ममता बनर्जी की विपक्षी एकता की कोशिशों पर दिलीप घोष ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बाद ममता अब दूसरे विपक्षी दलों से संपर्क कर रही हैं।
📍 कोलकाता
🗓️ 28 September 2026
✍️ MOHD NAVED
ममता की विपक्षी एकता पर दिलीप घोष का तंज
पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद सियासी समीकरण तेजी से बदले हैं। इसी माहौल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की पहल को लेकर भारतीय जनता पार्टी नेता दिलीप घोष ने तंज कसा है। घोष ने ममता बनर्जी के मौजूदा राजनीतिक संपर्कों और विपक्षी एकजुटता की कोशिशों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब उन्हें उन राजनीतिक दलों की जरूरत महसूस हो रही है, जिनसे उनके रिश्ते पहले टकराव वाले रहे हैं।
दिलीप घोष का बयान ऐसे समय आया है जब ममता बनर्जी ने INDIA ब्लॉक की बैठक बुलाने की पहल की है। प्रस्तावित बैठक 30 September को दिल्ली में होने की बात सामने आई है। इसमें चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों और मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर विपक्षी दलों की आगे की रणनीति पर चर्चा प्रस्तावित है।
दिलीप घोष ने क्या कहा
दिलीप घोष ने ममता बनर्जी की विपक्षी एकता की कोशिश पर कटाक्ष करते हुए कहा कि पहले जब दूसरे दल उनसे संपर्क करते थे, तब उन्होंने उन्हें महत्व नहीं दिया। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बाद वह खुद विपक्षी दलों से संपर्क कर रही हैं।
उनका सबसे चर्चित तंज था, “अब मजबूरी में महात्मा गांधी।” यह टिप्पणी उन्होंने ममता बनर्जी की मौजूदा विपक्षी लामबंदी को लेकर की। उनके बयान का संदर्भ यह था कि राजनीतिक परिस्थिति बदलने के बाद ममता अब व्यापक विपक्षी सहयोग की तरफ बढ़ रही हैं।
घोष ने यह भी दावा किया कि ममता बनर्जी के लिए अब राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका तलाशने की जरूरत पैदा हुई है। उन्होंने अपने बयान में पश्चिम बंगाल की विधानसभा राजनीति और तृणमूल कांग्रेस की मौजूदा स्थिति का भी उल्लेख किया। ये घोष के राजनीतिक आरोप और व्याख्या हैं, जिन्हें स्वतंत्र तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
ममता ने विपक्षी दलों से क्यों साधा संपर्क
ममता बनर्जी ने हालिया घटनाक्रम के बीच विपक्षी दलों के साथ समन्वय बढ़ाने की पहल की है। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से बातचीत की और विपक्षी दलों की बैठक बुलाने की जरूरत पर जोर दिया। CPI(M) महासचिव एम ए बेबी के साथ भी उनकी बातचीत हुई।
मामला मुख्य रूप से चुनाव आयोग और SIR से जुड़ा है। विपक्षी दलों के एक वर्ग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर आपत्तियां उठाई हैं और इस मुद्दे पर साझा राजनीतिक रणनीति की बात कही है। प्रस्तावित बैठक में इसी मुद्दे पर संयुक्त रुख तैयार करने की कोशिश की जा रही है।
INDIA ब्लॉक की प्रस्तावित बैठक
उपलब्ध जानकारी के अनुसार विपक्षी दलों की बैठक 30 September को दिल्ली के Constitution Club में प्रस्तावित है। ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के इसमें शामिल होने की संभावना बताई गई है। विपक्षी दल चुनाव आयोग और SIR से जुड़े मुद्दों पर साझा रणनीति पर विचार कर रहे हैं।
इस कवायद में एक अहम राजनीतिक बदलाव भी दिखाई दे रहा है। पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक एक-दूसरे के विरोधी रहे तृणमूल कांग्रेस और वाम दल इस मुद्दे पर एक-दूसरे के संपर्क में आए हैं। CPI(M) की ओर से विपक्षी दलों की संयुक्त बैठक की पहल की गई और ममता बनर्जी ने इसका समर्थन किया।
बंगाल चुनाव के बाद बदला राजनीतिक परिदृश्य
मई 2026 में घोषित पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया। निर्वाचन आयोग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने 207 सीटें जीतीं, जबकि AITC को 80 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने 2 और CPI(M) ने 1 सीट जीती।
निर्वाचन आयोग के परिणामों के अनुसार ममता बनर्जी खुद भवानीपुर सीट से चुनाव हार गईं। वहां भाजपा के सुवेंदु अधिकारी विजयी हुए।
