अमेरिकी डॉलर 2025 की पहली छमाही में 10.8% गिरा। क्या अब डॉलर का वर्चस्व खत्म हो रहा है? जानिए भारत में रुपए के उभार और सोने की बढ़ती चमक का विश्लेषण।
अमेरिकी डॉलर दशकों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सौदों और ग्लोबल रिजर्व का सबसे मजबूत आधार रहा है। लेकिन 2025 की पहली छमाही में 10.8% की गिरावट के साथ, यह सवाल उठने लगा है कि क्या डॉलर की वैश्विक बादशाहत अब अंत की ओर बढ़ रही है? ब्लूमबर्ग डॉलर स्पॉट इंडेक्स में लगातार छठे महीने गिरावट और गोल्ड की बढ़ती हिस्सेदारी इस बदलाव के संकेत हैं।
1973 में ब्रेटन वुड्स सिस्टम समाप्त होने के बाद यह डॉलर का सबसे खराब प्रदर्शन माना जा रहा है। डॉलर इंडेक्स में 10.8% गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है। प्रमुख करेंसी जैसे स्विस फ्रैंक, यूरो, जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले अमेरिकी डॉलर में क्रमश: 14.4%, 13.4%, 10.5% और 9.6% की गिरावट दर्ज हुई है।
इस गिरावट के पीछे कई कारक हैं:
ग्लोबल रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी 2025 की दूसरी तिमाही में 23% तक पहुंच गई है—यह पिछले 30 वर्षों में सबसे ज्यादा है। चीन, तुर्की, पोलैंड और भारत जैसे देश अपने फॉरेन रिजर्व में डॉलर की बजाय सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। चीन ने लगातार सात महीने तक सोने की खरीदारी की है और अपने नागरिकों को भी इसमें निवेश को प्रोत्साहित कर रहा है।
👉 अमेरिकी डॉलर की ग्लोबल रिजर्व में हिस्सेदारी घटकर 44% रह गई है—1993 के बाद सबसे निचला स्तर।
जुलाई के पहले कारोबारी दिन रुपया डॉलर के मुकाबले 85.34 के उच्चतम स्तर तक पहुंचा, जो डॉलर की कमजोरी और रुपए की मजबूती का स्पष्ट संकेत है। अमेरिकी डॉलर की गिरती साख, फेडरल रिजर्व की कमजोर स्थिति और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी ने रुपए को बल दिया है।
📉 डॉलर की कमजोरी के मुख्य कारण:
📈 रुपया क्यों चमका?
डॉलर की गिरावट ने शेयर बाजार में भी सकारात्मक प्रभाव डाला है:
मिराए एसेट शेयरखान के रिसर्च एनालिस्ट अनुज चौधरी कहते हैं कि जोखिम लेने की वैश्विक प्रवृत्ति और डॉलर की गिरती विश्वसनीयता रुपए को आगे बढ़ा सकती है। डॉलर की यह गिरावट अस्थायी न होकर एक नई आर्थिक हकीकत की ओर इशारा कर सकती है, जिसमें ग्लोबल सेंट्रल बैंक डॉलर से अलग विकल्पों की तलाश में हैं।
हालांकि डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की धुरी है, लेकिन बदलते आर्थिक समीकरण, ट्रंप की नीतियां, और ग्लोबल सेंट्रल बैंकों की गोल्ड में दिलचस्पी इस व्यवस्था में दरार पैदा कर रही है। भारत जैसे देशों के लिए यह सुनहरा अवसर है कि वे अपनी करेंसी को मजबूत करें, वैश्विक व्यापार में भूमिका बढ़ाएं और डॉलर के प्रभुत्व से धीरे-धीरे आज़ादी की ओर बढ़ें।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।