उदयपुर फाइल्स फिल्म पर विवाद गहराया, जमीयत उलमा-ए-हिंद ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर फिल्म पर प्रतिबंध की मांग की।
📰 शाह टाइम्स ब्यूरो | नई दिल्ली
"उदयपुर फाइल्स" नामक फिल्म को लेकर देश में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। फिल्म का ट्रेलर सामने आते ही इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है। इसमें पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ और उनकी पवित्र पत्नियों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैं, जिससे देश की सांप्रदायिक सौहार्द और अमन-शांति को गंभीर रूप से खतरा पहुँच सकता है।
इस मुद्दे को लेकर जमीयत उलमा-ए-हिंद ने दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात हाईकोर्टों में याचिका दाखिल कर दी है, जिसमें फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने की माँग की गई है।
फिल्म "उदयपुर फाइल्स" का 2 मिनट 53 सेकंड का ट्रेलर हाल ही में यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफार्मों पर जारी किया गया, जिसमें कई विवादास्पद संवाद और दृश्य शामिल हैं। खासकर नूपुर शर्मा के उस बयान को दोहराया गया है जिसे लेकर 2022 में देशभर में सांप्रदायिक तनाव फैल गया था।
ट्रेलर में देवबंद को कट्टरवाद का अड्डा बताते हुए वहाँ के उलेमा पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यही नहीं, ज्ञानवापी मस्जिद जैसे मामलों को भी फिल्म में दिखाया गया है, जो वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन हैं।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हजरत मौलाना अरशद मदनी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि:
“यह फिल्म एक साज़िश के तहत बनाई गई है, जिसका उद्देश्य एक विशेष धार्मिक समुदाय को बदनाम करना और देश के बहुसंख्यकों में उसके प्रति ज़हर भरना है।”
उन्होंने फिल्म को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग का उदाहरण बताया और सेंसर बोर्ड को इस फिल्म को पास करने के लिए कठघरे में खड़ा किया।
मौलाना मदनी ने इस फिल्म के खिलाफ दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात हाईकोर्टों में याचिका दाखिल की है। यह याचिका संविधान की धारा 226 के तहत दाखिल की गई है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील फ़ुजैल अय्यूबी ने तैयार किया है।
याचिका में निम्नलिखित पक्षकार बनाए गए हैं:
याचिका में कहा गया है कि फिल्म भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (धार्मिक भेदभाव से मुक्ति) और अनुच्छेद 21 (जीवन जीने के अधिकार) का उल्लंघन करती है।
मौलाना मदनी ने सेंसर बोर्ड पर सीधा आरोप लगाया कि उसने सिनेमैटोग्राफ एक्ट 1952 की धारा 5B और 1991 के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा:
“बोर्ड ने न केवल अपने कर्तव्यों की अनदेखी की है, बल्कि वह अब एक सांप्रदायिक एजेंडे का हिस्सा बनता दिख रहा है।”
इस तरह की फिल्मों से:
मौलाना मदनी ने चेतावनी दी कि अगर इस फिल्म को रोका नहीं गया तो इसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं।
फिल्म को 11 जुलाई, शुक्रवार को रिलीज़ किया जाना है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालतें इस पर क्या रुख अपनाती हैं। क्या रिलीज़ से पहले कोर्ट इस पर रोक लगाएगी या फिर यह फिल्म देश में एक और सांप्रदायिक तनाव का कारण बनेगी?
भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है। यहाँ सभी धर्मों, समुदायों और पंथों को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है। हालांकि संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, परंतु यह स्वतंत्रता अन्य की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का अधिकार नहीं देती।
"उदयपुर फाइल्स" एक ऐसी फिल्म बन गई है जो न सिर्फ धार्मिक भावनाओं को आहत कर रही है, बल्कि देश की एकता, अखंडता और सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर कर सकती है। जब लोकतंत्र खतरे में हो, तब न्यायपालिका की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।