2027 में होने जा रही जनगणना को लेकर केंद्र सरकार ने आधिकारिक अधिसूचना की तैयारी शुरू कर दी है। यह एक ऐतिहासिक मौका है—जहां पहली बार जातिगत आंकड़े जुटाए जाने जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह 'जाति जनगणना' वाकई ओबीसी की स्थिति को स्पष्ट करेगी, या फिर यह महज़ एक तकनीकी प्रक्रिया बनकर रह जाएगी?
सरकार ने साफ किया है कि इस जनगणना में जाति गिनी जाएगी, वर्ग नहीं। यानी अगर आप ओबीसी हैं, तो सरकार यह तो नोट करेगी कि आप किस जाति से हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाएगा कि आप ओबीसी वर्ग में आते हैं या नहीं। यहीं से समस्या की शुरुआत होती है।
भारत में OBC वर्ग सबसे बड़ी आबादी मानी जाती है। मंडल कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक इनकी संख्या करीब 52% है, जबकि 2011 में हुई सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़े कभी सार्वजनिक ही नहीं किए गए। अब जबकि जाति पूछी जाएगी, तो वर्ग यानी OBC, SC, ST या General की संख्या फिर से अधूरी ही रहेगी।
क्या यह आंकड़ों की चूक है या जानबूझकर उठाया गया रणनीतिक कदम? इसका जवाब छुपा है चुनावी राजनीति में।
जनगणना का मूल उद्देश्य देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को समझना होता है, लेकिन भारत जैसे लोकतंत्र में यह सीट बंटवारे और आरक्षण की बुनियाद बन जाता है।
तो क्या जनगणना एक नीतिगत टालमटोल का माध्यम बन चुकी है?
वर्तमान राजनीतिक माहौल में OBC वोट बैंक की अहमियत बहुत अधिक है। लेकिन यदि सटीक संख्या सामने आ जाती है, तो इससे राजनीतिक दलों पर सामाजिक न्याय की मांगों को पूरा करने का दबाव बढ़ जाएगा। यही वजह हो सकती है कि सरकार जातिगत पहचान तो दर्ज कर रही है, लेकिन उसे वर्गबद्ध करने से परहेज़ कर रही है।
क्या यह OBC को अदृश्य रखने की एक रणनीति है? यदि नहीं, तो फिर वर्ग आधारित संख्या को सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?
सरकार ने दावा किया है कि डिजिटल माध्यम से यह जनगणना तीन साल में पूरी होगी। फिर भी, आंकड़ों को 2029 से पहले लाना संभव नहीं बताया जा रहा। पिछली जनगणना में भी दो साल लगे थे, और परिसीमन आयोग को साढ़े तीन साल।
तो सवाल उठता है कि क्या जनगणना को जानबूझकर धीमा किया जा रहा है ताकि इसके असर से बचा जा सके?
जनगणना के आंकड़े परिसीमन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन दक्षिण भारत के राज्य चिंतित हैं कि जनसंख्या नियंत्रण के कारण उनकी लोकसभा सीटें घट सकती हैं।
इससे उत्तर बनाम दक्षिण का टकराव और गहराने की आशंका है, और टीडीपी जैसे सहयोगी दलों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ सकती है। ऐसे में केंद्र सरकार राजनीतिक संतुलन साधने के चक्कर में जातिगत जनगणना को केवल एक औपचारिकता बनाकर पेश कर रही है।
जनगणना सिर्फ गिनती नहीं, गुणवत्ता की सामाजिक-राजनीतिक अभिव्यक्ति है। अगर हम OBC की संख्या नहीं जानते, तो हम उनके अधिकार, आरक्षण और प्रतिनिधित्व की जरूरत कैसे तय करेंगे?
इसलिए अब सवाल यह नहीं कि जनगणना कब होगी, बल्कि यह है कि क्या सरकार OBC की पहचान को स्वीकार करने को तैयार है?
यदि देश को सामाजिक न्याय की सच्ची दिशा में आगे बढ़ना है, तो जाति के साथ-साथ वर्ग का आंकड़ा सार्वजनिक करना अनिवार्य होगा। नहीं तो जनगणना एक तकनीकी प्रक्रिया बनकर रह जाएगी और सामाजिक न्याय एक अधूरा सपना।
जातिगत जनगणना का उद्देश्य अगर सिर्फ जाति लिखवाना है, OBC की पहचान दर्ज करना नहीं, तो यह प्रक्रिया जनता के विश्वास और लोकतंत्र की पारदर्शिता से खिलवाड़ होगी।
देश को अब यह तय करना है कि हम आंकड़ों को छिपाकर सत्ता साधेंगे या उन्हें उजागर करके समाज को समावेशी बनाएंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।