केशव मौर्य ने 2027 के लिए BJP का जातीय समीकरण बताया
अखिलेश पर मौर्य का हमला, ‘त्रिवेणी’ को बनाया बड़ा मुद्दा
यूपी की सियासत में फिर उठा अगड़ा-पिछड़ा-दलित समीकरण
केशव प्रसाद मौर्य ने 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर BJP की रणनीति का संकेत दिया। उन्होंने अगड़ा, पिछड़ा और अनुसूचित वर्ग को पार्टी की ‘त्रिवेणी’ बताया। बयान में अखिलेश यादव पर सीधा सियासी हमला भी रहा। हालांकि 2024 के लोकसभा नतीजे बताते हैं कि यूपी में विपक्षी गठबंधन ने BJP को चुनौती दी।
दिनांक: 22 अगस्त 2026
By Mohd Naved
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरण एक बार फिर केंद्रीय मुद्दा बनता दिख रहा है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने जुलाई 2026 में ‘पंचायत आजतक’ के मंच से समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए BJP को अगड़ा, पिछड़ा और अनुसूचित वर्ग की ‘त्रिवेणी’ बताया। उन्होंने दावा किया कि यही सामाजिक समीकरण 2017 में BJP की जीत का आधार था और 2027 में पार्टी इससे भी बड़ी जीत दर्ज करेगी।
मौर्य का बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में BJP और समाजवादी पार्टी के बीच सामाजिक आधार को लेकर मुकाबला तेज है। एक तरफ BJP अपने ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक प्रतिनिधित्व के नैरेटिव को आगे बढ़ा रही है, वहीं समाजवादी पार्टी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के राजनीतिक समीकरण को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा मानती रही है।
केशव प्रसाद मौर्य ने ‘पंचायत आजतक’ में OBC नेतृत्व से जुड़े सवाल पर कहा कि पिछड़ा वर्ग सत्ता और सरकार में प्रतिनिधित्व पा रहा है। उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान का उल्लेख करते हुए कहा कि वह नौ साल से उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं।
मौर्य ने योगी आदित्यनाथ की मंत्रिपरिषद में पिछड़े और अनुसूचित वर्ग के मंत्रियों की मौजूदगी का हवाला देते हुए कहा कि इसे देखकर अखिलेश यादव परेशान होते हैं। इसके बाद उन्होंने BJP को अगड़ा वर्ग, पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित वर्ग की ‘त्रिवेणी’ बताया।
मौर्य ने 2027 में BJP की जीत का दावा भी किया। उनके मुताबिक पार्टी 2017 के प्रदर्शन से बड़ी जीत हासिल करेगी और समाजवादी पार्टी को 2017 के आंकड़े से भी नीचे धकेलने का प्रयास करेगी। यह राजनीतिक दावा है, चुनावी तथ्य नहीं। इसका फैसला आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजों से होगा।
‘अगड़ा-पिछड़ा-दलित’ का सामाजिक समीकरण केशव प्रसाद मौर्य की राजनीतिक बयानबाजी में नया नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने BJP को अगड़ा, पिछड़ा और दलित वर्ग की ‘त्रिवेणी’ बताया था। 2022 में इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि BJP के साथ इन तीनों सामाजिक समूहों का समर्थन है।
2022 में नवभारत टाइम्स और दूसरे मीडिया इंटरव्यू में भी मौर्य ने इसी सामाजिक गठजोड़ को BJP की ताकत के तौर पर पेश किया था। उस समय उनका तर्क था कि OBC नेताओं के पार्टी छोड़ने के बावजूद BJP का सामाजिक आधार कायम रहेगा।
इसलिए 2026 का बयान किसी नए राजनीतिक सिद्धांत की शुरुआत नहीं है। यह BJP की उस रणनीतिक भाषा की निरंतरता है जिसमें अगड़ी जातियों, OBC और दलित मतदाताओं को एक साझा चुनावी गठजोड़ के रूप में पेश किया जाता है।
उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति का महत्व लंबे समय से रहा है। समाजवादी पार्टी ने यादव और मुस्लिम सामाजिक आधार के साथ पिछड़े वर्गों की राजनीति को मजबूत किया। बहुजन समाज पार्टी ने दलित राजनीति को अपनी पहचान बनाया। BJP ने पिछले एक दशक में गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समूहों के बीच अपना आधार विस्तार करने पर खास जोर दिया।
