मुजफ्फरनगर के कांबोज हॉस्पिटल में गॉलब्लैडर ऑपरेशन के बाद मरीज की बिगड़ती हालत को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। परिजनों ने चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाया है, जबकि अस्पताल प्रशासन का कहना है कि ऑपरेशन सफल रहा था और बाद में मरीज में कैंसर की पुष्टि हुई। मामला स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही और मरीजों के भरोसे से जुड़ा है।
Location:- Muzaffarnagar
Date:- 3 July 2026
Byline:- Shahana
ऑपरेशन में लापरवाही का आरोप, कांबोज हॉस्पिटल में हंगामा इलाज के बाद बढ़ा विवाद
मुजफ्फरनगर के जानसठ रोड स्थित संगम विहार के कांबोज हॉस्पिटल में शुक्रवार को उस समय तनावपूर्ण स्थिति बन गई जब एक मरीज के परिजनों और ग्रामीणों ने ऑपरेशन में कथित लापरवाही का आरोप लगाते हुए अस्पताल परिसर में हंगामा किया। सूचना मिलने पर नई मंडी कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। यह मामला केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा, चिकित्सकीय जवाबदेही और स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता जैसे व्यापक सवाल भी सामने लाता है।
क्या है पूरा मामला
सहारनपुर जिले के देवबंद क्षेत्र के गांव अमरपुर गढ़ी निवासी प्रदीप को जनवरी में पेट में तेज दर्द की शिकायत हुई। स्थानीय चिकित्सक की सलाह पर अल्ट्रासाउंड कराया गया, जिसमें गॉलब्लैडर में पथरी की पुष्टि हुई। इसके बाद परिवार इलाज के लिए मुजफ्फरनगर स्थित कांबोज हॉस्पिटल पहुंचा। परिजनों के अनुसार अस्पताल में दोबारा जांच के बाद लेप्रोस्कोपिक ऑपरेशन की सलाह दी गई। 15 जनवरी को ऑपरेशन किया गया। परिवार का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद भी मरीज का दर्द समाप्त नहीं हुआ, बल्कि लगातार बढ़ता गया। बाद में पेट में एक गांठ भी दिखाई देने लगी।
परिजनों ने क्या आरोप लगाए
मरीज की पत्नी संजो का कहना है कि ऑपरेशन के बाद करीब डेढ़ महीने तक मरीज अस्पताल में भर्ती रहा, लेकिन स्वास्थ्य में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। इसके बाद अस्पताल ने मरीज को बेहतर इलाज के लिए एम्स ऋषिकेश रेफर कर दिया। परिजनों का दावा है कि एम्स में जांच के दौरान उन्हें बताया गया कि मामला गंभीर हो चुका है। इसी आधार पर उन्होंने ऑपरेशन में लापरवाही का आरोप लगाया। उनका यह भी आरोप है कि शिकायत लेकर दोबारा अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर और अस्पताल स्टाफ ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया।
इन्हीं आरोपों के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने अस्पताल में विरोध प्रदर्शन किया। अस्पताल प्रशासन का पक्ष
कांबोज हॉस्पिटल के चिकित्सक डॉ. पी.के. कांबोज ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि गॉलब्लैडर का ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा था और पित्त की थैली सही तरीके से निकाल दी गई थी। डॉक्टर के अनुसार मरीज की लगातार तकलीफ को देखते हुए उसे उच्च स्तरीय उपचार के लिए एम्स ऋषिकेश भेजा गया। उनका दावा है कि वहां की रिपोर्ट में भी गॉलब्लैडर निकला हुआ पाया गया। साथ ही मरीज के पेट में जो गांठ मिली, वह कैंसर से संबंधित थी। डॉ. कांबोज का कहना है कि जब उनके अस्पताल में मरीज की जांच हुई थी, तब किसी भी रिपोर्ट में कैंसर के संकेत नहीं मिले थे। यदि उस समय कैंसर की पुष्टि होती तो ऑपरेशन की चिकित्सकीय रणनीति अलग होती।
दोनों पक्षों के दावों के बीच सवाल
वर्तमान स्थिति में मरीज का परिवार ऑपरेशन में चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगा रहा है, जबकि अस्पताल का कहना है कि मरीज की बाद की बीमारी कैंसर से जुड़ी है और उसका ऑपरेशन से सीधा संबंध नहीं है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या सक्षम मेडिकल बोर्ड ने सार्वजनिक रूप से यह पुष्टि नहीं की है कि ऑपरेशन में वास्तव में लापरवाही हुई थी। इसलिए दोनों पक्षों के दावे अभी आरोप और जवाब तक सीमित हैं।
चिकित्सकीय लापरवाही कैसे तय होती है
किसी भी चिकित्सकीय लापरवाही का निर्धारण केवल मरीज या अस्पताल के दावों से नहीं होता। इसके लिए मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन नोट्स, जांच रिपोर्ट, विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय और आवश्यकता पड़ने पर मेडिकल बोर्ड की जांच महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि किसी मामले में कानूनी शिकायत दर्ज होती है तो संबंधित स्वास्थ्य विभाग, पुलिस या न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करते हैं।
मरीजों के अधिकार और अस्पतालों की जिम्मेदारी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मरीज और उसके परिजनों को बीमारी, उपचार की प्रक्रिया, संभावित जोखिम और जटिलताओं की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। दूसरी ओर अस्पतालों की जिम्मेदारी है कि वे उपचार का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखें और किसी विवाद की स्थिति में पारदर्शी तरीके से तथ्य सामने रखें। ऐसे मामलों में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने के बजाय निष्पक्ष जांच सबसे महत्वपूर्ण होती है ताकि मरीज और चिकित्सक, दोनों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।
पुलिस की भूमिका
हंगामे की सूचना मिलने पर नई मंडी कोतवाली पुलिस अस्पताल पहुंची और स्थिति को सामान्य कराया। समाचार लिखे जाने तक किसी आधिकारिक एफआईआर या मेडिकल जांच समिति के गठन की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। यदि किसी पक्ष की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज कराई जाती है तो आगे की कानूनी प्रक्रिया उसी आधार पर तय होगी।
आगे क्या
यह मामला अब दो अलग-अलग दावों के बीच खड़ा है। एक ओर मरीज का परिवार ऑपरेशन में लापरवाही का आरोप लगा रहा है, जबकि दूसरी ओर अस्पताल कैंसर को मरीज की वर्तमान स्थिति का कारण बता रहा है। अंतिम निष्कर्ष किसी स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच, उपलब्ध मेडिकल दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आ सकेगा। जब तक आधिकारिक जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी भी पक्ष के दावों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, वैज्ञानिक साक्ष्य और निष्पक्ष जांच ही मरीजों के भरोसे और स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता को मजबूत कर सकती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।