इसी चुनावी बदलाव को दिलीप घोष अपने तंज के राजनीतिक संदर्भ के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि ममता बनर्जी और उनके खेमे ने चुनाव परिणाम और चुनावी प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग आपत्तियां उठाई हैं। इसलिए चुनावी नतीजों और उनके राजनीतिक अर्थ के बीच अंतर रखना जरूरी है। आधिकारिक परिणाम सीटों का तथ्य देते हैं, जबकि उनके व्यापक राजनीतिक अर्थ पर दलों की
अलग-अलग व्याख्या है।
गांधी का जिक्र क्यों महत्वपूर्ण है
दिलीप घोष के बयान में महात्मा गांधी का उल्लेख एक राजनीतिक मुहावरे और तंज के तौर पर आया है। इसे महात्मा गांधी के विचारों या विरासत पर कोई औपचारिक टिप्पणी मानना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक बयानबाजी में किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के नाम का इस्तेमाल अक्सर वर्तमान सियासी परिस्थितियों पर टिप्पणी के लिए किया जाता है। इस मामले में घोष का निशाना ममता बनर्जी की विपक्षी एकजुटता की पहल थी।
इसलिए बयान को उसके राजनीतिक संदर्भ में देखना जरूरी है। इसे गांधी के बारे में किसी प्रमाणित राजनीतिक या ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
ममता और वाम दलों के रिश्तों में नया अध्याय
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस और वाम दल लंबे समय से प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। इसलिए मौजूदा समय में दोनों पक्षों का किसी साझा राष्ट्रीय मुद्दे पर संवाद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
हालांकि अभी इसे स्थायी राजनीतिक गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध रिपोर्टों में बातचीत और संयुक्त रणनीति की कोशिश का उल्लेख है, लेकिन सीट बंटवारे या स्थायी चुनावी गठबंधन की कोई अंतिम घोषणा इस घटनाक्रम से स्थापित नहीं होती।
दिलीप घोष के बयान का राजनीतिक संदेश
दिलीप घोष का हमला दो स्तरों पर दिखाई देता है। पहला निशाना ममता बनर्जी की विपक्षी एकता की पहल है। दूसरा निशाना पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति है।
घोष ने अपने बयान में यह सवाल उठाया कि जब ममता बनर्जी को राष्ट्रीय विपक्ष के साथ समन्वय की जरूरत महसूस हो रही है, तो क्या वह अपने राज्य में भी राजनीतिक दलों के साथ वैसा ही समन्वय स्थापित कर पाएंगी। यह उनका राजनीतिक तर्क है, तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं।
दूसरी तरफ ममता बनर्जी की ओर से विपक्षी एकता की दलील को चुनाव आयोग और SIR से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में रखा गया है। उनके अनुसार विपक्षी दलों को साझा मुद्दों पर साथ बैठकर आगे की रणनीति तय करनी चाहिए।
आगे क्या होगा
30 September की प्रस्तावित विपक्षी बैठक इस पूरे घटनाक्रम का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है। बैठक में चुनाव आयोग, SIR और विपक्षी दलों की संयुक्त रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। बैठक के बाद संयुक्त बयान या साझा कार्यक्रम सामने आता है या नहीं, इससे इस पहल की दिशा ज्यादा स्पष्ट होगी।
पश्चिम बंगाल में इसका असर राज्य की राजनीति से आगे भी जा सकता है, लेकिन फिलहाल किसी स्थायी राष्ट्रीय गठबंधन या चुनावी समझौते का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। अभी उपलब्ध तथ्य विपक्षी दलों के बीच बढ़ते संवाद और समन्वय की कोशिश तक सीमित हैं।
ममता बनर्जी की विपक्षी एकता की पहल पर दिलीप घोष का बयान पश्चिम बंगाल के बदले हुए राजनीतिक समीकरणों को सामने लाता है। उनका “मजबूरी में महात्मा गांधी” वाला तंज एक राजनीतिक हमला है, जबकि ममता की पहल चुनाव आयोग और SIR जैसे मुद्दों पर विपक्षी समन्वय की कोशिश के रूप में सामने आई है।
2026 के विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में सत्ता समीकरण बदल चुके हैं। अब राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में ममता बनर्जी की भूमिका और विभिन्न विपक्षी दलों के बीच तालमेल आने वाले दिनों में प्रमुख राजनीतिक मुद्दा रहेगा। फिलहाल सबसे अहम तथ्य यह है कि बातचीत शुरू हो चुकी है, लेकिन इसके अंतिम राजनीतिक स्वरूप पर फैसला आगे के घटनाक्रम से होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।