केशव प्रसाद मौर्य इसी राजनीतिक रणनीति में महत्वपूर्ण OBC चेहरा रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में BJP ने उत्तर प्रदेश में 403 में से 312 सीटें जीती थीं। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों में 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP 255 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही, जबकि समाजवादी पार्टी को 111 सीटें मिलीं।
लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 ने तस्वीर को अधिक जटिल बना दिया। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। BJP को 33 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं, जबकि RLD और अपना दल ने NDA के हिस्से के तौर पर सीटें जीतीं।
यही वजह है कि 2027 की लड़ाई में केवल 2017 के सामाजिक समीकरण को दोहराने का दावा पर्याप्त नहीं माना जा सकता। 2024 के नतीजे बताते हैं कि विपक्ष ने BJP के सामाजिक आधार में सेंध लगाने की क्षमता दिखाई है।
केशव मौर्य का तर्क साफ है। उनके मुताबिक BJP का सामाजिक आधार केवल किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है। वह अगड़े, पिछड़े और अनुसूचित वर्ग को एक साझा राजनीतिक गठजोड़ के रूप में देखते हैं।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के OBC पृष्ठभूमि से आने को भी BJP की सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राजनीति से जोड़ा। जुलाई 2026 के बयान में उन्होंने अलग-अलग राज्यों में विभिन्न सामाजिक समूहों से आने वाले मुख्यमंत्रियों का उल्लेख करते हुए इसे व्यापक प्रतिनिधित्व के उदाहरण के रूप में पेश किया।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी की राजनीति का प्रमुख नैरेटिव पीडीए रहा है। 2026 में BJP के एक सम्मेलन में मौर्य ने सपा के पीडीए नारे पर तंज कसते हुए इसे ‘परिवार डेवलपमेंट एजेंसी’ कहा था और BJP को अगड़ों, पिछड़ों और दलितों का संगम बताया था।
इससे साफ है कि दोनों दल सामाजिक प्रतिनिधित्व की अलग-अलग व्याख्या के जरिए मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक दावे और चुनावी आंकड़े अलग चीजें हैं। BJP ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन किया। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार 2022 में BJP 255 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी।
लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका लगा। समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि BJP 33 सीटों पर रही। कांग्रेस को छह सीटें मिलीं।
इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। BJP का सामाजिक गठजोड़ मजबूत है, लेकिन उसे स्थायी और अटूट मानना चुनावी आंकड़ों से साबित नहीं होता। मतदाता व्यवहार चुनाव दर चुनाव बदल सकता है और स्थानीय उम्मीदवार, गठबंधन, सरकारी प्रदर्शन, महंगाई, रोजगार, सामाजिक मुद्दे और नेतृत्व जैसे कई कारक परिणाम प्रभावित करते हैं।
मौर्य का बयान 2027 के चुनावी नैरेटिव को समझने में अहम है। BJP के लिए चुनौती यह होगी कि वह 2024 में हुए नुकसान के बाद अपने सामाजिक गठजोड़ को किस तरह फिर से मजबूत करती है।
OBC राजनीति यहां सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा है। उत्तर प्रदेश में OBC समुदाय एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है। अलग-अलग जातियों के अपने सामाजिक और क्षेत्रीय हित हैं। इसलिए किसी भी दल के लिए पूरे OBC समुदाय को एक ही राजनीतिक इकाई मानना जोखिम भरा होगा।
दलित राजनीति भी निर्णायक रह सकती है। BSP के कमजोर प्रदर्शन के बाद दलित वोटों के भीतर नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश बढ़ी है। 2024 में BSP एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, जबकि उसका वोट शेयर 9.39 प्रतिशत रहा।
इस स्थिति में BJP, सपा और अन्य दलों के बीच दलित मतदाताओं को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ना स्वाभाविक है।
