अमेरिकी जवाब से संतुष्ट नहीं ईरान, बातचीत के भविष्य पर सवाल
ईरान-अमेरिका वार्ता में नया पेच, तेहरान को मंज़ूर नहीं वॉशिंगटन का जवाब
अमेरिका के जवाब में क्या कमी? ईरान की आपत्ति से कूटनीतिक चर्चा तेज़
ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के अपने प्रस्ताव पर अमेरिका के जवाब को अपर्याप्त बताया है। तेहरान का कहना है कि वॉशिंगटन ने उसकी 7 शर्तों में से कुछ स्वीकार की हैं, लेकिन कई अहम मुद्दों पर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। इससे युद्ध समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशों में नई रुकावट पैदा हुई है।
ईरान और अमेरिका | 12 अक्टूबर 2026
By Mohd Haris
ईरान ने अमेरिका के जवाब पर क्यों जताई नाराज़गी?
तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच ईरान और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर कूटनीतिक गतिरोध सामने आया है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रज़ाई ने 11 अक्टूबर को कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के प्रस्ताव पर अमेरिकी प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है।
रज़ाई के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के सामने 7 शर्तें रखी थीं। अमेरिकी पक्ष ने इनमें से कुछ को स्वीकार किया है, लेकिन बाकी मांगों पर उसका रुख़ स्पष्ट नहीं है।
ईरानी नेतृत्व ने संकेत दिया है कि जब तक लंबित मुद्दों पर स्थिति साफ़ नहीं होती, तब तक वह अमेरिका के साथ आगे की बातचीत में शामिल नहीं होगा।
यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि दोनों देशों के बीच विवाद केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। होर्मुज़ से होने वाली समुद्री आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति भी इस टकराव से प्रभावित हो रही है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने के लिए ईरान की 7 शर्तें
ईरान ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान एक प्रस्ताव पेश किया था। इसमें कहा गया था कि उसकी निर्धारित शर्तें पूरी होने पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य में 7 दिनों के भीतर सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल की जा सकती है।इस प्रस्ताव का मक़सद समुद्री व्यापार को बहाल करने के साथ क्षेत्रीय संघर्ष समाप्त करने की दिशा में समझौता तैयार करना था। ईरान की प्रमुख मांगों में संघर्ष समाप्त करने की व्यवस्था, अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी हटाना, प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में जमा ईरानी धन जारी करने जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
क़तर के ज़रिये अमेरिका और ईरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान
दोनों देशों के बीच सीधे संवाद के बजाय क़तर और अन्य मध्यस्थों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ईरान के प्रस्ताव पर अमेरिकी जवाब क़तरी मध्यस्थों के ज़रिये तेहरान तक पहुंचाया गया था।
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अब वॉशिंगटन को उन मुद्दों पर स्पष्टीकरण देना होगा, जिन पर अब तक स्पष्ट सहमति नहीं बन सकी है।
इससे संकेत मिलता है कि संवाद के रास्ते पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन औपचारिक बातचीत आगे बढ़ने के लिए दोनों पक्षों के बीच गंभीर मतभेद दूर करना ज़रूरी होगा।
मोहसिन रज़ाई का बयान, बातचीत से पहले शर्तें पूरी करने पर ज़ोर
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रज़ाई ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी जवाब में कुछ शर्तों पर सहमति दिखाई गई है, जबकि अन्य मुद्दे अनसुलझे हैं। रज़ाई ने यह भी कहा कि ईरान फिलहाल अमेरिकी पक्ष को आगे जवाब देने की प्रक्रिया में नहीं है। उनके अनुसार, जिन मुद्दों पर अस्पष्टता बनी हुई है, उन्हें स्पष्ट करने की ज़िम्मेदारी वॉशिंगटन की है।उन्होंने ईरान के उस रुख़ को दोहराया कि निर्धारित शर्तें पूरी होने तक अमेरिका के लिए होर्मुज़ का रास्ता खोलने या नई बातचीत शुरू करने पर सहमति नहीं दी जाएगी। इस बयान के समय व्हाइट हाउस की ओर से तत्काल आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
फरवरी से जारी संघर्ष और जून का अधूरा समझौता
ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा तनाव की पृष्ठभूमि फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए सैन्य संघर्ष से जुड़ी है।
उस समय अमेरिका और इज़राइल की ओर से ईरान पर हमलों के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा संकट गहरा गया था।
इसके बाद संघर्ष रोकने और समुद्री आवाजाही सामान्य बनाने के लिए कई कूटनीतिक प्रयास किए गए।
जून में दोनों पक्षों के बीच एक अंतरिम समझ संबंधी दस्तावेज़ पर सहमति बनी थी, लेकिन उसकी व्यवस्था कुछ ही दिनों में विफल हो गई।
सितंबर में ईरान ने नए प्रस्ताव के माध्यम से बातचीत दोबारा आगे बढ़ाने की कोशिश की। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रस्ताव को अस्वीकार करने की बात कही थी। अब अक्टूबर में सामने आई ईरानी प्रतिक्रिया बताती है कि मध्यस्थों के माध्यम से संपर्क जारी रहने के बावजूद दोनों पक्षों के बीच अंतिम समझौता नहीं हो पाया है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज़ जलडमरूमध्य फ़ारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जोड़ता है।
संघर्ष शुरू होने से पहले दुनिया के तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस के व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इस समुद्री रास्ते से गुजरता था।
इस मार्ग पर पाबंदियों या असुरक्षा का असर ऊर्जा आयात करने वाले देशों, जहाज़रानी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों पर पड़ता है।
भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए भी यह स्थिति अहम है। लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने से कच्चे तेल की लागत, माल ढुलाई और आयात संबंधी खर्चों पर दबाव बढ़ने का जोखिम रहता है। हालांकि, किसी विशेष दिन तेल की क़ीमत में बदलाव को केवल इस विवाद का नतीजा नहीं माना जा सकता। अंतरराष्ट्रीय मांग, उत्पादन और दूसरे आर्थिक कारण भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।
क्षेत्रीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर चेतावनी
मोहसिन रज़ाई ने एक अलग चेतावनी में कहा कि यदि सैन्य संघर्ष दोबारा तेज़ होता है, तो क्षेत्र के डेटा सेंटर और संचार केबल भी संभावित हमलों के दायरे में आ सकते हैं। ऐसे बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने से इंटरनेट सेवाओं, वित्तीय लेनदेन और क्षेत्रीय संचार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
इस बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि मौजूदा विवाद में ऊर्जा सुरक्षा के साथ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा भी चिंता का विषय बनी हुई है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।