भारत अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक सिस्टम खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सर्जियो गोर ने इसकी जानकारी दी। प्रस्तावित सौदे में 100 मिसाइल राउंड और 25 लॉन्च यूनिट शामिल हैं।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 28 अगस्त 2026
✍️ Mohd Naved
भारत की रक्षा खरीद में जैवलिन की एंट्री
भारत और अमेरिका के रक्षा रिश्तों में एक और अहम पड़ाव सामने आया है। भारत अमेरिकी जैवलिन एंटी-टैंक सिस्टम खरीदने की योजना पर आगे बढ़ रहा है। अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने शुक्रवार को इसकी जानकारी दी। रॉयटर्स के मुताबिक, उन्होंने जैवलिन को युद्ध में इस्तेमाल से परखा हुआ एंटी-टैंक सिस्टम बताया और भारत की प्रस्तावित खरीद की पुष्टि की।
हालांकि, इस खबर का एक अहम पहलू यह है कि इसे अंतिम रक्षा अनुबंध समझना सही नहीं होगा। अमेरिकी प्रशासन पहले ही संभावित बिक्री को मंजूरी दे चुका है, लेकिन अंतिम खरीद, अनुबंध और आपूर्ति की प्रक्रिया अलग चरणों से गुजरती है। अमेरिकी रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी के रिकॉर्ड के मुताबिक, भारत के लिए प्रस्तावित सौदे की अनुमानित कीमत 45.7 मिलियन डॉलर रखी गई थी।
प्रस्तावित सौदे में क्या शामिल है
अमेरिकी दस्तावेज के मुताबिक भारत ने 100 एफजीएम-148 जैवलिन राउंड, 1 जैवलिन मिसाइल और 25 हल्के कमांड लॉन्च यूनिट या जैवलिन ब्लॉक 1 कमांड लॉन्च यूनिट खरीदने का अनुरोध किया था। इसके साथ प्रशिक्षण, सिमुलेशन राउंड, तकनीकी दस्तावेज, स्पेयर पार्ट्स, सिस्टम इंटीग्रेशन और लॉजिस्टिक सपोर्ट जैसी सुविधाएं भी प्रस्तावित पैकेज का हिस्सा हैं।
यह संख्या बताती है कि मौजूदा प्रस्ताव का फोकस सीमित संख्या में सिस्टम हासिल करने के साथ प्रशिक्षण और संचालन क्षमता तैयार करने पर है। इसलिए इसे भारतीय सेना के पूरे एंटी-टैंक बेड़े के व्यापक प्रतिस्थापन के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
अमेरिकी दस्तावेज में प्रस्तावित बिक्री की कुल अनुमानित लागत 45.7 मिलियन डॉलर बताई गई है। इसमें मुख्य रक्षा उपकरण की अनुमानित कीमत 37.1 मिलियन डॉलर और अन्य उपकरण तथा सहायता से जुड़े खर्च 8.6 मिलियन डॉलर बताए गए हैं।
जैवलिन सिस्टम की खासियत क्या है
जैवलिन एक मध्यम दूरी की, कंधे से दागी जाने वाली, मानव-पोर्टेबल एंटी-टैंक प्रणाली है। अमेरिकी रक्षा दस्तावेज इसे फायर-एंड-फॉरगेट सिस्टम के रूप में वर्गीकृत करता है। इसका इस्तेमाल पैदल सैनिकों, स्काउट्स और कॉम्बैट इंजीनियरिंग यूनिट्स के लिए किया जा सकता है। इसे कुछ अन्य प्लेटफॉर्म पर भी लगाया जा सकता है।
अमेरिकी दस्तावेज के अनुसार सिस्टम का वजन लगभग 43.5 पाउंड है और इसकी अधिकतम मारक दूरी 4,500 मीटर से अधिक है। यह मुख्य युद्धक टैंकों समेत बख्तरबंद लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है।
जैवलिन की प्रमुख विशेषता इसका फायर-एंड-फॉरगेट सिद्धांत है। इसका मतलब है कि लक्ष्य पर मिसाइल दागने के बाद ऑपरेटर को लगातार लक्ष्य को निर्देशित करने की जरूरत नहीं रहती। यह क्षमता सैनिकों को फायरिंग के बाद अपनी स्थिति बदलने में मदद करती है।
अमेरिका ने 2025 में दी थी संभावित बिक्री को मंजूरी
भारत के जैवलिन सौदे की प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई है। अमेरिकी विदेश विभाग ने नवंबर 2025 में भारत के लिए जैवलिन सिस्टम की संभावित विदेशी सैन्य बिक्री को मंजूरी दी थी। उस समय अमेरिकी रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी ने अमेरिकी कांग्रेस को इसकी सूचना दी थी।
अमेरिकी एजेंसी के मुताबिक यह संभावित बिक्री भारत की सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़ी थी। दस्तावेज में यह भी कहा गया था कि प्रस्तावित बिक्री से क्षेत्रीय सैन्य संतुलन में बुनियादी बदलाव की आशंका नहीं है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। अमेरिकी प्रशासन की संभावित बिक्री की मंजूरी अंतिम खरीद अनुबंध के समान नहीं होती। इसके बाद कीमत, शर्तों, आपूर्ति, प्रशिक्षण और अन्य तकनीकी पहलुओं पर प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग का बड़ा संदर्भ
जैवलिन सौदा भारत और अमेरिका के व्यापक रक्षा सहयोग के बीच सामने आया है। दोनों देशों ने पिछले वर्षों में सैन्य परिवहन विमान, समुद्री निगरानी विमान, हेलीकॉप्टर, तोप और अन्य रक्षा प्रणालियों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है।
