पश्चिम एशिया में जारी जंग अब एक नए और खतरनाक मरहले में दाख़िल होती दिखाई दे रही है। ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने ऐलान किया है कि अब मिडिल ईस्ट के बैंक और वित्तीय इदारे उनके निशाने पर हो सकते हैं। इस बयान के बाद दुबई, सऊदी अरब और बहरीन जैसे बड़े आर्थिक मरकज़ों में बेचैनी बढ़ गई है।
ईरानी मीडिया का दावा है कि हालिया हवाई हमलों में तेहरान के एक बैंक के मुलाज़िम मारे गए, जिसके बाद ईरान ने अपनी जंगी रणनीति बदलने का फैसला किया। अब तक जंग ज़्यादातर सैन्य ठिकानों तक सीमित थी, लेकिन अगर वित्तीय ढांचे को निशाना बनाया गया तो इसका असर पूरी दुनिया की इकॉनमी पर पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया की सियासी फिज़ा इन दिनों बेहद नाज़ुक दौर से गुजर रही है। जंग, जवाबी कार्रवाई और सख़्त बयानबाज़ी के सिलसिले के बीच अब एक नया और चिंताजनक मोड़ सामने आया है।
ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने बुधवार को यह इशारा दिया कि अब जंग का दायरा केवल सैन्य ठिकानों तक महदूद नहीं रहेगा। कमान ने दावा किया कि मिडिल ईस्ट के कई बैंक और वित्तीय इदारे उनकी जंगी रणनीति के दायरे में आ सकते हैं।
यह बयान ऐसे वक्त आया है जब इलाके में पहले ही तनाव की सूरत बहुत संगीन बनी हुई है।
जंग की दुनिया में एक बुनियादी उसूल होता है कि आम तौर पर लड़ाई सैन्य ठिकानों और रणनीतिक बुनियादी ढांचे तक सीमित रखी जाती है। मगर जब वित्तीय ढांचा निशाने पर आ जाए तो हालात कहीं ज्यादा पेचीदा हो जाते हैं।
ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हालिया हवाई हमलों में तेहरान के एक बैंक में काम करने वाले कुछ कर्मचारियों की मौत हो गई।
ईरान का दावा है कि यह हमला उस बड़े सैन्य अभियान का हिस्सा था जिसमें पहले भी उसके कई वरिष्ठ कमांडर और अहम शख्सियतें मारे जा चुके हैं।
इसी घटना के बाद ईरान की सैन्य कमान ने अपनी रणनीति में बदलाव का संकेत दिया।
कमान का कहना है कि जिन वित्तीय इदारों को निशाना बनाया जा सकता है, उनकी पहचान कर ली गई है।
यह बयान महज़ एक जंगी धमकी नहीं बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
क्योंकि आज की दुनिया में जंग केवल बंदूक और मिसाइल से नहीं लड़ी जाती। आर्थिक निज़ाम पर चोट करना भी एक बड़ा हथियार बन चुका है।
इस बयान के बाद सबसे ज्यादा चिंता खाड़ी देशों में दिखाई दे रही है।
दुबई को मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा वित्तीय मरकज़ माना जाता है। यहां दुनिया के हजारों बैंक, इन्वेस्टमेंट फर्म और फाइनेंशियल इदारे काम करते हैं।
अगर इन संस्थानों पर हमला होता है तो उसका असर केवल एक शहर या एक मुल्क तक सीमित नहीं रहेगा।
मसलन, दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर में कई ग्लोबल बैंकिंग नेटवर्क सक्रिय हैं।
ऐसी किसी भी जंगी कार्रवाई से पूरी दुनिया की फाइनेंशियल मार्केट्स में हलचल पैदा हो सकती है।
सऊदी अरब में भी हालात सतर्कता वाले हो गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक वहां एक तेल ठिकाने की तरफ बढ़ रहे दो ड्रोन मार गिराए गए।
बहरीन में भी सायरन बजने की खबरें आई हैं, जहां अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े का मुख्यालय मौजूद है।
इन घटनाओं ने पूरे इलाके में सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
जंग का इतिहास बताता है कि जब किसी संघर्ष का दायरा बढ़ता है तो उसके निशाने भी बदलने लगते हैं।
बीसवीं सदी में जंग का केंद्र ज्यादातर सैन्य ठिकाने और औद्योगिक फैक्ट्रियां हुआ करती थीं।
