मिडिल ईस्ट में बढ़ती जंग और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई बाधित होने के बाद भारत में एलपीजी संकट गहराने लगा है। कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं, जबकि होटल और रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई घटने से भारी नुकसान हो रहा है।
सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देते हुए रिफाइनरियों और सार्वजनिक ऊर्जा कंपनियों को गैस उत्पादन बढ़ाने का आदेश दिया है। लेकिन यह संकट सिर्फ कुछ दिनों की सप्लाई समस्या नहीं बल्कि भारत की ऊर्जा निर्भरता, वैश्विक राजनीति और घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।
दुनिया के नक्शे पर हजारों किलोमीटर दूर चल रही जंग का असर अगर किसी भारतीय परिवार की रसोई तक पहुंच जाए तो यह सिर्फ खबर नहीं बल्कि एक गहरी हकीकत बन जाती है।
मिडिल ईस्ट में भड़कते सैन्य टकराव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई बाधित होने के बाद भारत में एलपीजी संकट की तस्वीर धीरे-धीरे साफ दिखाई देने लगी है। कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें लग गई हैं।
यह दृश्य नया नहीं है, लेकिन पिछले दो दशकों में जब देश ने तेजी से एलपीजी को खाना बनाने का मुख्य जरिया बना लिया, तब ऐसी कतारें एक बड़े सिस्टम फेलियर का संकेत देती हैं।
भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन ऊर्जा के मामले में उसकी निर्भरता अभी भी बहुत अधिक है।
देश में हर साल लगभग 31 मिलियन टन एलपीजी की खपत होती है। इसमें से करीब 62 प्रतिशत हिस्सा आयात से आता है।
यानी अगर वैश्विक सप्लाई चेन में जरा-सी रुकावट आती है, तो उसका असर सीधे भारतीय बाजार में दिखाई देने लगता है।
यहां एक अहम पहलू यह भी है कि भारत अपने कुल तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है।
यानी ऊर्जा के मोर्चे पर भारत की आर्थिक मजबूती अभी भी बाहरी हालात पर काफी हद तक निर्भर है।
अगर वैश्विक ऊर्जा नक्शे को समझना हो तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री धमनियों में गिना जाता है।
यह संकरा समुद्री रास्ता खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और गैस के लिए मुख्य मार्ग है।
भारत के लिए यह रास्ता और भी ज्यादा अहम है क्योंकि देश की बड़ी मात्रा में गैस और तेल सप्लाई इसी रास्ते से होकर आती है।
जब इस मार्ग में तनाव या अवरोध पैदा होता है तो उसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहता बल्कि रसोई गैस, परिवहन और उद्योग तक फैल जाता है।
भारत की एलपीजी सप्लाई में खाड़ी देशों की भूमिका बेहद अहम है।
सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।
इसका कारण सिर्फ व्यापारिक रिश्ते नहीं बल्कि भौगोलिक दूरी भी है।
खाड़ी देशों से एलपीजी की खेप भारत तक पहुंचने में एक सप्ताह से भी कम समय लगता है।
इसके विपरीत अमेरिका से आने वाली गैस को यहां पहुंचने में लगभग 40 से 45 दिन लग जाते हैं।
यही वजह है कि संकट की घड़ी में वैकल्पिक सप्लाई तुरंत उपलब्ध कराना आसान नहीं होता।
जब गैस की किल्लत की खबर फैलती है तो सबसे पहले आम नागरिकों में घबराहट दिखाई देती है।
कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें लगने लगी हैं।
कुछ परिवार एक अतिरिक्त सिलेंडर लेने की कोशिश करते हैं, जिससे बाजार में अचानक मांग और बढ़ जाती है।
यह वही मनोविज्ञान है जो अक्सर किसी संकट के दौरान दिखाई देता है।
लेकिन यही घबराहट सप्लाई संकट को और गहरा भी कर देती है।
एलपीजी संकट का असर सिर्फ घरेलू रसोई तक सीमित नहीं है।
होटल और रेस्टोरेंट इंडस्ट्री पर इसका असर कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है।
कई शहरों में कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई कम होने से होटल मालिकों ने चिंता जताई है।
कुछ जगहों पर रेस्टोरेंट अस्थायी रूप से बंद होने की स्थिति में पहुंच गए हैं।
यह सिर्फ एक सेक्टर का संकट नहीं बल्कि रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा मामला है।
केंद्र सरकार ने इस संकट को देखते हुए कई त्वरित कदम उठाए हैं।
रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के निर्देश दिए गए हैं।
सार्वजनिक ऊर्जा कंपनियों को घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाने के आदेश दिए गए हैं।
इसके अलावा घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने के लिए सप्लाई का वर्गीकरण किया गया है।
यानी पहले घरेलू रसोई, उसके बाद उद्योग और कमर्शियल उपयोग।
सरकार का तर्क साफ है कि किसी भी संकट में आम नागरिकों की जरूरत पहले पूरी होनी चाहिए।
लेकिन यहां एक दूसरा पक्ष भी है।
अगर कमर्शियल सेक्टर को लंबे समय तक गैस नहीं मिलती तो होटल, ढाबे और छोटे कारोबार बंद होने लगेंगे।
इससे रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।
यानी नीति बनाते समय संतुलन बनाना भी उतना ही जरूरी है।
एलपीजी संकट हमें एक बड़े सवाल की तरफ भी ले जाता है।
क्या भारत की ऊर्जा रणनीति भविष्य के लिए पर्याप्त मजबूत है?
पिछले दो दशकों में देश ने करोड़ों परिवारों को एलपीजी से जोड़कर एक बड़ी सामाजिक उपलब्धि हासिल की है।
लेकिन इसके साथ-साथ आयात पर निर्भरता भी बढ़ी है।
अगर वैश्विक तनाव बढ़ते हैं तो ऐसी स्थिति बार-बार पैदा हो सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को तीन दिशाओं में काम करना होगा।
पहला, घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाना।
दूसरा, आयात के स्रोतों को विविध बनाना।
और तीसरा, वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों में निवेश करना।
बायोगैस, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक कुकिंग जैसे विकल्प भविष्य में ऐसी स्थितियों को कम कर सकते हैं।
किसी भी नीति या आंकड़े के पीछे एक साधारण परिवार की कहानी छिपी होती है।
जब गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिलता तो एक परिवार की पूरी दिनचर्या प्रभावित हो जाती है।
कई लोग वापस लकड़ी या कोयले जैसे पुराने तरीकों की तरफ जाने की बात करने लगते हैं।
यही वह क्षण होता है जब ऊर्जा नीति सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि समाज का भी मुद्दा बन जाती है।
एलपीजी संकट सिर्फ कुछ दिनों की आपूर्ति समस्या नहीं है।
यह हमें याद दिलाता है कि वैश्विक राजनीति, समुद्री मार्ग और घरेलू रसोई एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
भारत के लिए यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी।
अगर इस संकट से सही सबक लिया जाए तो भविष्य की ऊर्जा रणनीति अधिक मजबूत और संतुलित बन सकती है।
लेकिन अगर इसे सिर्फ एक अस्थायी व्यवधान समझकर नजरअंदाज कर दिया गया तो अगली बार कतारें और लंबी हो सकती हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।