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फर्जी दस्तावेजों से हड़पी 60 करोड़ की जमीन, सुप्रीम कोर्ट ने दिया दखल

None 2023-07-13 13:05:30
फर्जी दस्तावेजों से हड़पी 60 करोड़ की जमीन, सुप्रीम कोर्ट ने दिया दखल

संगठित आपराधिक नेटवर्क अक्सर ऐसे घोटालों की योजना बनाते हैं और उन्हें अंजाम देते हैं, कमजोर व्यक्तियों और समुदायों का शोषण करते हैं और उन्हें अपनी संपत्ति खाली करने के लिए डराते-धमकाते हैं

दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुग्राम (Gurugram) के पुलिस कमिश्नर को एक जमीन घोटाले (land scam) की जांच के लिए डीएसपी के नेतृत्व में एसआईटी गठित (SIT constituted) करने का हुक्म दिया है। इल्ज़ाम है कि रजिस्टरी अफसरों की मिलीभगत से एक बुजुर्ग एनआरआई दंपति को धोखा दिया गया है। जमीन की कीमत 60 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है। जस्टिस सूर्यकांत (Justice Suryakant) की अगुवाई वाली पीठ ने बुजुर्ग एनआरआई दंपति प्रतिभा मनचंदा एवं उनके पति की गुरुग्राम के एक गांव में 60 करोड़ रुपये से अधिक की जमीन हड़पने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाने के मुलजिम शख़्स की अग्रिम जमानत रद्द कर दी।

अपीलकर्ताओं के मुताबिक, जमीन की पूर्व मूल बिक्री संबंधी कागजात अभी भी एनआरआई दंपति (NRI couple) प्रतिभा मनचंदा एवं उनके पति के कब्जे में थे। ऐसे में तथ्य यह है कि विक्रेता मूल रिकॉर्ड प्राप्त किए बिना इतनी बड़ी रकम का भुगतान करने के लिए सहमत कैसे हो गया? कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 31 मई के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उस शख्स को अग्रिम जमानत दी गई थी, जिस पर 1996 में एनआरआई जोड़े की जमीन हड़पने के लिए फर्जी जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) बनाने का इल्ज़ाम है। बेंच ने अपने हुक्म में कहा, ‘संगठित आपराधिक नेटवर्क अक्सर ऐसे घोटालों की योजना बनाते हैं और उन्हें अंजाम देते हैं, कमजोर व्यक्तियों और समुदायों का शोषण करते हैं और उन्हें अपनी संपत्ति खाली करने के लिए डराते-धमकाते हैं। इन भूमि घोटालों के परिणामस्वरूप न केवल व्यक्तियों और निवेशकों को वित्तीय नुकसान होता है, बल्कि विकास परियोजनाएं भी बाधित होती हैं, जनता का विश्वास खत्म होता है और सामाजिक-आर्थिक प्रगति में बाधा आती है।’

हुक्म में कहा गया है कि बिक्री दस्तावेज कथित तौर पर पैन नंबर का उल्लेख किए बिना या टीडीएस काटे बिना जारी किए गए जो इस लेनदेन की संदिग्ध प्रकृति को रेखांकित करता है। जमीन का यह मामला 1996 में उप रजिस्ट्रार, कालकाजी- नयी दिल्ली में पंजीकृत था। ऐसे में शीर्ष अदालत ने सिविल कोर्ट को कोई भी आदेश पारित करने से रोक दिया।तुरंत जांच शुरू करने का निर्देश देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, ‘एसआईटी को प्रतिवादी नंबर 2, विक्रेता (क्रेता), सब रजिस्ट्रार/अधिकारियों या अन्य संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की स्वतंत्रता होगी।’ इसमें कहा गया है कि मामले की दिन-प्रतिदिन की जांच की निगरानी के लिए गुरुग्राम पुलिस आयुक्त व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। कोर्ट ने दो माह के भीतर रिपोर्ट तलब की है।

गुरुग्राम में एक जमीन के मालिकों का इल्ज़ाम है कि उनकी जमीन को उप रजिस्ट्रार कादीपुर, गुरुग्राम के ऑफिस में फर्जी बिक्री डीड की बुनियाद पर किसी और के नाम पर दर्ज कर दिया गया है। इल्ज़ाम है कि 1996 में बनी नकली पावर पावर ऑफ अटॉर्नी की बुनियाद पर ही इसे दूसरे लोगों के नाम कर दिया गया। इल्ज़ाम है कि इस मामले में आरोपियों ने सब रजिस्ट्रार ऑफिस के अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए। मामले की शिकायत गुरुग्राम के बादशाहपुर थाने में दर्ज की गई थी।

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पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट (Punjab and Haryana High Court) ने फर्जी दस्तावेज बनाने के मुल्जिम को अग्रिम जमानत दे दी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। अब तक इस जमीन की मूल जीपीए भी नहीं मिली है।
शिकायतकर्ताओं ने पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि फर्जी दस्तावेज बनाना, करोड़ों की जमीन को हथियाना एक गंभीर समस्या है। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय में संतुलन बनाना जरूरी है।

अधिकारियों की भूमिका पर सवाल सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि जमीन की मूल जीपीए अब तक नहीं मिली है। यह जमीन कालकाजी में रजिस्टर है। जमीन भले ही गुरुग्राम में हो। राजस्व रिकॉर्ड में इस तरह की जमीन का स्वामित्व सरकार के पास ही रहता है और मूल भूमि के मालिकों को मुआवजा दिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने इस जमीन पर ना तो अधिकार जताया था और ना ही मूल मालिकों के मुआवजा प्राप्त करने पर आपत्ति की थी। इसके अलावा सेल डीड पर पैन नंबर भी नहीं डाला गया है और ना ही टीडीएस काटा गया है।
जमीन के मालिकों का दावा है कि इसकी कीमत 60 करोड़ रुपये से कम नहीं है। वहीं बिक्री मंत्र में इसका मूल्य 6.60 करोड़ रुपये ही दिखाया गया है। कोर्ट ने कहा है कि जमीन की कम कीमत आंकने में भी अधिकारियों की मिलीभगत हो सकती है और इसकी जांच जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि 1996 में जीपीए की सत्यापन प्रक्रिया भी संदिग्ध है। ऐसे में सब रजिस्ट्रार कार्यालय कालकाजी के अधिकारियों की जांज की जानी चाहिए।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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