कीव में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के प्रयासों में भारत की मदद की पेशकश की। उन्होंने कहा कि समाधान युद्ध के मैदान से नहीं, संवाद, कूटनीति और बातचीत से निकलेगा। यूक्रेनी विदेश मंत्री और राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात में ब्लैक सी शिपिंग, खाद्य, ईंधन और द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा हुई।
Location: कीव, यूक्रेन
Date: 3 सितंबर 2026
Byline: Apurva Choudhary
कीव में भारत ने शांति को लेकर अपना रुख दोहराया
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कीव में भारत का रुख एक बार फिर स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि अगर भारत किसी भी तरह से युद्ध को समाप्त कराने में मदद कर सकता है, तो वह इसके लिए तैयार है। जयशंकर ने समाधान का रास्ता संवाद, कूटनीति और बातचीत को बताया।
जयशंकर की यह टिप्पणी ऐसे वक्त आई है जब युद्ध के पांचवें वर्ष में भी रूस और यूक्रेन के बीच सैन्य संघर्ष जारी है। भारत लगातार दोनों पक्षों के बीच बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए समाधान की वकालत करता रहा है।
यूक्रेनी विदेश मंत्री से अहम बातचीत
कीव में जयशंकर ने यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्रिय सिबिहा के साथ बातचीत की। दोनों नेताओं के बीच रूस-यूक्रेन संघर्ष, शांति प्रक्रिया, ब्लैक सी की स्थिति और भारत-यूक्रेन द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा हुई।
सिबिहा ने भारत की भूमिका को लेकर अधिक सक्रिय भागीदारी की उम्मीद जताई। यूक्रेन ने युद्ध समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया।
भारत की ओर से संदेश स्पष्ट रहा कि संघर्ष का स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत के जरिए तलाशना होगा। जयशंकर ने कहा कि युद्ध से जुड़ी समस्याओं का समाधान केवल किसी एक देश की आर्थिक या व्यापारिक गतिविधि को दबाव में लेकर नहीं किया जा सकता।
ब्लैक सी में कमर्शियल शिपिंग पर भी चिंता
दोनों पक्षों के बीच बातचीत में ब्लैक सी में कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा भी प्रमुख मुद्दा रही। जयशंकर ने कहा कि भारतीय नाविक अलग-अलग देशों के झंडे वाले जहाजों पर काम करते हैं और संघर्ष के कारण समुद्री हमलों तथा व्यवधानों से प्रभावित हुए हैं।
इसका असर केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं है। शिपिंग रूट में व्यवधान से ईंधन, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका प्रभाव ग्लोबल साउथ के कई देशों पर पड़ता है।
यूक्रेन ने भी ब्लैक सी में बंदरगाहों और नागरिक शिपिंग की सुरक्षा को अहम बताया। खाद्य आपूर्ति और समुद्री व्यापार से जुड़े रास्तों को बाधित होने से रोकना दोनों पक्षों की बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
जेलेंस्की से भी मिले जयशंकर
जयशंकर ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से भी मुलाकात की। उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि बातचीत में यूक्रेन के विदेश मंत्री के साथ हुई चर्चा और संघर्ष को समाप्त करने के संभावित रास्तों को आगे बढ़ाया गया।
जेलेंस्की ने भारत की शांति संबंधी स्थिति का स्वागत किया और कहा कि यूक्रेन भारत की युद्ध समाप्त करने की इच्छा को महत्व देता है। उन्होंने ब्लैक सी की स्थिति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की।
यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जयशंकर की यह यूक्रेन की पहली स्वतंत्र द्विपक्षीय यात्रा है। इससे पहले अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूक्रेन यात्रा के दौरान जयशंकर उनके प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे।
रूस के साथ संबंधों के बीच भारत की कूटनीतिक स्थिति
