मुजफ्फरनगर नगर पालिका परिषद की अध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप ने एमआरएफ सेंटर के निरीक्षण के दौरान दावा किया कि शहर का कचरा अब केवल निस्तारण की समस्या नहीं, बल्कि आय का स्रोत बनता जा रहा है। सूखे कचरे के पृथक्करण और रिसाइक्लिंग से पालिका को अतिरिक्त राजस्व मिल रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल की वास्तविक सफलता केवल आय से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रभाव, नागरिक भागीदारी और दीर्घकालिक स्थिरता से तय होगी।
📍 मुजफ्फरनगर 📰 Date: 6 जून 2026
✍️ Wasi Siddiqui
मुजफ्फरनगर में कूड़ा प्रबंधन अब केवल सफाई व्यवस्था का हिस्सा नहीं रह गया है। नगर पालिका परिषद की अध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप ने हाल ही में रुड़की रोड स्थित एमआरएफ (मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी) सेंटर का जायज़ा लेते हुए कहा कि शहर का कचरा भविष्य में पालिका की आय का बड़ा स्रोत बन सकता है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब देशभर के शहर बढ़ते कचरे, सीमित लैंडफिल स्पेस और पर्यावरणीय दबाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में "वेस्ट टू वेल्थ" यानी कूड़े को संसाधन में बदलने का नैरेटिव स्थानीय प्रशासन के लिए आकर्षक मॉडल बनता जा रहा है।
नगर पालिका के अनुसार शहर से डोर-टू-डोर कलेक्शन के माध्यम से प्राप्त सूखे कचरे को एमआरएफ सेंटर में अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। प्लास्टिक, लोहा, पॉलीथिन और अन्य रिसाइक्लेबल सामग्री को प्रोसेस कर बाजार में बेचा जाता है।
पालिका के आंकड़ों के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में इस प्रक्रिया से लगभग 1.20 लाख रुपये की आय हुई। चालू वित्तीय वर्ष में भी दो किस्तों के माध्यम से लगभग 1.46 लाख रुपये पालिका कोष में जमा कराए जा चुके हैं।
मीनाक्षी स्वरूप का कहना है कि यह मॉडल आने वाले समय में पालिका की आर्थिक क्षमता को मजबूत करेगा और स्वच्छता अभियान को नई दिशा देगा।
दुनिया के कई देशों में कचरा अब केवल अपशिष्ट नहीं माना जाता। यूरोप, जापान और सिंगापुर जैसे देशों में रिसाइक्लिंग इंडस्ट्री अरबों डॉलर का सेक्टर बन चुकी है।
भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में "सर्कुलर इकोनॉमी" की अवधारणा पर ज़ोर बढ़ा है। इसका मकसद संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना और कचरे को दोबारा आर्थिक गतिविधि का हिस्सा बनाना है।




मुजफ्फरनगर का मॉडल इसी व्यापक सोच का स्थानीय संस्करण दिखाई देता है।
यहीं से असली एडिटोरियल बहस शुरू होती है।
यदि किसी शहर को कूड़े से एक या दो लाख रुपये की अतिरिक्त आय होती है, तो यह सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आय पूरे कचरा प्रबंधन सिस्टम की लागत के मुकाबले पर्याप्त है?
