📍New Delh✍️i Asif Khan
रूस भारत रिश्तों की गर्मजोशी ने दुनिया का ध्यान खींचा है। पुतिन के भारत दौरे और मोदी से बढ़ती नजदीकी के बीच अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटेजी में भारत का नाम लेना सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक संतुलन का संकेत है। अमेरिका ने अपनी नई सुरक्षा रणनीति में भारत को अहम स्थान दिया है और चीन को लेकर दोहरी भाषा भी दिखाई है। यह संपादकीय इन तीनों ध्रुवों के बीच चल रही शक्ति राजनीति का गहराई से विश्लेषण करता है।
दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों एक अजीब सा सियासी सुकून और बेचैनी दोनों साथ चल रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा लम्हा बन गया है जिसे दुनिया ने बहुत गौर से देखा। प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी दोस्ती के दृश्य कैमरों में कैद हुए, मुस्कानें दिखीं, पुराने भरोसे की झलक दिखी। बाहर से देखने वाले को यह सब सीधा सा लगता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सियासत में कुछ भी सीधा नहीं होता। यहां हर मुस्कान के पीछे कई सवाल छिपे होते हैं।
एक तरफ भारत और रूस के बीच बड़ी डीलों की चर्चा है, ऊर्जा से लेकर रक्षा तक, भुगतान के वैकल्पिक रास्तों से लेकर टेक्नोलॉजी साझेदारी तक। दूसरी तरफ वाशिंगटन में बेचैनी की आहट सुनाई देने लगी है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका को यह सब पहली बार दिख रहा है, लेकिन इस बार स्वर कुछ अलग है। हाल ही में सामने आई अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटेजी में भारत का नाम लेना और उसे खुले तौर पर अहम साझेदार बताना, यूं ही नहीं है।
यहां से कहानी दिलचस्प हो जाती है। जब ट्रंप प्रशासन अपनी रणनीति में भारत को चीन के खिलाफ अहम भूमिका में देखता है, तो सवाल उठता है कि क्या यह भरोसे की बात है या मजबूरी की। भारत को मदद के लिए पुकारा जा रहा है, लेकिन क्या यह पुकार बराबरी की साझेदारी से निकली है या डर से। इसी दस्तावेज में चीन को आर्थिक चुनौती कहा गया है, फिर यह भी कहा गया कि चीन के साथ आर्थिक रिश्तों को दोबारा संतुलित किया जाएगा। यह बात आम आदमी को भी सोच में डाल देती है कि आखिर अमेरिका चाहता क्या है।
यूरोप को लेकर भी अमेरिकी भाषा में सख्ती दिखी। उन पर लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगे, यूक्रेन युद्ध को खींचने की बातें हुईं, और कहा गया कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए रूस से दुश्मनी खत्म करनी होगी। यह सब सुनकर लगता है कि पुराने दोस्त अब बोझ जैसे महसूस होने लगे हैं।
अब जरा दिल्ली के नजरिए से देखें। भारत आज खुद को किसी एक खांचे में फिट करने को तैयार नहीं है। वह अपने रास्ते खुद तय करना चाहता है। रूस भारत का पुराना दोस्त है, यह बात कोई नई नहीं। रक्षा समझौते, तकनीकी सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, यह सब दशकों से चला आ रहा है। दूसरी ओर अमेरिका भारत का बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार बन चुका है। क्वाड से लेकर हाई टेक चिप्स तक, हर जगह अमेरिका भारत को अपने साथ देखना चाहता है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि भारत किसके साथ है, सवाल यह है कि भारत अपने लिए क्या चाहता है।
मोदी और पुतिन की दोस्ती को लेकर दुनिया में दो तरह की प्रतिक्रियाएं दिखीं। कुछ ने इसे बहुध्रुवीय दुनिया की मजबूती बताया, तो कुछ ने इसे पश्चिमी जगत के लिए चुनौती माना। लेकिन सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है। भारत रूस के साथ खड़ा होकर यह संदेश जरूर दे रहा है कि वह किसी के दबाव में नहीं आएगा। वहीं भारत अमेरिका से भी यह कह रहा है कि साझेदारी शर्तों पर नहीं, बराबरी पर होनी चाहिए।
अब बात चीन की। नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटेजी में उसे आर्थिक चुनौती कहा गया, लेकिन पूरी तरह दुश्मन नहीं माना गया। यह वही दोगलापन है जिसे आम लोग भी समझने लगे हैं। अमेरिका एशिया में शांति की बात करता है, लेकिन सैन्य गठजोड़ भी बढ़ाता है। साउथ चाइना सी में जापान और दिल्ली से मदद मांगता है, लेकिन व्यापार में चीन से अलग होना भी नहीं चाहता। यह दो नावों में सवार होने वाली नीति कब तक चलेगी, यह बड़ा सवाल है।
भारत के लिए चीन सिर्फ एक आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि सीधी सीमा सुरक्षा का मामला भी है। गलवान से लेकर अरुणाचल तक, तनाव के कई अध्याय भारत देख चुका है। ऐसे में जब अमेरिका भारत से चीन के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात करता है, तो दिल्ली बहुत सोच समझकर कदम बढ़ाती है। भारत जानता है कि हर लड़ाई किसी और की शतरंज पर मोहरा बनकर नहीं लड़ी जाती।
