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दरोगा रिश्वतकांड: पुलिस चौकी में 2 लाख की रंगदारी ने खोली व्यवस्था की पोल

None 2025-11-01 20:26:02
दरोगा रिश्वतकांड: पुलिस चौकी में 2 लाख की रंगदारी ने खोली व्यवस्था की पोल

लखनऊ पुलिस में भ्रष्टाचार का खुलासा — रिश्वत लेता दरोगा रंगे हाथों पकड़ा गया

📍लखनऊ | 1 नवंबर 2025 | शाह टाइम्स लखनऊ ब्यूरो 

लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी पुलिस चौकी में तैनात दरोगा धनंजय सिंह को एंटी करप्शन टीम ने 2 लाख रुपए रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा। आरोप है कि रिश्वत उस आरोपी से ली जा रही थी जो एक गैंगरेप केस से अपना नाम हटवाना चाहता था। वीडियो वायरल होते ही पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में आ गया।

लखनऊ का ये मामला सिर्फ एक रिश्वत का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जड़ में बैठे उस रोग का संकेत है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं — भ्रष्टाचार

घटना का सिलसिला

बुधवार रात एंटी-करप्शन टीम ने पेपर मिल कॉलोनी पुलिस चौकी पर तैनात सब-इंस्पेक्टर धनंजय सिंह को रंगे हाथों पकड़ा। वीडियो में दिखा कि गैंगरेप केस का आरोपी प्रतीक गुप्ता 500-500 रुपए के नोटों की चार गड्डियाँ निकालकर मेज़ पर रखता है। दरोगा मुस्कुराते हुए आमिर नामक सहयोगी से कहता है — “फाइल में रख दो।”

प्रतीक नोटों की गड्डियाँ फाइल में रख देता है। उसी वक़्त एंटी-करप्शन टीम भीतर घुसती है और दरोगा को पकड़ लेती है। मौके से 2 लाख रुपए बरामद किए गए। नोटों के नंबर पहले से ट्रैप टीम ने दर्ज किए थे, और टेस्ट में साबित हुआ कि वही नोट थे।

गैंगरेप केस की पृष्ठभूमि

इस कहानी की जड़ एक साल पुरानी है। सितंबर 2025 में ब्रिटिश स्कूल ऑफ लैंग्वेज के संचालक प्रतीक गुप्ता और उनके सहयोगी रियाज़ पर गैंगरेप का मुकदमा दर्ज हुआ था। यह मुकदमा उनकी निजी सेक्रेटरी ने दर्ज कराया था, जिसने आरोप लगाया कि प्रतीक ने कॉफी में कुछ मिलाकर बेहोश किया और रियाज़ के साथ मिलकर दुष्कर्म किया।

एक साल तक चुप रहने के बाद पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दी। पुलिस ने प्रतीक को गिरफ्तार किया, लेकिन बाद में उन्हें ज़मानत मिल गई। प्रतीक ने पलटवार करते हुए कहा कि यह एक “फर्जी केस” है, जिसे नौकरी से निकाले जाने के बाद बदले की भावना से रचा गया।

https://youtube.com/shorts/IiKhTlv31Bg?si=BaUCYcWRe3Auvy_Q

रिश्वत का खेल कैसे शुरू हुआ

जेल से छूटने के बाद प्रतीक ने एंटी-करप्शन टीम से शिकायत की कि केस से नाम हटवाने के लिए दरोगा धनंजय सिंह उनसे 50 लाख रुपए मांग रहा है। मोलभाव के बाद रकम 10 लाख पर आने की कोशिश हुई, लेकिन दरोगा ने “पूरा इंतज़ाम होने” की बात कही।

प्रतीक ने कहा कि वह निर्दोष हैं और एक रुपया नहीं देंगे। फिर उन्होंने पूरी बात एंटी-करप्शन विभाग को बताई। टीम ने प्लान बनाया — 2 लाख रुपए मार्क किए गए नोट तैयार हुए और प्रतीक को दिए गए।

जैसे ही प्रतीक चौकी पहुँचे, दरोगा ने फाइल बढ़ाई और नोट उसमें रखवा लिए। टीम ने मौके पर ही उसे गिरफ्तार कर लिया।

टीम का ट्रैप ऑपरेशन

एंटी-करप्शन टीम ने पहले ही नोटों को रासायनिक पाउडर से चिह्नित किया था। दरोगा के हाथों का कलर टेस्ट होते ही गुलाबी निशान मिला, जिससे रिश्वत लेने का सबूत पक्का हो गया। मौके पर मौजूद दो सरकारी गवाहों ने पूरी कार्रवाई देखी।

दरोगा को अलीगंज थाने ले जाकर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया।

सवाल और सच्चाई

ये घटना सिर्फ एक व्यक्ति की करतूत नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जो “पैसे से न्याय खरीदने” पर यक़ीन करती है।
मैं इस घटना को सिर्फ “रिश्वत कांड” के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था के नैतिक पतन के रूप में देखता हूँ।

1. जनता का भरोसा कहाँ जाए?

जब पुलिस चौकी के भीतर ही पैसा फाइलों में छिपाया जाए, तो एक आम नागरिक कैसे भरोसा करे कि उसका केस ईमानदारी से जांचा जाएगा?

2. सिस्टम की निगरानी कौन करेगा?

अक्सर ये तर्क दिया जाता है कि “ऊपर से दबाव” होता है। लेकिन अगर हर स्तर पर जवाबदेही तय न की जाए, तो भ्रष्टाचार बस नीचे नहीं, ऊपर तक फैल जाता है।

3. क्या ये अकेला मामला है?

यह घटना अकेली नहीं है। देशभर में ऐसे ट्रैप ऑपरेशन हर महीने सामने आते हैं। सवाल ये है कि “कब तक पकड़ने की नौबत आएगी?” — क्यों न सिस्टम को ही ऐसा बनाया जाए कि कोई रिश्वत लेने की हिम्मत न करे।

कुछ लोग कह सकते हैं कि यह “इकलौता केस” है और इससे पूरी पुलिस पर उंगली नहीं उठाई जानी चाहिए। बात सही है — एक बुरा अधिकारी पूरे विभाग की मेहनत पर छाया नहीं डाल सकता।

लेकिन हमें यह भी मानना होगा कि ऐसे मामलों के बार-बार सामने आने से जनता का भरोसा डगमगाता है। समाधान सिर्फ सज़ा नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधार है — पारदर्शिता, रिकॉर्डिंग सिस्टम, और डिजिटल रिपोर्टिंग जैसी व्यवस्थाएँ अनिवार्य होनी चाहिएँ।

एंटी-करप्शन टीम ने दरोगा को पकड़कर सही संदेश दिया है — कि चाहे यूनिफ़ॉर्म कितनी भी मज़बूत क्यों न हो, अगर ईमानदारी कमज़ोर है तो कानून सब पर भारी पड़ेगा।

पर असली सुधार तब होगा जब रिश्वत माँगने से पहले ही डर पैदा हो — कानून का नहीं, अंतरात्मा का।

लखनऊ की यह घटना एक चेतावनी है — न्याय को फाइलों में नहीं, इंसाफ़ के इरादों में ज़िंदा रखना होगा।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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