जेलेंस्की ने संयुक्त राष्ट्र में दावा किया कि रूस 47 देशों के नागरिकों को युद्ध में इस्तेमाल कर रहा है। भारत के अनुसार 227 नागरिक रूसी सेना में भर्ती हुए और 51 की मौत हुई।
न्यूयॉर्क | 24 सितंबर 2026
By Mohd Haris
संयुक्त राष्ट्र में जेलेंस्की का बड़ा दावा
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस की विदेशी नागरिकों की भर्ती का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि रूस भारत समेत 47 देशों के नागरिकों का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध में कर रहा है।
जेलेंस्की ने दावा किया कि इन देशों के कुछ नागरिक रूस में छल और अलग-अलग तरह के प्रलोभनों के जरिए पहुंचे और बाद में युद्ध के मैदान में भेजे गए। उन्होंने इन देशों की सरकारों से अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने की अपील की।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 47 देशों के नागरिकों को “छल-कपट से” भर्ती करने का आरोप जेलेंस्की का है। इसे रूस की ओर से स्वीकार किए गए तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
भारत का नाम लेकर क्या बोले जेलेंस्की
जेलेंस्की ने अपने संबोधन में भारत का नाम उन देशों में शामिल किया जिनके नागरिकों के रूस की ओर से युद्ध में शामिल होने की बात उन्होंने कही।
उन्होंने घाना, नेपाल, ताजिकिस्तान, भारत, यमन, केन्या, जिम्बाब्वे, क्यूबा, बेलारूस, सूडान और दक्षिण अफ्रीका समेत कई देशों का उल्लेख किया।
जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन को अलग-अलग देशों के युद्धबंदियों के संबंध में उनके स्वदेश लौटने की मांग मिलती रहती है। उन्होंने कहा कि युद्ध के मैदान में गैर-रूसी नागरिकों की मौत भी हो रही है।
यूक्रेनी राष्ट्रपति ने इन देशों से अपील की कि वे अपने नागरिकों को रूस-यूक्रेन युद्ध में जाने से रोकें।
227 भारतीय रूसी सेना में भर्ती
भारत के लिए इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा 227 भारतीय नागरिकों से जुड़ा है।
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने सितंबर 2026 में बताया था कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार 227 भारतीय नागरिक रूसी सेना में भर्ती हुए थे। इनमें से 139 को रूसी सेना से मुक्त किया जा चुका है।
मिसरी ने यह भी बताया कि 51 भारतीय नागरिकों की युद्ध में मौत हो चुकी है। भारत सरकार रूस के साथ शेष भारतीय नागरिकों की रिहाई और स्वदेश वापसी के लिए संपर्क में है।
इस आंकड़े के आधार पर 227 भारतीयों में से 139 की रिहाई और 51 की मौत की जानकारी सामने आई है। शेष लोगों की स्थिति को लेकर भारत और रूस के बीच बातचीत जारी रहने की बात भारतीय पक्ष ने कही है।
भारतीय नागरिक रूस कैसे पहुंचे
भारतीय नागरिकों की रूसी सेना में भर्ती का मुद्दा पिछले कुछ समय से भारत-रूस संबंधों के बीच भी उठता रहा है।
भारतीय अधिकारियों के अनुसार कुछ भारतीय नागरिक रोजगार के अवसरों की तलाश में रूस पहुंचे थे। कई मामलों में परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके रिश्तेदारों को रूस में नौकरी का भरोसा देकर भेजा गया, लेकिन बाद में उन्हें सैन्य गतिविधियों से जुड़ी भूमिकाओं में डाल दिया गया।
हालांकि हर मामले की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। इसलिए सभी 227 भारतीयों के रूस पहुंचने या रूसी सेना में शामिल होने का एक ही तरीका बताना उपलब्ध आंकड़ों से समर्थित नहीं है।
भारत सरकार ने ऐसे मामलों में रूसी पक्ष के साथ लगातार संपर्क की बात कही है।
जेलेंस्की ने 47 देशों का मुद्दा क्यों उठाया
जेलेंस्की का यह बयान केवल भारत से संबंधित नहीं था। उनका मुख्य संदेश उन सभी देशों के लिए था जिनके नागरिक रूस की ओर से युद्ध में शामिल हैं।
यूक्रेनी राष्ट्रपति ने कहा कि रूस विदेशी नागरिकों का इस्तेमाल करके युद्ध को लंबा खींचने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने देशों से रूस की युद्ध क्षमता और वित्तीय स्रोतों पर दबाव बढ़ाने की अपील भी की।
जेलेंस्की ने विशेष रूप से व्यापार और रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था का मुद्दा उठाया। उनके अनुसार रूस को मिलने वाला विदेशी व्यापार से जुड़ा राजस्व युद्ध को जारी रखने की क्षमता बढ़ाता है।
यह जेलेंस्की की कूटनीतिक अपील है। रूस की अर्थव्यवस्था और विदेशी व्यापार को लेकर उनके दावों को उनके राजनीतिक पक्ष के संदर्भ में समझना जरूरी है।
उत्तर कोरिया का भी किया उल्लेख
जेलेंस्की ने संयुक्त राष्ट्र में विदेशी नागरिकों की भागीदारी के संदर्भ में उत्तर कोरिया का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि यूक्रेन ने उत्तर कोरियाई सैनिकों को युद्धबंदी के रूप में पकड़ा है। जेलेंस्की ने बताया कि दो उत्तर कोरियाई युद्धबंदियों को दक्षिण कोरिया भेजा गया।
उनका तर्क था कि रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अलग-अलग देशों के नागरिक भी इसमें शामिल हो रहे हैं।
भारत के लिए मामला संवेदनशील क्यों है
भारत ने रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में कूटनीति और संवाद के जरिए समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है। ऐसे में भारतीय नागरिकों का रूसी सेना में शामिल होना नई मानवीय और कूटनीतिक चुनौती पैदा करता है।
