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जापान ने पेश किए आलू-स्टार्च से बने घुलनशील शॉपिंग बैग

None 2026-02-16 07:54:45
जापान ने पेश किए आलू-स्टार्च से बने घुलनशील शॉपिंग बैग

प्लास्टिक कचरे पर नया विकल्प: पानी में घुलने वाले बैग

समुद्री प्रदूषण के खिलाफ जापान का नया शॉपिंग बैग


जापान ने आलू के स्टार्च से बने ऐसे शॉपिंग बैग विकसित किए हैं जो पानी में पूरी तरह घुल जाते हैं।
इन बैग्स से प्लास्टिक कचरे और समुद्री प्रदूषण को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।


आलू-स्टार्च से बने नए शॉपिंग बैग पानी में घुल जाते हैं और कोई प्लास्टिक अवशेष नहीं छोड़ते। यह पहल समुद्री जीवन की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित है।

📍Tokyo  ✍️ Asif Khan

नई सामग्री से बना शॉपिंग बैग

ने एक नए प्रकार का शॉपिंग बैग विकसित किया है, जो दिखने में आम प्लास्टिक बैग जैसा है लेकिन व्यवहार में पूरी तरह अलग है। यह बैग आलू से निकाले गए स्टार्च से तैयार किया गया है। जब यह बैग पानी के संपर्क में आता है, तो यह पूरी तरह घुल जाता है और कोई ठोस कचरा नहीं छोड़ता।

यह तरक्की ऐसे समय में सामने आई है जब प्लास्टिक प्रदूषण एक वैश्विक चुनौती बना हुआ है। पारंपरिक प्लास्टिक बैग सैकड़ों साल तक वातावरण में बने रहते हैं और धीरे-धीरे छोटे कणों में टूट जाते हैं। इसके उलट, आलू-स्टार्च से बने बैग प्राकृतिक रूप से खत्म हो जाते हैं।

पानी में घुलने की प्रक्रिया

इन बैग्स का मुख्य गुण यह है कि यह पानी में घुलनशील हैं। स्टार्च एक प्राकृतिक पदार्थ है, जो पौधों में ऊर्जा के भंडारण के लिए मौजूद होता है। सही प्रक्रिया से इसे ऐसी सामग्री में बदला जाता है, जो रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए मजबूत होती है।

जब बैग पूरी तरह पानी में डूबता है, तो यह धीरे-धीरे घुल जाता है। इस प्रक्रिया में कोई ज़हरीला पदार्थ या ठोस अवशेष नहीं बचता। यही वजह है कि इन्हें मछलियों और अन्य समुद्री जीवों के लिए सुरक्षित माना जा रहा है।

प्लास्टिक बैग से होने वाला नुकसान

प्लास्टिक बैग समुद्री प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत माने जाते हैं। यह हल्के होते हैं और हवा या पानी के साथ दूर तक पहुंच जाते हैं। समुद्र में पहुंचने के बाद, यह कई सालों तक बने रहते हैं।

https://youtube.com/shorts/hjCvlYwaiJM?si=LZe9PIQUHLg8u90t

समुद्री जीव अक्सर प्लास्टिक को भोजन समझकर निगल लेते हैं। कछुए, मछलियां और पक्षी इससे प्रभावित होते हैं। कई मामलों में प्लास्टिक उनके पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है या उनकी मौत का कारण बनता है।

इसके अलावा, प्लास्टिक धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है। यह छोटे कण समुद्री भोजन के जरिए इंसानों तक भी पहुंच सकते हैं।

जैविक और नवीकरणीय विकल्प

आलू-स्टार्च बैग जैविक रूप से नष्ट होने वाले हैं। अगर यह जमीन में फेंके जाएं, तो भी मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव इन्हें तोड़ देते हैं। पानी में यह प्रक्रिया और तेज हो जाती है।

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कच्चे माल के रूप में आलू का इस्तेमाल इन्हें नवीकरणीय बनाता है। आलू की खेती दोबारा की जा सकती है, जबकि पारंपरिक प्लास्टिक सीमित जीवाश्म ईंधन पर निर्भर करता है।

रोजमर्रा के उपयोग के लिए डिजाइन

इन बैग्स को इस तरह तैयार किया गया है कि यह सामान्य खरीदारी के दौरान मजबूत बने रहें। हल्की बारिश या नमी से यह तुरंत नहीं घुलते। पूरा घुलना तभी होता है जब बैग लंबे समय तक पानी में रहे।

इसका मतलब है कि उपभोक्ताओं को अपने व्यवहार में कोई बड़ा बदलाव नहीं करना पड़ेगा। शॉपिंग का तरीका वही रहेगा, लेकिन पर्यावरण पर असर कम होगा।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम

जापान लंबे समय से पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों पर काम कर रहा है। यह पहल उसी दिशा में एक और कदम मानी जा रही है। उद्देश्य यह है कि रोजमर्रा के उत्पादों को ऐसा बनाया जाए, जिससे प्रदूषण अपने आप कम हो।

शॉपिंग बैग जैसे छोटे उत्पाद बड़े स्तर पर इस्तेमाल होते हैं। अगर ऐसे बैग लाखों लोगों तक पहुंचते हैं, तो प्लास्टिक कचरे में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

समुद्री जीवन के लिए सुरक्षा

इन बैग्स का सबसे बड़ा फायदा यह बताया जा रहा है कि यह समुद्री जीवन के लिए सुरक्षित हैं। पानी में घुलने के बाद यह किसी जीव को फंसाते या नुकसान नहीं पहुंचाते।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के समाधान समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपयोग के परिणामों का आकलन आगे किया जाएगा।

आगे की संभावनाएं

यह तकनीक भविष्य में अन्य उत्पादों के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है। पैकेजिंग, फूड रैप और अन्य डिस्पोजेबल वस्तुओं में स्टार्च आधारित सामग्री अपनाने की संभावना पर काम चल रहा है।

फिलहाल, यह शॉपिंग बैग प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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