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ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग तेज, देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

Mohammad Naved • 2026-09-29 10:54:01
ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग तेज, देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए। SIR और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में कार्रवाई और जांच की मांग वाली याचिका पहुंची है।


📍 नई दिल्ली
🗓️ 29 सितंबर 2026
✍️ MOHD NAVED

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ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग के बीच बढ़ा विवाद


मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। विवाद का केंद्र चुनावी मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision यानी SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था को लेकर उठे सवाल हैं।


इसी मुद्दे से जुड़ी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी हैं। इनमें कुछ याचिकाकर्ताओं ने SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों की न्यायिक जांच, विशेष जांच दल यानी SIT से जांच और संबंधित फैसलों की वैधता पर विचार करने की मांग की है।


हालांकि, इन याचिकाओं में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से साबित नहीं हुए हैं। इसलिए इन्हें आरोप और याचिकाकर्ताओं के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।


विवाद की मुख्य वजह क्या है


मामला मुख्य रूप से मतदाता सूची के Special Intensive Revision से जुड़ा है। चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार SIR का उद्देश्य पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना और अपात्र नामों को हटाना है। आयोग ने SIR के लिए संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया है।


आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर SIR 2026 से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध हैं। इसमें मतदाता सूची में नाम देखने, दस्तावेज जमा करने, Form 6 के जरिए पंजीकरण और अपील जैसी सुविधाएं शामिल हैं।


विवाद तब गहरा हुआ जब चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर सवाल सामने आए।


सुप्रीम कोर्ट में क्या मांग की गई


सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में अलग-अलग राहत मांगी गई है। एक याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग के साथ SIR से संबंधित फैसलों और दिशा-निर्देशों की वैधता पर सवाल उठाया गया है।


एक अन्य याचिका में ज्ञानेश कुमार को CEC पद से निलंबित करने और चुनाव आयोग के सामूहिक अधिकारों का इस्तेमाल एक व्यक्ति द्वारा किए जाने के दावे की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है। याचिका में अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कथित तौर पर दर्ज 14 आपत्तियों का भी उल्लेख किया गया है।


इन दावों की सत्यता और कानूनी स्थिति पर अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।


चुनाव आयोग का पक्ष क्या है


चुनाव आयोग ने SIR को वैधानिक प्रक्रिया बताया है। आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक इसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना है, ताकि पात्र मतदाता बाहर न रह जाएं और अपात्र नाम सूची में शामिल न रहें।


आयोग के रिकॉर्ड में ज्ञानेश कुमार को 19 फरवरी 2025 से भारत का 26वां मुख्य चुनाव आयुक्त बताया गया है। उनके साथ सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यरत हैं।


उपलब्ध रिपोर्टों में आयोग की ओर से यह कहा गया है कि SIR से जुड़े फैसले आयोग के स्तर पर लिए गए और प्रक्रिया में संस्थागत सहमति का पालन हुआ। वहीं याचिकाकर्ताओं ने कुछ फैसलों को लेकर असहमति और आपत्तियों का दावा किया है।


प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं


ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन मुख्य रूप से SIR प्रक्रिया, मतदाता सूची में संभावित बदलाव और चुनाव आयोग की पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक और नागरिक संगठनों की मांगों से जुड़े हैं।


देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शनकारियों ने CEC को हटाने और SIR प्रक्रिया को लेकर पुनर्विचार की मांग उठाई है। कुछ स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और हिरासत की खबरें भी सामने आई हैं।


इन प्रदर्शनों में लगाए जा रहे आरोपों को स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। फिलहाल उनका बड़ा हिस्सा राजनीतिक और कानूनी दावों के रूप में सामने आया है।


SIR को समझना क्यों जरूरी है


मतदाता सूची चुनावी प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है। किसी नागरिक का नाम सूची में होना उसके मतदान अधिकार के इस्तेमाल के लिए अहम है।


चुनाव आयोग के मुताबिक SIR का मकसद सूची को अपडेट करना और पात्र नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। आयोग के पोर्टल पर मतदाताओं को नाम खोजने, पंजीकरण करने और अपील दर्ज करने की सुविधा भी दी गई है।


यही वजह है कि SIR से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर मतदाताओं पर पड़ सकता है। विवाद की असल कसौटी यही होगी कि प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों, पारदर्शिता और प्रभावी शिकायत निवारण के मानकों के अनुरूप कितनी चलती है।


कितने नाम हटे, इस पर सावधानी क्यों जरूरी है


इस विवाद में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के दावे सामने आए हैं। अलग-अलग रिपोर्टों और याचिकाओं में अलग-अलग आंकड़ों का उल्लेख किया गया है।


इसलिए किसी एक संख्या को पूरे देश के अंतिम और प्रमाणित आंकड़े के रूप में पेश करना उचित नहीं है। चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और अंतिम मतदाता सूचियों से राज्यवार स्थिति अलग-अलग देखना जरूरी है।


उदाहरण के लिए आयोग ने बिहार की SIR प्रक्रिया के संबंध में 2025 में बताया था कि Draft List से लगभग 65 लाख नाम हटे थे और अंतिम सूची में करीब 7.42 करोड़ मतदाता दर्ज हुए थे। यह आंकड़ा बिहार की उस प्रक्रिया से संबंधित है और इसे 2026 की देशव्यापी स्थिति का आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।


विवाद का संवैधानिक पहलू


यह विवाद केवल किसी एक अधिकारी के पद पर बने रहने या हटने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में चुनाव आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली और संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या का सवाल भी है।


याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कुछ फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। दूसरी ओर चुनाव आयोग का पक्ष इससे अलग है और वह निर्णय प्रक्रिया को संस्थागत बताता है।


ऐसी स्थिति में अदालत के सामने मुख्य सवाल आरोपों की राजनीतिक व्याख्या नहीं, बल्कि संबंधित फैसलों की संवैधानिक और वैधानिक वैधता होगा।


आगे क्या होगा


अब इस मामले की अगली दिशा सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और अदालत के आदेशों से तय होगी।


साथ ही SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता अपने नाम और आवेदन की स्थिति की जांच कर सकते हैं। चुनाव आयोग के आधिकारिक पोर्टल पर मतदाता सूची देखने, आवेदन की स्थिति जांचने और अपील से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध हैं।


ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर राजनीतिक और नागरिक संगठनों का विरोध जारी रहने की स्थिति में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर सार्वजनिक बहस आगे बढ़ सकती है।




ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध और सुप्रीम कोर्ट में पहुंची याचिकाओं ने SIR प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक बहस का विषय बना दिया है।


एक तरफ चुनाव आयोग SIR को मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की वैधानिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। दूसरी तरफ याचिकाकर्ता और विरोध प्रदर्शन करने वाले संगठन निर्णय प्रक्रिया, पारदर्शिता और मतदाता नामों में बदलाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं।


फिलहाल इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इसलिए इस पूरे मामले में अदालत की कार्यवाही, आधिकारिक रिकॉर्ड और अंतिम मतदाता सूचियों को ही आगे की रिपोर्टिंग का प्रमुख आधार माना जाना चाहिए।

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Mohammad Naved

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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