51 भारतीय नागरिकों की मौत का आंकड़ा इस मुद्दे को और गंभीर बनाता है।
भारत सरकार के सामने एक साथ दो प्राथमिकताएं हैं। पहली, रूसी सेना में मौजूद भारतीय नागरिकों की पहचान और सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना। दूसरी, ऐसे रास्तों को रोकना जिनके जरिए भारतीय नागरिक गलत जानकारी या संदिग्ध रोजगार प्रस्तावों के आधार पर युद्ध क्षेत्र तक पहुंच सकते हैं।
भारतीयों की वापसी पर क्या स्थिति है
भारत और रूस के बीच भारतीय नागरिकों की रिहाई और स्वदेश वापसी को लेकर बातचीत चलती रही है।
विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार 139 भारतीयों को रूसी सेना से मुक्त किया जा चुका है। भारत शेष भारतीय नागरिकों की रिहाई के लिए रूसी पक्ष के संपर्क में है।
इससे संकेत मिलता है कि भारतीय सरकार इस मामले को द्विपक्षीय स्तर पर उठा रही है। हालांकि शेष नागरिकों की संख्या और उनकी वर्तमान स्थिति पर सार्वजनिक जानकारी सीमित है।
रोजगार के नाम पर भर्ती का सवाल
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू विदेश में रोजगार के नाम पर युवाओं की भर्ती है।
भारतीय मीडिया में ऐसे मामलों की रिपोर्ट सामने आई हैं जिनमें परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके रिश्तेदारों को रूस में आकर्षक नौकरी का प्रस्ताव देकर बुलाया गया था। बाद में उन्हें रूसी सैन्य ढांचे से जुड़ी भूमिकाओं में भेजे जाने का दावा किया गया।
ऐसे मामलों में प्रत्येक व्यक्ति की भर्ती प्रक्रिया, अनुबंध और वास्तविक भूमिका की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
किसी भी व्यक्ति को केवल रूस जाने या रूसी सेना से जुड़े होने के आधार पर एक समान श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।
जेलेंस्की की रूस पर रणनीतिक अपील
संयुक्त राष्ट्र में जेलेंस्की ने विदेशी नागरिकों के मुद्दे को रूस की युद्ध क्षमता से जोड़ दिया।
उन्होंने देशों से रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और ऐसे व्यापार को सीमित करने की अपील की जिससे उनके अनुसार मॉस्को को युद्ध जारी रखने के लिए राजस्व मिलता है।
उन्होंने रूस के ऊर्जा क्षेत्र और सैन्य उत्पादन पर भी दबाव बनाए रखने की मांग की। जेलेंस्की के मुताबिक रूस की वित्तीय क्षमता को सीमित करना युद्ध को लंबा खींचने की उसकी क्षमता पर असर डाल सकता है।
ये यूक्रेनी राष्ट्रपति के नीति संबंधी तर्क हैं। अलग-अलग देशों की रूस के साथ व्यापार और कूटनीति को लेकर अपनी अलग नीतियां हैं।
भारत-रूस संबंधों पर असर
भारतीय नागरिकों की रूसी सेना में भर्ती का मामला भारत और रूस के संबंधों के लिए संवेदनशील है।
भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा और व्यापार के पुराने संबंध हैं। साथ ही भारत लगातार यूक्रेन युद्ध के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति की जरूरत पर जोर देता रहा है।
भारतीय नागरिकों की मौत और सैन्य सेवा में भर्ती का मामला इन संबंधों के बीच मानवीय चिंता का अलग आयाम जोड़ता है।
भारत के लिए प्राथमिक मुद्दा अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनकी वापसी है। इसी वजह से नई दिल्ली ने मॉस्को के साथ इस विषय पर लगातार बातचीत जारी रखी है।
अब आगे क्या होगा
आगे की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण सवाल रूसी सेना में मौजूद शेष भारतीय नागरिकों की पहचान और उनकी वापसी का है।
भारत को रूस से प्रत्येक भारतीय नागरिक की स्थिति, सेवा की प्रकृति और वापसी की प्रक्रिया को लेकर जानकारी प्राप्त करनी होगी।
दूसरी तरफ भारत को उन एजेंटों और भर्ती नेटवर्क के खिलाफ भी कार्रवाई की जरूरत होगी जिन पर विदेश में रोजगार के नाम पर भारतीयों को युद्ध से जुड़े काम में भेजने के आरोप लगते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस जांच और कानूनी कार्रवाई के तथ्य अलग-अलग मामलों के आधार पर सामने आएंगे।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र महासभा में वोलोदिमीर जेलेंस्की ने रूस पर 47 देशों के नागरिकों को यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और भारत समेत इन देशों से अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने की अपील की।
भारत के लिए इस बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 227 भारतीय नागरिकों से जुड़ा है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार इनमें से 139 को रूसी सेना से मुक्त किया जा चुका है और 51 भारतीयों की मौत हो चुकी है।
47 देशों के नागरिकों को छल-कपट से भर्ती करने का आरोप यूक्रेनी राष्ट्रपति का दावा है। वहीं भारतीय नागरिकों की भर्ती और मौत के आंकड़े भारतीय सरकार के आधिकारिक बयान से जुड़े हैं। दोनों को अलग-अलग स्रोत और संदर्भ में देखना जरूरी है।
अब भारत के सामने मुख्य चुनौती रूस में मौजूद शेष भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी और विदेश में रोजगार के नाम पर युद्ध से जुड़े भर्ती नेटवर्क को रोकने की है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।