकाओं पर स्थापित संवैधानिक और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप समय पर निर्णय हो। अंतिम राजनीतिक और कानूनी असर आगे होने वाली कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
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Wasi Siddiqui
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।