दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में रिहायशी इलाकों पर व्हाइट फॉस्फोरस इस्तेमाल होने के इल्ज़ाम ने एक बार फिर जंग, इंसानी हकूक और इंटरनेशनल कानून के दरमियान चल रही बहस को तेज कर दिया है।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने तस्वीरों और जियो-लोकेशन के जरिए दावा किया है कि इज़राइली फौज ने 3 मार्च 2026 को ऐसे गोले इस्तेमाल किए जो हवा में फटकर आग बरसाते हैं। इनसे घरों में आग लगी और सिविल डिफेंस टीमों को कई जगह आग बुझानी पड़ी।
यह मामला सिर्फ एक हमला नहीं बल्कि जंग के तरीकों, इंसानी हिफाज़त और इंटरनेशनल कानून की कमजोरियों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
मिडिल ईस्ट की सियासत में जंग और तनाज़ा कोई नई बात नहीं है। लेकिन हर बार जब कोई नया इल्ज़ाम सामने आता है, तो दुनिया की नज़र फिर उसी सवाल पर टिक जाती है — क्या जंग में भी कुछ उसूल होने चाहिए?
दक्षिणी लेबनान के छोटे से शहर योहमोर में सामने आया यह मामला उसी बहस को दोबारा ज़िंदा कर रहा है। रिहायशी इलाकों के ऊपर हवा में फटने वाले व्हाइट फॉस्फोरस गोले सिर्फ एक मिलिट्री टैक्टिक नहीं बल्कि इंसानी हिफाज़त के लिहाज़ से बेहद खतरनाक माने जाते हैं।
ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि तस्वीरों और जियो-लोकेशन से यह साबित होता है कि ऐसे हथियार रिहायशी इलाके के ऊपर इस्तेमाल हुए।
अगर यह दावा सही साबित होता है तो सवाल सिर्फ एक फौजी ऑपरेशन का नहीं बल्कि जंग के उसूलों का बन जाता है।
व्हाइट फॉस्फोरस को अक्सर जंग के मैदान में धुआं पैदा करने, दुश्मन की पोज़ीशन छुपाने या निशान लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
लेकिन जब यही हथियार आबादी वाले इलाके में इस्तेमाल होता है तो इसकी सूरत बदल जाती है।
यह रासायनिक माद्दा हवा में फैलते ही जल उठता है और उसके जलते हुए टुकड़े जमीन पर गिरते हैं। यही वजह है कि घरों, खेतों और गाड़ियों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है।
मिसाल के तौर पर अगर किसी छोटे कस्बे में 200 मीटर के दायरे में यह हथियार गिरता है तो वहां मौजूद हर शख्स और हर इमारत खतरे में आ सकती है।
इसी वजह से इंटरनेशनल कानून आबादी वाले इलाकों में इसके इस्तेमाल को बेहद विवादित मानता है।
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक सोशल मीडिया पर सामने आई आठ तस्वीरों की जांच की गई।
इन तस्वीरों में हवा में फटते हुए गोले और नीचे जलते हुए मकान दिखाई देते हैं।
सिविल डिफेंस के कर्मचारी छतों पर लगी आग बुझाते नजर आते हैं। एक कार में भी आग लगी हुई दिखाई देती है।
इन तस्वीरों की जियो-लोकेशन से यह भी सामने आया कि सभी घटनाएं लगभग 160 मीटर के दायरे में हुईं।
इससे यह अंदेशा और मजबूत होता है कि हवा में फटने वाले गोले के जलते हुए टुकड़े आसपास फैल गए।
इज़राइली फौज की तरफ से पहले ही इलाके के लोगों को घर खाली करने की चेतावनी दी गई थी।
सुबह 5 बजकर 27 मिनट पर जारी बयान में लोगों से कहा गया कि वे गांव से कम से कम 1000 मीटर दूर चले जाएं।
यह दलील अक्सर मिलिट्री ऑपरेशन में दी जाती है कि पहले से चेतावनी देकर नागरिकों को नुकसान से बचाने की कोशिश की गई।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हर व्यक्ति इतनी जल्दी अपना घर छोड़ सकता है?