2027 का चुनाव केवल BJP बनाम सपा की सीधी लड़ाई नहीं होगा। यह सामाजिक गठबंधनों की विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगा।
BJP के सामने सवाल है कि क्या अगड़ा, पिछड़ा और दलित वर्ग का गठजोड़ एक बार फिर व्यापक चुनावी समर्थन में बदलता है। समाजवादी पार्टी के सामने सवाल है कि क्या पीडीए का राजनीतिक नैरेटिव 2024 जैसी बढ़त को विधानसभा चुनाव में भी दोहरा सकता है।
इसके साथ ही कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों की भूमिका भी सीटों के समीकरण को प्रभावित कर सकती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने मिलकर उत्तर प्रदेश में 43 सीटें जीती थीं।
जातीय प्रतिनिधित्व की बहस केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहती। इसका सीधा संबंध सरकारी नौकरियों, आरक्षण, शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों से है।
मतदाताओं के लिए असली कसौटी यह भी होगी कि राजनीतिक दल सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ रोजगार, शिक्षा, कानून-व्यवस्था, किसान आय, महंगाई और बुनियादी सेवाओं पर क्या ठोस कार्यक्रम रखते हैं।
सिर्फ जातीय समीकरण के आधार पर चुनावी समर्थन का अनुमान लगाना जमीनी हकीकत को अधूरा छोड़ सकता है।
इस बयान का सीधा अंतरराष्ट्रीय प्रभाव सीमित है। हालांकि उत्तर प्रदेश भारत की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है और लोकसभा में 80 सीटों के कारण राष्ट्रीय राजनीति में इसका महत्व असाधारण है।
2027 में उत्तर प्रदेश का चुनावी परिणाम केंद्र की राजनीति, राष्ट्रीय विपक्षी रणनीति और BJP के संगठनात्मक भविष्य पर असर डाल सकता है। इसलिए राज्य की सामाजिक राजनीति पर होने वाली हर बड़ी बहस राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बदला हुआ सामाजिक समर्थन 2027 के विधानसभा चुनाव में किस रूप में सामने आएगा।
क्या BJP 2017 और 2022 जैसा व्यापक सामाजिक गठजोड़ दोबारा बना पाएगी?
क्या समाजवादी पार्टी का पीडीए समीकरण विधानसभा स्तर पर भी प्रभावी रहेगा?
क्या गैर-यादव OBC और दलित मतदाता फिर से बड़ी संख्या में BJP के साथ जाएंगे?
क्या स्थानीय मुद्दे जातीय समीकरण से ऊपर निकलेंगे?
इन सवालों का जवाब अभी उपलब्ध नहीं है।
2027 के चुनाव से पहले BJP और समाजवादी पार्टी दोनों अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की कोशिश करेंगी। BJP के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद अपने संगठन और सामाजिक आधार की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी।
समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती यह होगी कि लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त को विधानसभा सीटों के व्यापक नेटवर्क में बदला जाए।
केशव प्रसाद मौर्य का बयान इसी लंबी चुनावी तैयारी का हिस्सा दिखाई देता है। इसमें संदेश साफ है कि BJP अपनी राजनीति को केवल हिंदुत्व या विकास के मुद्दे तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और जातीय गठजोड़ को भी चुनावी विमर्श के केंद्र में रख रही है।
केशव प्रसाद मौर्य का ‘अगड़ा-पिछड़ा-दलित त्रिवेणी’ वाला बयान BJP के 2027 चुनावी नैरेटिव की अहम झलक देता है। मगर इस दावे की राजनीतिक ताकत का फैसला बयान नहीं, मतदाता करेंगे।
2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव BJP के पक्ष में मजबूत आधार दिखाते हैं, जबकि 2024 का लोकसभा परिणाम बताता है कि उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरण बदलने की गुंजाइश बनी हुई है।
इसलिए 2027 की असली लड़ाई ‘त्रिवेणी’ बनाम ‘पीडीए’ के नारों से आगे जाएगी। जिस दल का सामाजिक गठजोड़ जमीनी संगठन, उम्मीदवारों, शासन के प्रदर्शन और स्थानीय मुद्दों के साथ बेहतर तालमेल बैठाएगा, उसे चुनावी बढ़त मिलने की संभावना मजबूत होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।