एमआरएफ सेंटर चलाने, मशीनरी लगाने, श्रमिकों की नियुक्ति, परिवहन और रखरखाव पर होने वाले खर्च को भी समान गंभीरता से देखना होगा।
किसी भी सार्वजनिक नीति की सफलता केवल आय के आंकड़ों से नहीं, बल्कि लागत और लाभ के संतुलन से तय होती है।
किसी भी वेस्ट मैनेजमेंट मॉडल की सबसे कमजोर और सबसे मजबूत कड़ी आम नागरिक होते हैं।
यदि घरों से ही गीले और सूखे कचरे का पृथक्करण नहीं होगा, तो एमआरएफ सेंटर की कार्यक्षमता प्रभावित होगी।
मुजफ्फरनगर में भी असली चुनौती मशीनें नहीं, बल्कि लोगों की आदतें हैं।
शहरों में अक्सर देखा गया है कि जागरूकता अभियानों के बावजूद लोग मिश्रित कचरा ही बाहर रखते हैं। इससे रिसाइक्लिंग प्रक्रिया महंगी और जटिल हो जाती है।
इसलिए यदि पालिका वास्तव में आत्मनिर्भर मॉडल बनाना चाहती है, तो उसे इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ व्यवहार परिवर्तन पर भी निवेश करना होगा।
कचरे से आय की चर्चा आकर्षक लगती है, लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा शायद आर्थिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय है।
रिसाइक्लिंग बढ़ने से लैंडफिल पर दबाव कम होता है। प्लास्टिक प्रदूषण घटता है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े उत्सर्जन में भी कमी आती है।
यदि हजारों टन कचरा खुले में फेंके जाने के बजाय पुनर्चक्रण की प्रक्रिया में जाता है, तो शहर की वायु गुणवत्ता, जल स्रोत और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
यानी असली लाभ बैंक खाते में दिखने वाले रुपये से कहीं बड़ा हो सकता है।
पालिकाध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप ने निरीक्षण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की स्वच्छता और संसाधन प्रबंधन नीतियों का भी उल्लेख किया।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो स्थानीय निकायों के लिए स्वच्छता अब केवल प्रशासनिक विषय नहीं रहा। यह शासन की कार्यक्षमता, शहरी विकास और नागरिक संतुष्टि से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
ऐसे में कूड़े से आय का मॉडल स्थानीय प्रशासन के लिए एक सकारात्मक नैरेटिव भी तैयार करता है।
हालांकि किसी भी मॉडल की विश्वसनीयता उसके दीर्घकालिक परिणामों से तय होती है, न कि केवल शुरुआती उपलब्धियों से।
पालिका प्रशासन का कहना है कि दूसरा केंद्र भी तैयार किया जा रहा है और सहावली में भवन निर्माण पूरा हो चुका है।
यदि नए केंद्र समय पर शुरू होते हैं तो शहर के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले कचरे को अधिक व्यवस्थित तरीके से प्रोसेस किया जा सकेगा।
इससे संग्रहण लागत घट सकती है और रिसाइक्लिंग की क्षमता बढ़ सकती है।
लेकिन विस्तार के साथ जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता भी बढ़ेगी। नागरिकों को यह जानने का अधिकार होगा कि कितना कचरा प्रोसेस हुआ, कितनी सामग्री बेची गई और वास्तविक राजस्व कितना प्राप्त हुआ।
भारत के अधिकांश शहर अभी भी कचरा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे से जूझ रहे हैं।
कई जगहों पर डंपिंग ग्राउंड भरे हुए हैं। रिसाइक्लिंग चैन कमजोर है। अनौपचारिक कचरा बीनने वाले श्रमिकों की भूमिका भी अक्सर नज़रअंदाज़ होती है।
मुजफ्फरनगर यदि इस दिशा में सफल मॉडल बनना चाहता है, तो उसे केवल राजस्व वृद्धि नहीं बल्कि समावेशी और टिकाऊ व्यवस्था विकसित करनी होगी।
यही वह बिंदु है जहां किसी योजना का प्रचार और उसकी वास्तविक सफलता अलग-अलग रास्तों पर जा सकते हैं।
कूड़े से कमाई का मॉडल निश्चित रूप से दिलचस्प और संभावनाओं से भरा विचार है। मीनाक्षी स्वरूप की अगुवाई में नगर पालिका ने जो पहल शुरू की है, वह स्थानीय स्तर पर सकारात्मक संकेत देती है।
लेकिन सफलता का अंतिम पैमाना यह नहीं होगा कि पालिका को कितनी आय हुई। असली सवाल यह होगा कि क्या शहर का कचरा कम हुआ, क्या रिसाइक्लिंग बढ़ी, क्या पर्यावरण बेहतर हुआ और क्या नागरिक इस बदलाव का हिस्सा बने।
यदि इन सवालों का जवाब आने वाले वर्षों में सकारात्मक मिलता है, तो मुजफ्फरनगर वास्तव में उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के अन्य शहरों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।