एक बूढ़ा किसान, एक बीमार शख्स या छोटे बच्चों वाला परिवार — क्या वे कुछ घंटों में अपना सब कुछ छोड़कर निकल सकते हैं?
यहीं से बहस और गहरी हो जाती है।
जंग में भी कुछ कानून होते हैं जिन्हें इंटरनेशनल ह्यूमैनिटेरियन लॉ कहा जाता है।
इनका मकसद यह होता है कि लड़ाई सिर्फ फौजों के बीच रहे और आम लोगों को कम से कम नुकसान हो।
लेकिन असल दुनिया में यह उसूल अक्सर टूटते नजर आते हैं।
सीरिया, गाज़ा, यूक्रेन और अब लेबनान — हर जगह जंग का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिक उठाते हैं।
मकान टूटते हैं, बाजार जलते हैं और लोग अपने ही शहरों से बेघर हो जाते हैं।
रिपोर्ट में एक और गंभीर पहलू सामने आता है — बड़े पैमाने पर लोगों को इलाका छोड़ने का आदेश।
अगर लाखों लोगों को अचानक अपना घर छोड़ना पड़े तो यह सिर्फ एक मिलिट्री मूव नहीं बल्कि एक बड़ा इंसानी संकट बन जाता है।
इतिहास गवाह है कि जब लोग एक बार अपने घरों से निकल जाते हैं तो उनका वापस लौटना आसान नहीं होता।
1948 का फिलिस्तीनी विस्थापन, सीरिया का गृह युद्ध और इराक के संघर्ष — हर जगह यही कहानी दोहराई गई।
आग लगाने वाले हथियारों को लेकर जो इंटरनेशनल नियम मौजूद हैं, वे भी कई मामलों में अधूरे माने जाते हैं।
कन्वेंशन ऑन कन्वेंशनल वेपन्स का प्रोटोकॉल तीन कुछ हथियारों को कवर करता है, लेकिन व्हाइट फॉस्फोरस जैसे मल्टी पर्पज़ हथियार कई बार इसकी सीमा से बाहर रह जाते हैं।
यानी कानून मौजूद है, लेकिन उसमें कई खामियां हैं।
इस वजह से कई मुल्क और ह्यूमन राइट्स संगठन लंबे समय से इन नियमों को मजबूत करने की मांग करते रहे हैं।
यह भी हकीकत है कि जंग सिर्फ मैदान में नहीं बल्कि सियासत के गलियारों में भी लड़ी जाती है।
इज़राइल के पीछे अमेरिका और कई पश्चिमी देशों का मजबूत समर्थन है।
वहीं लेबनान में हिज़्बुल्लाह को क्षेत्रीय ताकतों का सहारा मिलता है।
ऐसे में किसी भी आरोप की जांच सिर्फ कानूनी मामला नहीं बल्कि एक जटिल सियासी मसला बन जाता है।
हर जंग में सबसे ज्यादा नुकसान उस इंसान को होता है जो किसी फौज का हिस्सा नहीं होता।
एक दुकानदार जिसकी दुकान जल गई।
एक बच्चा जिसने अपना घर खो दिया।
एक परिवार जिसे रातोंरात अपना शहर छोड़ना पड़ा।
जंग के नक्शों में ये लोग सिर्फ आंकड़े बन जाते हैं।
लेकिन असल जिंदगी में यही लोग सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।
योहमोर की घटना चाहे जो भी नतीजा लेकर आए, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जंग में इंसानियत की जगह कितनी बची है।
अगर इंटरनेशनल कानून मजबूत नहीं होगा, अगर हथियारों के इस्तेमाल पर साफ और सख्त नियम नहीं होंगे, तो ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आती रहेंगी।
और हर बार बहस वही होगी — क्या जंग जीतने के लिए इंसानियत हारनी जरूरी है?
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।