मुजफ्फरनगर के पचेंडा में जयंत चौधरी ने सामाजिक समरसता सम्मेलन में जाति व्यवस्था, सामाजिक बराबरी और भाईचारे की बात कही। उन्होंने आंबेडकर व चौधरी चरण सिंह के विचारों का उल्लेख किया।
मुजफ्फरनगर में जयंत चौधरी का जाति व्यवस्था पर संदेश, बोले- भेदभाव नहीं, समानता और संवाद जरूरी
मुजफ्फरनगर। राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी ने रविवार को मुजफ्फरनगर के पचेंडा कलां में आयोजित सामाजिक समरसता सम्मेलन में जाति व्यवस्था, सामाजिक बराबरी, भाईचारे, किसान और नौजवानों से जुड़े मुद्दों पर बात की। उन्होंने अपने संबोधन में चौधरी चरण सिंह, डॉ. भीमराव आंबेडकर और संत रविदास के विचारों का उल्लेख करते हुए समाज में संवाद और आपसी सम्मान को जरूरी बताया। सम्मेलन २० सितंबर को पचेंडा रोड स्थित जनता इंटर कॉलेज के मैदान में आयोजित किया गया था।
सामाजिक समरसता का मतलब एक जैसा होना नहीं
जयंत चौधरी ने कहा कि सामाजिक समरसता का अर्थ यह नहीं है कि समाज के सभी लोग एक जैसे हो जाएं। खानपान, रहन-सहन और विचारों में अलग-अलग होना स्वाभाविक है, लेकिन इसके बावजूद एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सामाजिक संबंध मजबूत रहना जरूरी है।
उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग रंग और विचार मिलकर देश की पहचान बनाते हैं। उनके संबोधन में सामाजिक भेदभाव कम करने और विभिन्न वर्गों के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर रहा।रालोद की ओर से इस सम्मेलन को सामाजिक समरसता और विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संवाद बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित कार्यक्रम बताया गया था। कार्यक्रम में पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
आंबेडकर के विचारों का किया उल्लेख
जयंत चौधरी ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की चर्चित पुस्तक ‘जाति का विनाश’ का उल्लेख करते हुए जाति व्यवस्था पर उनके विचारों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर के विचारों को किसी एक रंग या पहचान तक सीमित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने तर्क दिया कि बाबा साहब के विचारों को किसी एक रंग से जोड़ना उचित नहीं है और भारत की विविधता में मौजूद सभी रंगों को उनके विचारों के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
जयंत चौधरी का यह वक्तव्य उनके सम्मेलन के उस व्यापक संदेश का हिस्सा था, जिसमें उन्होंने सामाजिक पहचान से ऊपर आपसी सम्मान, बराबरी और संवाद को रखने की बात कही।
चौधरी चरण सिंह की जाति व्यवस्था संबंधी सोच का जिक्र
अपने भाषण में जयंत चौधरी ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के विचारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक समय शिक्षण संस्थानों के नामों में जातिगत पहचान का इस्तेमाल होता था और चौधरी चरण सिंह ने संस्थानों के नामों से जातिगत पहचान हटाने की पहल की थी।
उन्होंने कार्यकर्ताओं के सामने सवाल रखा कि क्या आज किसी नेता में इतनी हिम्मत है कि वह अपनी ही जाति के नाम से जुड़े किसी संस्थान के नाम को हटाने की बात कह सके।
उन्होंने कहा कि सामाजिक संबंधों का आधार केवल जाति नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक पार्टी कार्यकर्ताओं को गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद करना चाहिए और समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच दूरी कम करने का प्रयास करना चाहिए।
‘मेरा और आपका संबंध जाति का संबंध नहीं’
जयंत चौधरी ने कार्यकर्ताओं से कहा कि लोगों से संपर्क केवल रिश्तेदारी या जातिगत पहचान के आधार पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि जनता और उनके बीच संबंध जाति का नहीं, बल्कि चौधरी चरण सिंह की विचारधारा का होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति से संबंध बनाने की कोशिश होती है तो अक्सर सबसे पहले उसकी जाति पूछी जाती है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से इस सोच से आगे बढ़कर समाज के सभी वर्गों के साथ संवाद स्थापित करने का आह्वान किया।
सपा नेता की कथित टिप्पणी पर उठाया सवाल
