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जौहर यूनिवर्सिटी पर बड़ा एक्शन, इमरान मसूद पहुंचे अदालत की दहलीज तक

Asif Khan • 2026-07-16 16:42:56
जौहर यूनिवर्सिटी पर बड़ा एक्शन, इमरान मसूद पहुंचे अदालत की दहलीज तक

जौहर यूनिवर्सिटी विवाद गहराया, शिक्षा बनाम कानून की बहस तेज


जौहर यूनिवर्सिटी पर ध्वस्तीकरण आदेश, इमरान मसूद ने कोर्ट से स्वतः संज्ञान की मांग



रामपुर विकास प्राधिकरण ने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों को बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्मित बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया है। इस कार्रवाई का कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने विरोध किया है और न्यायपालिका से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है। मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई, शिक्षा और कानून के संतुलन पर बहस का विषय बन गया है।



📍 Rampur, Uttar Pradesh

📰 July 16, 2026

✍️ Asif Khan


जौहर यूनिवर्सिटी ध्वस्तीकरण आदेश: कानून, शिक्षा और सियासत के बीच नई बहस



रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। रामपुर विकास प्राधिकरण ने विश्वविद्यालय परिसर के 40 में से 38 भवनों को बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्मित मानते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया है। प्रबंधन को 15 दिन का समय दिया गया है। यदि निर्धारित अवधि में कार्रवाई नहीं होती, तो प्रशासन स्वयं ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।

इस प्रशासनिक फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस कार्रवाई को छात्रों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बताते हुए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है।


क्या है पूरा मामला

रामपुर विकास प्राधिकरण के अनुसार विश्वविद्यालय परिसर में कुल 40 भवन बने हैं। प्रशासन का कहना है कि इनमें केवल दो भवनों के मानचित्र विधिवत स्वीकृत थे, जबकि शेष 38 भवन बिना अनुमोदन के बनाए गए। इसी आधार पर इन्हें अवैध निर्माण मानते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया।

प्रशासन ने विश्वविद्यालय प्रबंधन को स्वयं निर्माण हटाने के लिए 15 दिनों की मोहलत दी है। इसके बाद आवश्यकता पड़ने पर पुलिस बल की मौजूदगी में कार्रवाई की जा सकती है।


इमरान मसूद ने क्या कहा

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि यदि निर्माण संबंधी नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो कानून में कंपाउंडिंग जैसे वैकल्पिक उपाय भी उपलब्ध हैं। उनका कहना है कि किसी बड़े शैक्षणिक संस्थान को पूरी तरह ध्वस्त करना हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार को विश्वविद्यालय के संचालन पर आपत्ति है, तो वैधानिक तरीकों से उसका समाधान निकाला जा सकता है। उनके अनुसार इस मामले में न्यायपालिका को हस्तक्षेप कर छात्रों के हितों पर भी विचार करना चाहिए।

जौहर यूनिवर्सिटी विवाद का बैकग्राउंड

मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की पहल पर की गई थी। वर्षों के दौरान यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख निजी शैक्षणिक संस्थानों में शामिल रही। हालांकि, विश्वविद्यालय और उससे जुड़े ट्रस्ट पर समय-समय पर भूमि, निर्माण, प्रशासनिक अनुमतियों और अन्य कानूनी मामलों को लेकर कई जांच और मुकदमे भी दर्ज हुए। इन मामलों में अलग-अलग अदालतों और प्रशासनिक एजेंसियों के समक्ष कार्यवाही चलती रही है।

वर्तमान विवाद विश्वविद्यालय परिसर में बने भवनों की वैधता और निर्माण स्वीकृति से जुड़ा है। प्रशासन का कहना है कि अधिकांश भवन बिना स्वीकृत मानचित्र के बनाए गए, जबकि आलोचकों का तर्क है कि ध्वस्तीकरण अंतिम विकल्प होना चाहिए और अन्य कानूनी उपायों पर भी विचार किया जा सकता है।

