अमेरिकी सियासत और वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बार फिर हलचल में हैं। अमेरिकी सदर डोनाल्ड ट्रंप ने भारत, चीन और यूरोपीय मुल्कों समेत 16 देशों के खिलाफ नई ट्रेड जांच शुरू करने का ऐलान किया है। यह जांच 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत होगी, जिसका मकसद कथित तौर पर “अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस” और अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता की पड़ताल करना बताया जा रहा है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ आर्थिक जांच है या फिर अमेरिका की नई भू-सियासी रणनीति? खासकर उस दौर में जब अमेरिका एक तरफ ईरान के साथ जंग जैसी हालत में है और दूसरी तरफ वैश्विक सप्लाई चेन पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है।
इस कदम से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नया तनाव पैदा हो सकता है, खासकर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए।
📍New Delhi ✍️ Shah Times
दुनिया की सियासत में अक्सर जंग और तिजारत साथ-साथ चलती हैं। कभी बंदूकें बोलती हैं तो कभी टैरिफ। इन दिनों अमेरिकी सियासत में दोनों एक साथ दिखाई दे रहे हैं।
एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और जंगी माहौल है, दूसरी तरफ अमेरिकी सदर डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया टैरिफ हमला तैयार कर लिया है। भारत, चीन और यूरोपीय इत्तिहाद समेत 16 देशों के खिलाफ व्यापार जांच शुरू करने का फैसला सिर्फ एक आर्थिक कदम नहीं है, बल्कि यह वैश्विक मआशियाती ताकत के खेल का हिस्सा भी माना जा रहा है।
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि कई देशों ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता जरूरत से ज्यादा बढ़ा ली है और इससे अमेरिकी इंडस्ट्री को नुकसान हो रहा है। मगर सवाल यह है कि क्या यह सचमुच मआशियाती हकीकत है या फिर घरेलू सियासी दबाव का नतीजा?
हाल ही में अमेरिकी अदालत ने ट्रंप के कुछ पुराने टैरिफ फैसलों को गैरकानूनी करार दिया था। यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका माना गया।
लेकिन ट्रंप की सियासी पहचान ही यह रही है कि वह मुश्किल हालात में भी नया रास्ता निकाल लेते हैं। अदालत से झटका मिलने के बाद अब उन्होंने ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत नई जांच शुरू करने की तैयारी कर ली है।
इस रणनीति का मतलब साफ है—अगर अदालत सीधे टैरिफ लगाने से रोकती है, तो पहले जांच कीजिए और फिर उसी के आधार पर नए टैरिफ लागू कीजिए।
यह एक तरह से कानून के दायरे में रहते हुए उसी लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश है।
नई जांच जिन देशों को घेर रही है उनमें भारत, चीन, यूरोपीय इत्तिहाद, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, ताइवान, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कनाडा जैसे बड़े व्यापारिक साझेदार को इस सूची से बाहर रखा गया है।
यह चयन खुद कई सवाल पैदा करता है। क्या यह सिर्फ व्यापारिक गणित है या फिर इसके पीछे सियासी रिश्तों का भी असर है?