इस पूरे खेल में रूस की भूमिका भी कम जटिल नहीं है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों ने उसे एशिया की तरफ और मोड़ दिया है। भारत, चीन, ईरान जैसे देशों के साथ रिश्ते उसके लिए जीवन रेखा बन गए हैं। पुतिन जानते हैं कि भारत के बिना एशियाई संतुलन अधूरा है। यही वजह है कि उनकी यह यात्रा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश भी है।
अब आम भारतीय की सोच पर आएं। उसके लिए यह सब खबरों की सुर्खियां हैं, लेकिन असर धीरे धीरे उसके जीवन में भी उतरता है। जब तेल सस्ता होता है या महंगा, जब डॉलर मजबूत होता है या रुपया कमजोर, तब उसे एहसास होता है कि यह सारी बड़ी राजनीति आखिर उसके घर की रसोई तक कैसे पहुंच जाती है। यही वजह है कि विदेश नीति केवल राजनयिकों का विषय नहीं रह गई है, यह अब आम जनता की चिंता का हिस्सा भी बन चुकी है।
यह भी सवाल उठता है कि क्या अमेरिका सच में भारत को बराबरी का साझेदार मानता है। रणनीति के कागज में नाम लेना एक बात है, लेकिन व्यवहार में बराबरी दिखाना दूसरी बात। वीजा नीति से लेकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तक, कई मोर्चों पर भारत को अब भी इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में दोस्ती के दावे पर शक होना स्वाभाविक है।
यूरोप की भूमिका भी इस कहानी में दिलचस्प है। यूक्रेन को लेकर उसकी जिद और ऊर्जा संकट ने उसकी अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। अमेरिका खुद यह कह रहा है कि युद्ध रुकना चाहिए, रूस से दुश्मनी खत्म करनी चाहिए, लेकिन व्यवहार में अब भी हथियार भेजे जा रहे हैं। यह विरोधाभास सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर भी फैलता जा रहा है।
भारत इस पूरी उथल पुथल को शांत आंखों से देख रहा है। वह न किसी एक खेमे में पूरी तरह जाता है, न किसी से पुल तोड़ता है। यह नीति कुछ लोगों को भ्रमित लगती है, लेकिन शायद यही आज के दौर की सबसे यथार्थवादी सोच है। दुनिया अब शीत युद्ध वाले सीधे खांचे में नहीं बंटी है। यहां दोस्त और प्रतिद्वंदी अक्सर एक ही मेज पर बैठे दिख जाते हैं।
मोदी और पुतिन की दोस्ती पर दुनिया की नजरें इसलिए भी टिकी हैं क्योंकि इसमें भावनात्मक संकेत भी हैं और रणनीतिक गणित भी। मोदी एक ओर रूस से अपने पुराने रिश्तों को निभा रहे हैं, तो दूसरी ओर अमेरिका और पश्चिम से संवाद भी बनाए रखे हुए हैं। यह संतुलन साधना आसान नहीं है, लेकिन भारत फिलहाल इसे साधता हुआ दिख रहा है।
अब एक तीखा सवाल भी उठता है। क्या भारत परोक्ष रूप से अमेरिका और रूस के बीच संतुलन साधने का जरिया बन रहा है। क्या भारत अपने हितों से ऊपर किसी और की लड़ाई में खिंच सकता है। इन सवालों का जवाब कोई एक दस्तावेज नहीं दे सकता। यह जवाब आने वाले वर्षों की नीतियों और फैसलों में छुपा है।
चीन के मामले में भारत की सावधानी भी यहां समझने लायक है। अमेरिका का साथ लेना आकर्षक लगता है, क्योंकि वह तकनीक, निवेश और वैश्विक समर्थन का वादा करता है। लेकिन अमेरिका का इतिहास भी भारत ने देखा है, जहां जरूरत के वक्त वादे बदलते देर नहीं लगती। वहीं रूस का भरोसा पुराना है, लेकिन उसकी आर्थिक ताकत अब पहले जैसी नहीं रही।
तो भारत आखिर कहां खड़ा है। शायद वह उस जगह खड़ा है जहां कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं, बल्कि स्थायी हित होते हैं। यह वाक्य किताबों में बहुत पढ़ा गया है, लेकिन आज यह जमीन पर उतरता दिख रहा है।
ट्रंप प्रशासन की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटेजी भी इसी उतार चढ़ाव की कहानी कहती है। एक ओर वह भारत से मदद मांगता है, दूसरी ओर चीन के साथ संतुलन की बात करता है। यूरोप को फटकारता है, फिर भी उसके साथ गठबंधन बनाए रखता है। यह सब दिखाता है कि अमेरिका खुद भी अपने भीतर कई दुविधाओं से गुजर रहा है।
ऐसे में भारत के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वह अपनी सोच साफ रखे। उसे यह समझना होगा कि कौन सा कदम उसे लंबी दौड़ में मजबूत बनाता है और कौन सा उसे किसी और की चाल में मोहरा बना सकता है। पुतिन का दौरा, मोदी की सक्रिय कूटनीति और अमेरिका की रणनीति, यह सब मिलकर एक नई वैश्विक तस्वीर बना रहे हैं।
यह तस्वीर अभी अधूरी है, इसके रंग भी बदल रहे हैं। आज जो दोस्त है, कल वह प्रतिद्वंदी भी बन सकता है। आज जो डर है, कल वह सौदे में बदल सकता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यही सच है। और शायद इसी सच को समझकर भारत अपने कदम बेहद सोच समझकर रख रहा है।
अंत में बस इतना कहा जा सकता है कि यह दौर सिर्फ गठबंधनों का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर फैसलों का भी है। भारत अगर इस दौर में खुद को मजबूती से खड़ा कर सका, तो चाहे पुतिन हों, ट्रंप हों या शी जिनपिंग, हर कोई दिल्ली की तरफ देखने को मजबूर होगा। और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संकेत है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।