सम्मेलन में जयंत चौधरी ने विपक्ष के एक नेता की कथित टिप्पणी का भी जिक्र किया। उन्होंने सवाल उठाया कि किस समाज को ‘गिरा हुआ समाज’ कहा गया था और संबंधित नेता से इस बारे में स्पष्टीकरण देने की बात कही।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जयंत चौधरी ने सम्मेलन में इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि जिस समाज से चौधरी चरण सिंह और अहिल्याबाई होलकर जैसे व्यक्तित्व जुड़े रहे हैं, उसके बारे में इस तरह की टिप्पणी किए जाने पर स्पष्टीकरण होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके दल का कोई प्रदेश अध्यक्ष किसी समाज के लिए आपत्तिजनक टिप्पणी करता है तो वह उसके खिलाफ खड़े होंगे। जयंत चौधरी ने इसे व्यक्तिगत राजनीतिक विवाद के बजाय सामाजिक सम्मान से जुड़ा विषय बताया।
यहां संबंधित टिप्पणी के मूल संदर्भ और वक्ता के बारे में अलग-अलग राजनीतिक दावे हो सकते हैं। इसलिए जयंत चौधरी की ओर से लगाए गए आरोपों को उनके राजनीतिक वक्तव्य के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
https://youtu.be/Up7_IZ5JgAE?si=X7enqx-XuU5IumYt
किसान और नौजवानों के मुद्दे भी उठाए
जयंत चौधरी ने अपने संबोधन में किसानों और नौजवानों से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता दी। उन्होंने छोटे किसानों, सीमित भूमि वाले युवाओं और खेती से जुड़े ऐसे लोगों का उल्लेख किया जिनके पास जमीन का स्वामित्व नहीं है।
उन्होंने नौजवानों से व्यवस्था से सवाल करने का आह्वान किया। साथ ही किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलने और कृषि से जुड़े अधिकारों को लेकर सवाल उठाने की बात कही।
उन्होंने कहा कि आगामी चुनावी बहस में किसान और नौजवानों से जुड़े मुद्दे प्रमुख होने चाहिए। सम्मेलन के दौरान २०२७ के विधानसभा चुनाव को लेकर भी राजनीतिक चर्चा हुई।
गन्ने के मूल्य और भुगतान का मुद्दा
जयंत चौधरी ने गन्ना किसानों से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने गन्ने के भाव, चीनी मिलों की ओर से किसानों को किए जाने वाले भुगतान और इथेनॉल नीति का उल्लेख किया।
उन्होंने अपने संबोधन में अलग-अलग सत्रों के गन्ना मूल्य और भुगतान से जुड़े आंकड़ों का हवाला दिया तथा कहा कि इथेनॉल नीति से गन्ने की खरीद और किसानों के भुगतान को लाभ मिला है।
उन्होंने गुड़, कोल्हू-खानसारी इकाइयों और किसानों से सीधे खरीद करने वाले उद्योगों की भूमिका का भी उल्लेख किया। किसानों के संदर्भ में उन्होंने फसल की पर्ची को उनके अधिकार से जोड़ते हुए कहा कि कृषि से जुड़े मुद्दे राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता से होने चाहिए।
रविवार को हुए सम्मेलन की अन्य रिपोर्टों में भी गन्ने के मूल्य और किसान हित से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाए जाने का उल्लेख है।
गांव-गांव संवाद का दिया संदेश
जयंत चौधरी ने रालोद कार्यकर्ताओं से गांवों और बस्तियों में जाकर लोगों से संवाद करने की अपील की। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता केवल मंचों पर चर्चा का विषय नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर सामाजिक संबंधों में भी दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने कार्यकर्ताओं को भेदभाव की जगह समानता, दूरी की जगह संवाद तथा टकराव की जगह समन्वय और साझीदारी को प्राथमिकता देने का संदेश दिया।
२०२७ की राजनीति के बीच सम्मेलन
मुजफ्फरनगर में रालोद का यह सम्मेलन ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में २०२७ के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। पिछले दिनों रालोद की ओर से सम्मेलन को सामाजिक समरसता और विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी से जोड़कर प्रचारित किया गया था।
सम्मेलन में जयंत चौधरी के भाषण में सामाजिक बराबरी के साथ किसान, नौजवान, जाति और आगामी चुनाव से जुड़े मुद्दे सामने आए। उनके संबोधन में चौधरी चरण सिंह और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए सामाजिक संवाद और समानता को राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया।
निष्कर्ष
पचेंडा कलां में आयोजित रालोद के सामाजिक समरसता सम्मेलन में जयंत चौधरी ने जातिगत पहचान से ऊपर सामाजिक संवाद और बराबरी की बात रखी। उन्होंने आंबेडकर और चौधरी चरण सिंह के विचारों का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं से समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संपर्क बढ़ाने का संदेश दिया। साथ ही किसान, गन्ना मूल्य, नौजवान और २०२७ के चुनाव से जुड़े मुद्दों को भी अपने संबोधन का हिस्सा बनाया।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।