प्रशासन का पक्ष

रामपुर विकास प्राधिकरण का कहना है कि विस्तृत जांच और सुनवाई के बाद यह निष्कर्ष निकला कि परिसर के 40 भवनों में से केवल दो के नक्शे स्वीकृत थे। इसी आधार पर 38 भवनों को अवैध निर्माण मानते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया।

प्रशासन ने यह भी कहा है कि विश्वविद्यालय प्रबंधन को 15 दिन का समय दिया गया है ताकि वह स्वयं आदेश का पालन कर सके। यदि ऐसा नहीं होता है तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

इसके समानांतर लोक निर्माण विभाग ने विश्वविद्यालय परिसर से गुजरने वाली सरकारी सड़क को भी आम जनता के लिए खोल दिया है। विभाग का कहना है कि यह सार्वजनिक मार्ग है और इसे लोगों के उपयोग के लिए बहाल किया गया है।

विरोध करने वालों की दलील

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि यह मामला केवल निर्माण नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे हजारों विद्यार्थियों की पढ़ाई और भविष्य प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा कि यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कानून में कंपाउंडिंग या अन्य वैधानिक विकल्प भी उपलब्ध हैं।

उनकी मांग है कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लेकर यह सुनिश्चित करे कि किसी भी कार्रवाई से छात्रों के हितों को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे।

कानूनी पहलू

भारतीय नगर नियोजन और विकास कानूनों के तहत बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्माण होने पर संबंधित प्राधिकरण को नोटिस जारी करने, सुनवाई करने और आवश्यकता पड़ने पर ध्वस्तीकरण का अधिकार प्राप्त हो सकता है। हालांकि, प्रत्येक मामला उसके तथ्यों, लागू कानूनों और न्यायिक आदेशों पर निर्भर करता है।

यदि विश्वविद्यालय प्रबंधन इस आदेश को चुनौती देता है, तो मामला न्यायालय में जा सकता है। ऐसी स्थिति में अंतिम निर्णय अदालत के आदेशों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।

छात्रों पर संभावित असर

विश्वविद्यालय में पढ़ रहे विद्यार्थियों के बीच इस कार्रवाई को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। प्रशासन ने कहा है कि छात्रों में घबराहट न फैले, इसके लिए सहायता शिविर लगाया गया है और शिक्षकों की मौजूदगी सुनिश्चित की गई है।

आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है और ध्वस्तीकरण आदेश पर कोई अंतरिम राहत मिलती है या नहीं।

सियासी असर

यह मामला उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नई बहस का कारण बन गया है। विपक्ष इसे शिक्षा और राजनीतिक प्रतिशोध के नज़रिए से देख रहा है, जबकि सरकार और प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई केवल नियमों और कानून के अनुपालन के आधार पर की जा रही है।

राजनीतिक दलों की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं के बीच मूल प्रश्न यही है कि क्या कानून का पालन और शैक्षणिक संस्थानों की निरंतरता—दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

क्या कहते हैं तथ्य

अब तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया जा चुका है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरी प्रक्रिया तत्काल पूरी हो जाएगी। प्रबंधन के पास कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं और न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना भी बनी हुई है।

इसलिए यह कहना कि विश्वविद्यालय का अस्तित्व समाप्त हो गया है, फिलहाल तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा। आने वाले दिनों में प्रशासनिक और न्यायिक घटनाक्रम इस मामले की दिशा तय करेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण 

जौहर यूनिवर्सिटी का मामला केवल एक संस्थान का विवाद नहीं, बल्कि कानून, शहरी नियोजन, शिक्षा और राजनीति के जटिल संतुलन की परीक्षा भी है। प्रशासन का दायित्व है कि वह नियमों का निष्पक्ष पालन करे, वहीं यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि छात्रों के हितों को अनावश्यक क्षति न पहुंचे।

आगे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी न्यायिक प्रक्रिया होगी। यदि अदालत में यह मामला पहुंचता है, तो वहीं तय होगा कि प्रशासनिक आदेश कानून की कसौटी पर कितना टिकता है और क्या किसी वैकल्पिक समाधान की गुंजाइश है।

वीडियो देखें

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Asif Khan

Asif Khan

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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