भारत के सामने इस मामले में एक जटिल कूटनीतिक संतुलन भी है। नई दिल्ली के रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंध हैं, वहीं यूक्रेन के साथ भी भारत द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ाना चाहता है।
जयशंकर ने रूस से तेल खरीद को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में भी कहा कि युद्ध को केवल तेल खरीदने या न खरीदने के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक संघर्ष का समाधान अंततः संवाद, कूटनीति और बातचीत से ही तलाशना होगा।
यह रुख भारत की उस व्यापक विदेश नीति के अनुरूप है जिसमें वह अलग-अलग पक्षों के साथ संवाद बनाए रखते हुए युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देता रहा है।
मानवीय सहायता का भी जिक्र
जयशंकर ने यूक्रेन को भारत की ओर से दी गई मानवीय सहायता का भी उल्लेख किया। भारत के मुताबिक अब तक यूक्रेन को 19 खेपों में मानवीय सहायता भेजी गई है, जिसमें जनरेटर, दवाएं और मेडिकल उपकरण शामिल हैं। कुल सहायता करीब 160 टन बताई गई है।
इससे भारत यह संदेश भी देना चाहता है कि उसकी यूक्रेन नीति केवल राजनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है। मानवीय जरूरतों और युद्ध के आम लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी द्विपक्षीय संवाद में जगह दी जा रही है।
व्यापार और भविष्य के सहयोग पर भी चर्चा
जयशंकर और सिबिहा की बातचीत में द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को आगे बढ़ाने के मुद्दे भी शामिल रहे। दोनों पक्षों ने ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि, फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल क्षेत्र और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा की।
यूक्रेन ने भारतीय कंपनियों की पुनर्निर्माण प्रक्रिया में संभावित भागीदारी में भी रुचि दिखाई है। युद्ध के कारण दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को नुकसान पहुंचा है, लेकिन दोनों सरकारें भविष्य में आर्थिक सहयोग के नए रास्ते तलाशने की कोशिश कर रही हैं।
क्या भारत मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा?
जयशंकर ने भारत की ओर से “किसी भी तरह की मदद” की पेशकश जरूर की है, लेकिन इसे औपचारिक मध्यस्थता की घोषणा के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। अभी भारत ने किसी नए औपचारिक mediation mechanism या शांति वार्ता की मेजबानी की घोषणा नहीं की है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह रूस के साथ अपने संबंधों को बनाए रखते हुए यूक्रेन के साथ भी भरोसेमंद संवाद जारी रखे। इसी संतुलन के बीच भारत की कूटनीतिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि मॉस्को और कीव दोनों उसके संवाद को कितना स्वीकार करते हैं।
शांति प्रयासों में भारत की संभावित भूमिका
रूस और यूक्रेन के बीच शांति की कोई ठोस प्रक्रिया तभी आगे बढ़ सकती है जब दोनों पक्ष बातचीत के लिए राजनीतिक इच्छा दिखाएं। भारत की भूमिका किसी एक पक्ष पर दबाव बनाने से ज्यादा संवाद के लिए संपर्क और विश्वास का माध्यम उपलब्ध कराने में हो सकती है।
3 सितंबर को जयशंकर का बयान इसी व्यापक कूटनीतिक संदेश को मजबूत करता है कि भारत युद्ध को लंबा खिंचते देखने के बजाय बातचीत के जरिए समाधान की संभावना तलाशने के पक्ष में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हाल में युद्ध को समाप्त करने और शांति की दिशा में आगे बढ़ने की अपील कर चुके हैं।
हालांकि, वास्तविक शांति प्रक्रिया की दिशा अभी स्पष्ट नहीं है। रूस और यूक्रेन के बीच जमीन, सुरक्षा और राजनीतिक भविष्य से जुड़े कई गंभीर मतभेद बने हुए हैं। इसलिए भारत की पेशकश को फिलहाल कूटनीतिक समर्थन और संभावित सहयोग की पेशकश के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा, न कि युद्ध खत्म होने की किसी तत्काल पहल के रूप में।