NASA के X-59 जेट से दिल्ली-लंदन और मुंबई-न्यूयॉर्क की उड़ानें अब 4 घंटे से कम में पूरी हो सकती हैं, वह भी बिना तेज सोनिक बूम के।
नासा का नवीनतम प्रयोगात्मक विमान X-59, जिसे “सुपरसोनिक फ्लाइट की वापसी” का प्रतीक माना जा रहा है, ने अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित एयर फ़ोर्स प्लांट 42 में अपना कम गति वाला टैक्सी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह परीक्षण न केवल तकनीकी रूप से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है बल्कि यह भविष्य में शोररहित सुपरसोनिक उड़ानों की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है।
X-59 को अक्सर “Son of Concorde” कहा जाता है, क्योंकि यह वही सपना दोहराने की कोशिश है जो ब्रिटिश और फ्रांसीसी संयुक्त परियोजना ‘Concorde’ ने दिखाया था – ध्वनि से तेज उड़ानों का सपना। हालांकि Concorde को 2003 में बंद कर दिया गया था, लेकिन X-59 न केवल तेज उड़ान का वादा करता है, बल्कि वह उसे बिना कष्टदायक सोनिक बूम के पूरा करने की ओर अग्रसर है।
10 जुलाई को, X-59 ने पहली बार अपनी शक्ति के बल पर रनवे पर कम गति से चलकर “लो-स्पीड टैक्सी टेस्ट” को पूरा किया। नासा के अनुसार, यह परीक्षण विमान के ब्रेकिंग, स्टीयरिंग और नियंत्रण प्रणाली की जांच के लिए अत्यंत आवश्यक था।
इंजीनियरों की एक टीम ने इन परीक्षणों के दौरान विमान की स्थिरता और नियंत्रण की बारीकी से निगरानी की। इन सभी संकेतों के सकारात्मक रहने के बाद ही अगले चरण – हाई-स्पीड टैक्सी टेस्ट और फिर फ्लाइट टेस्ट – की मंजूरी दी जाएगी।
X-59 नासा के “Quesst” मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य है सुपरसोनिक फ्लाइट को ऐसे रूप में वापस लाना, जो न केवल तेज हो बल्कि जमीन पर रहने वालों के लिए भी शोररहित हो।
जहां सामान्य सुपरसोनिक विमान तेज “boom” की आवाज़ पैदा करते हैं, वहीं X-59 के विशेष डिजाइन का उद्देश्य इस सोनिक बूम को “thump” जैसी हल्की ध्वनि में बदलना है। इसका कारण है इसका अत्यंत लंबा और पतला नाक डिज़ाइन, जो शॉक वेव्स को विभाजित कर देता है।
X-59 की अपेक्षित उड़ान गति लगभग 925 मील प्रति घंटा (लगभग 1,488 किलोमीटर प्रति घंटा) होगी। यह वही गति है जिस पर कॉनकॉर्ड कभी उड़ान भरता था, लेकिन उससे बेहतर खासियत यह है कि X-59 बिना कानफाड़ू आवाज़ के उड़ान भरने की क्षमता रखता है।
इस गति का अर्थ यह है कि न्यूयॉर्क से लंदन की उड़ान, जो अभी लगभग 7 घंटे लेती है, वह 3.5 घंटे में पूरी हो सकती है। यह समय बचत और शांत यात्रा का संयोजन भविष्य की हवाई यात्रा को पूरी तरह बदल सकता है।
कॉनकॉर्ड ने 1976 में वाणिज्यिक उड़ानें शुरू की थीं और 1996 में उसने न्यूयॉर्क से लंदन की यात्रा केवल 2 घंटे 52 मिनट में पूरी करके इतिहास रच दिया था।
लेकिन अत्यधिक खर्च, सीमित सीटें और सोनिक बूम की वजह से लोगों को हो रही परेशानी इसकी समाप्ति का कारण बनी। 2000 में हुए एक बड़े हादसे में 113 लोगों की मौत के बाद कॉनकॉर्ड की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे। अंततः 2003 में इसे स्थायी रूप से सेवा से हटा दिया गया।
नासा का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है। X-59 सिर्फ गति पर नहीं बल्कि सार्वजनिक सुविधा और पर्यावरणीय प्रभावों पर भी ध्यान दे रहा है।
इस मिशन का लक्ष्य है कि विमान की आवाज़ इस हद तक कम हो कि वाणिज्यिक सुपरसोनिक उड़ानों को जमीन के ऊपर से अनुमति मिल सके, जो वर्तमान में अमेरिका सहित कई देशों में प्रतिबंधित है।
नासा के अनुसार, अब आने वाले सप्ताहों में X-59 का स्पीड स्तर धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। हाई-स्पीड टैक्सी टेस्ट में विमान टेकऑफ़ के बेहद करीब की स्थिति तक लाया जाएगा।
यदि सभी सिस्टम स्थिर पाए जाते हैं, तो इस साल के अंत तक इसका पहला परीक्षण उड़ान कार्यक्रम पूरा कर लिया जाएगा।
X-59 के परीक्षणों से जो डेटा प्राप्त होगा, वह केवल नासा के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक विमानन नियामकों के लिए भी उपयोगी होगा।
अमेरिका और अन्य देशों की सिविल एविएशन अथॉरिटीज़ इन आंकड़ों का उपयोग करके नए नियमों की रूपरेखा तैयार करेंगी, जिससे भविष्य में सुपरसोनिक विमान आम लोगों की यात्रा का हिस्सा बन सकें।
लंबाई: 100 फीट
चौड़ाई: 30 फीट
गति: लगभग 925 मील प्रति घंटा
प्रणाली: शॉक वेव ब्रेकर डिज़ाइन के साथ लंबा नोज
मिशन: Quesst - शांत सुपरसोनिक उड़ानों के लिए शोध और परीक्षण
लक्ष्य: ध्वनि से तेज उड़ानों की वापसी, बिना शोर के
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह तकनीक महत्त्वपूर्ण हो सकती है। जैसे-जैसे वैश्विक वाणिज्यिक उड़ानों की मांग बढ़ रही है, भारत जैसे देश जो अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी के लिए अधिक सक्षम होना चाहते हैं, उनके लिए यह तकनीक निर्णायक साबित हो सकती है।
यदि सोनिक बूम की समस्या हल हो जाती है, तो दिल्ली से लंदन, मुंबई से न्यूयॉर्क जैसी उड़ानें भी 4 घंटे से कम में पूरी हो सकती हैं।
X-59 का विकास और परीक्षण यह दर्शाता है कि न केवल तकनीकी रूप से, बल्कि नीति निर्माण और अंतरराष्ट्रीय नियमों की दिशा में भी हम सुपरसोनिक युग में पुनः प्रवेश की ओर बढ़ रहे हैं।
जहां एक ओर इसका तकनीकी पक्ष वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को उत्साहित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यात्रियों को भी यह उम्मीद बंधा रहा है कि लंबी उड़ानें अब समय की बर्बादी नहीं रहेंगी।
एक ऐसा भविष्य, जहां सुबह की कॉफी न्यूयॉर्क में और दोपहर की चाय लंदन में हो सके – वह अब केवल कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत बनने की दिशा में है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।