भारत सरकार और अमेरिकी नेतृत्व ने भी रक्षा बिक्री और सह-उत्पादन को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइलों और स्ट्राइकर पैदल सेना लड़ाकू वाहनों के लिए नई खरीद तथा भारत में सह-उत्पादन की संभावनाओं को आगे बढ़ाने की बात कही गई थी।
इससे साफ है कि दोनों देशों का रक्षा एजेंडा केवल तैयार हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है। इसमें उत्पादन, तकनीकी सहयोग और भारतीय रक्षा औद्योगिक क्षमता को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने का पहलू भी शामिल है।
भारत में उत्पादन की संभावना भी चर्चा में
जैवलिन को लेकर भारत में उत्पादन और सह-उत्पादन की संभावनाओं पर भी पहले से बातचीत होती रही है। लॉकहीड मार्टिन ने फरवरी 2025 में बताया था कि जैवलिन जॉइंट वेंचर भारत में इस प्रणाली की सह-असेंबली और सह-उत्पादन के अवसर तलाश रहा है।
कंपनी ने भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर की जानकारी भी दी थी। इसका उद्देश्य संभावित भारतीय साझेदारों के साथ दीर्घकालिक औद्योगिक सहयोग की संभावनाओं का आकलन करना था।
हालांकि, मौजूदा प्रस्ताव के संदर्भ में यह मान लेना सही नहीं होगा कि भारत में जैवलिन का बड़े पैमाने पर उत्पादन तय हो चुका है। अमेरिकी प्रस्तावित बिक्री दस्तावेज में किसी ऑफसेट समझौते को उस समय अंतिम रूप दिया हुआ नहीं बताया गया था।
स्वदेशी एंटी-टैंक सिस्टम के साथ समानांतर तैयारी
जैवलिन की प्रस्तावित खरीद ऐसे समय सामने आई है जब भारत अपने स्वदेशी एंटी-टैंक हथियार कार्यक्रम को भी आगे बढ़ा रहा है। भारत में विकसित मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल के परीक्षणों में भी प्रगति दर्ज की गई है।
जुलाई 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने लगभग 2,600 करोड़ रुपये की लागत से 2,300 स्वदेशी मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों, 100 लॉन्चरों और 5 सिमुलेटरों के प्रस्ताव को मंजूरी के शुरुआती चरण में रखा था। यह स्वीकृति खरीद प्रक्रिया का अंतिम अनुबंध नहीं थी।
इससे भारत की रक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। एक तरफ सेना की तत्काल परिचालन जरूरतों के लिए विदेशी प्रणालियों की खरीद जारी है, दूसरी तरफ स्वदेशी मिसाइल और रक्षा उत्पादन क्षमता को भी मजबूत किया जा रहा है।
जैवलिन खरीद भारत के लिए क्यों अहम है
भारतीय सेना के लिए एंटी-टैंक क्षमता का महत्व सीमावर्ती क्षेत्रों और संभावित बख्तरबंद संघर्ष की परिस्थितियों में बढ़ जाता है। आधुनिक युद्ध में टैंक और अन्य बख्तरबंद प्लेटफॉर्म अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जबकि उनके खिलाफ सटीक और पोर्टेबल हथियार पैदल सैनिकों को अतिरिक्त सामरिक क्षमता देते हैं।
जैवलिन जैसी प्रणाली का संभावित लाभ इसकी पोर्टेबिलिटी, लक्ष्य भेदने की क्षमता और फायर-एंड-फॉरगेट संचालन में है। इससे छोटी सैन्य टुकड़ियों को भी बख्तरबंद लक्ष्यों के खिलाफ स्वतंत्र एंटी-टैंक क्षमता मिलती है।
लेकिन किसी एक हथियार प्रणाली को भारतीय सुरक्षा जरूरतों का पूर्ण समाधान मानना सही नहीं होगा। एंटी-टैंक क्षमता में मिसाइलों के साथ निगरानी, लक्ष्य पहचान, कमांड नेटवर्क, प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स और स्वदेशी प्रणालियों का समन्वय भी जरूरी होता है।
आगे क्या होगा
अब सबसे अहम सवाल अंतिम अनुबंध और डिलीवरी से जुड़ा है। अमेरिकी प्रशासन की संभावित बिक्री मंजूरी पहले से मौजूद है, जबकि राजदूत सर्जियो गोर का ताजा बयान इस प्रक्रिया के आगे बढ़ने का संकेत देता है। फिर भी अंतिम कीमत, अनुबंध की शर्तें, आपूर्ति समयसीमा और भारत में संभावित औद्योगिक भागीदारी के बारे में सभी विवरण सार्वजनिक नहीं हैं।
भारत के लिए चुनौती संतुलन की भी है। उसे आधुनिक हथियारों की तत्काल जरूरत पूरी करनी है, साथ ही स्वदेशी रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाना है। जैवलिन की सीमित खरीद इस व्यापक रणनीति का एक हिस्सा हो सकती है।
निष्कर्ष
भारत-अमेरिका जैवलिन सौदा दोनों देशों के रक्षा सहयोग में एक अहम घटनाक्रम है। सर्जियो गोर की घोषणा ने प्रस्तावित खरीद को फिर से केंद्र में ला दिया है, जबकि अमेरिकी दस्तावेज पहले ही इसकी संभावित बिक्री, मात्रा और अनुमानित लागत का विवरण सार्वजनिक कर चुके हैं।
फिलहाल सबसे सटीक तस्वीर यही है कि भारत जैवलिन प्रणाली हासिल करने की प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अंतिम खरीद अनुबंध और आपूर्ति की पूरी रूपरेखा को लेकर अभी आधिकारिक विवरण सामने आना बाकी है। इस बीच स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल कार्यक्रम और अमेरिकी रक्षा सहयोग, दोनों भारत की सैन्य आधुनिकीकरण नीति के समानांतर हिस्से बने हुए हैं।