लेकिन इक्कीसवीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था का ढांचा इतना आपस में जुड़ चुका है कि बैंक और वित्तीय संस्थान भी रणनीतिक महत्व रखने लगे हैं।
अगर किसी इलाके की बैंकिंग प्रणाली बाधित होती है तो व्यापार, तेल सप्लाई और निवेश पर तुरंत असर पड़ता है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे बेहद खतरनाक मोड़ मान रहे हैं।
क्योंकि इससे जंग का असर सीधे आम लोगों की जिंदगी तक पहुंच सकता है।
अगर खाड़ी के वित्तीय केंद्र अस्थिर होते हैं तो इसका असर कई स्तरों पर दिख सकता है।
सबसे पहला असर तेल बाजार पर पड़ेगा।
मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा स्रोतों में से एक है।
यहां किसी भी तरह की अस्थिरता तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा सकती है।
इसके साथ ही शेयर बाजारों में भी घबराहट देखी जा सकती है।
अक्सर देखा गया है कि जब भी जंग का खतरा बढ़ता है तो निवेशक जोखिम से बचने के लिए पैसा निकालने लगते हैं।
इसका नतीजा बाजार में गिरावट के रूप में सामने आता है।
यानी एक क्षेत्रीय जंग धीरे-धीरे वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले सकती है।
हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान असल जंगी कार्रवाई से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश भी हो सकता है।
जंग में बयानबाज़ी का भी अपना महत्व होता है।
कई बार देश अपने विरोधियों को चेतावनी देने के लिए ऐसे बयान देते हैं ताकि उन्हें राजनीतिक या सैन्य फायदा मिल सके।
लेकिन यहां एक अहम सवाल यह भी है कि अगर बयान को हल्के में लिया गया और हालात अचानक बिगड़ गए तो क्या होगा।
इतिहास बताता है कि कई बड़े संघर्ष ऐसे ही छोटे संकेतों से शुरू हुए थे।
मिडिल ईस्ट पहले ही कई सियासी टकरावों का केंद्र रहा है।
यहां धार्मिक, राजनीतिक और सामरिक हित इतने उलझे हुए हैं कि एक छोटी घटना भी बड़े टकराव में बदल सकती है।
ऐसे में अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी कूटनीति पर आ जाती है।
दुनिया की बड़ी ताकतों को यह समझना होगा कि अगर हालात काबू से बाहर हुए तो उसका असर केवल इस इलाके तक सीमित नहीं रहेगा।
तेल सप्लाई, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय निवेश सभी प्रभावित हो सकते हैं।
जंग की खबरें अक्सर बड़े सैन्य आंकड़ों और राजनीतिक बयानों में सिमट जाती हैं।
लेकिन असल असर आम लोगों पर पड़ता है।
अगर वित्तीय संस्थान अस्थिर होते हैं तो इसका मतलब है बैंकिंग सेवाओं में बाधा, निवेश में गिरावट और रोजगार पर असर।
मसलन, खाड़ी देशों में लाखों विदेशी कर्मचारी काम करते हैं।
अगर वहां आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं तो उनका भविष्य भी अनिश्चित हो सकता है।
यानी जंग का असर सरहदों से कहीं ज्यादा दूर तक फैल सकता है।
फिलहाल हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।
ईरान के बयान के बाद खाड़ी देशों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की निगाहें अब इलाके की गतिविधियों पर टिकी हुई हैं।
अगर जंग केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित रहती है तो हालात संभल सकते हैं।
लेकिन अगर वित्तीय ढांचे को निशाना बनाया गया तो यह संघर्ष एक बिल्कुल नई और खतरनाक दिशा में जा सकता है।
दुनिया इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक गलत कदम पूरे वैश्विक संतुलन को हिला सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।