अक्सर वैश्विक तिजारत में फैसले सिर्फ आर्थिक आधार पर नहीं होते, बल्कि सियासी मसलहत भी बड़ी भूमिका निभाती है।
भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती मआशियात में से एक है। पिछले कुछ सालों में भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता तेजी से बढ़ी है और कई सेक्टर में निर्यात भी मजबूत हुआ है।
अगर अमेरिका भारत के खिलाफ टैरिफ बढ़ाता है तो इसका असर कई उद्योगों पर पड़ सकता है।
उदाहरण के तौर पर स्टील, टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और फार्मा जैसे सेक्टर अमेरिकी बाजार पर काफी हद तक निर्भर हैं।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि भारत का घरेलू बाजार इतना बड़ा है कि वह पूरी तरह किसी एक देश पर निर्भर नहीं है।
यानी जोखिम जरूर है, लेकिन भारत के पास विकल्प भी मौजूद हैं।
ट्रंप की इस रणनीति को समझने के लिए चीन का जिक्र जरूरी है।
पिछले एक दशक से अमेरिका और चीन के बीच मआशियाती मुकाबला तेज होता जा रहा है। टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन—हर क्षेत्र में दोनों ताकतें एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही हैं।
टैरिफ इस जंग का सबसे आसान हथियार बन गया है।
ट्रंप प्रशासन पहले भी चीन पर भारी टैरिफ लगा चुका है और अब नई जांच उसी सिलसिले का अगला कदम माना जा रहा है।
अमेरिका में चुनावी सियासत हमेशा आर्थिक मुद्दों से जुड़ी रहती है।
जब किसी फैक्ट्री में काम बंद होता है या नौकरियां कम होती हैं, तो सियासी नेता अक्सर इसका दोष विदेशी आयात पर डालते हैं।
टैरिफ लगाना ऐसे वक्त में एक लोकप्रिय सियासी कदम बन जाता है।
ट्रंप की राजनीति भी काफी हद तक इसी तर्क पर टिकी रही है—“अमेरिकी नौकरियां बचाओ।”
लेकिन हकीकत यह भी है कि टैरिफ लगाने से कई बार अमेरिकी उपभोक्ताओं को महंगी कीमत चुकानी पड़ती है।
टैरिफ का मकसद घरेलू उद्योग को सुरक्षा देना होता है।
मगर आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में सप्लाई चेन इतनी जटिल हो चुकी है कि एक देश पर टैरिफ लगाने का असर कई देशों तक पहुंचता है।
उदाहरण के तौर पर अगर अमेरिका किसी देश से स्टील आयात पर टैरिफ बढ़ाता है तो अमेरिकी कंपनियों को महंगा स्टील खरीदना पड़ सकता है।
इसका असर अंततः कार, मशीनरी और कंस्ट्रक्शन की लागत पर पड़ता है।
यानी कभी-कभी जिस नीति का उद्देश्य घरेलू उद्योग को बचाना होता है, वही नीति उसे नुकसान भी पहुंचा सकती है।
अगर अमेरिका नए टैरिफ लागू करता है तो इसका असर सिर्फ कुछ देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
वैश्विक व्यापार पहले ही कई संकटों से गुजर रहा है—जंग, सप्लाई चेन की रुकावटें और ऊर्जा संकट।
ऐसे में टैरिफ जंग शुरू होने से विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं की भूमिका भी चुनौती में पड़ सकती है।
दुनिया पहले भी 1930 के दशक में टैरिफ युद्ध का नुकसान देख चुकी है, जब कई देशों ने संरक्षणवादी नीतियां अपनाईं और वैश्विक मंदी गहरी हो गई।
इतिहास यह बताता है कि व्यापार की दीवारें खड़ी करना आसान है, लेकिन उन्हें गिराना बहुत मुश्किल होता है।
ट्रंप प्रशासन की यह जांच गर्मियों तक पूरी होने की उम्मीद है।
अगर जांच में “अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस” साबित होती है तो नए टैरिफ लागू किए जा सकते हैं।
लेकिन यह भी संभव है कि कई देश कूटनीतिक बातचीत के जरिए समाधान तलाशें।
अक्सर व्यापारिक विवादों का अंत बातचीत की मेज पर ही होता है।
असल सवाल यह नहीं है कि अमेरिका टैरिफ लगाएगा या नहीं।
असल सवाल यह है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं सहयोग का रास्ता चुनेंगी या मुकाबले का।
अगर हर देश अपने उद्योग को बचाने के नाम पर दीवारें खड़ी करेगा तो वैश्विक मआशियात का पहिया धीमा पड़ सकता है।
लेकिन अगर प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग भी जारी रहा तो शायद यह संकट भी एक नए संतुलन की ओर ले जाएगा।
दुनिया की तिजारत हमेशा ताकत और मसलहत के बीच संतुलन ढूंढती रही है।
ट्रंप का नया टैरिफ अटैक उसी संतुलन की अगली परीक्षा है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।