असम विधानसभा में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड यानी UCC बिल पास होने के बाद देश में एक बार फिर संविधान, धार्मिक आज़ादी और पर्सनल लॉ को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम इस दिशा में बड़ा कदम उठाने वाला तीसरा राज्य बन गया है। सवाल अब सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक ढांचे, राजनीतिक नैरेटिव और आने वाले चुनावी असर का भी है।
📍 नई दिल्ली
📰 Date: 27 मई 2026
✍️ Asif Khan
भारत में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड यानी UCC कोई नया मुद्दा नहीं है। संविधान के नीति निदेशक तत्वों में इसका ज़िक्र दशकों पहले किया गया था। लेकिन लंबे समय तक यह बहस अदालतों, लॉ कमीशन और राजनीतिक भाषणों तक सीमित रही। अब तस्वीर बदल रही है।
असम विधानसभा में UCC बिल पास होने के बाद यह बहस फिर राष्ट्रीय केंद्र में आ गई है। उत्तराखंड के बाद असम का यह कदम सिर्फ कानूनी बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बड़े सियासी और सामाजिक नैरेटिव के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार इसे “समान अधिकार” और “आधुनिक कानून व्यवस्था” की दिशा में कदम बता रही है। वहीं विरोधी पक्ष इसे धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता पर दबाव के तौर पर पेश कर रहा है।
यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड का मतलब ऐसा साझा सिविल कानून है, जो शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने और पारिवारिक मामलों में सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो।
इस समय भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के अपने पर्सनल लॉ हैं। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के पारिवारिक मामलों में अलग कानूनी व्यवस्था लागू होती है।
UCC समर्थकों का दावा है कि अलग-अलग पर्सनल लॉ से समानता का सिद्धांत कमजोर होता है। विरोधियों का कहना है कि भारत की विविधता को एक ही कानून से नियंत्रित करना व्यवहारिक और संवैधानिक चुनौती बन सकता है।
असम सरकार का कहना है कि यह कदम महिलाओं के अधिकार, जेंडर जस्टिस और कानूनी समानता को मजबूत करेगा। सरकार ने यह भी संकेत दिए हैं कि कई सामाजिक और पारिवारिक विवादों में एक समान कानून से कानूनी प्रक्रिया आसान होगी।
हालांकि सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि कुछ आदिवासी और संरक्षित समुदायों को विशेष प्रावधानों के तहत अलग रखा जा सकता है। यही हिस्सा आने वाले समय में सबसे ज्यादा कानूनी और राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।
UCC अब सिर्फ कानूनी बहस नहीं रहा। यह तेजी से चुनावी और वैचारिक मुद्दे में बदल रहा है।
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से UCC को अपने प्रमुख एजेंडा में रखती आई है। राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के बाद अब UCC को “अगले बड़े वैचारिक लक्ष्य” के रूप में देखा जा रहा है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार सामाजिक सुधार के नाम पर राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा रही है। कई विपक्षी दलों ने सवाल उठाया है कि क्या सरकार ने सभी समुदायों से व्यापक संवाद किया?
यहीं से बहस और जटिल हो जाती है। क्योंकि भारत सिर्फ कानूनी ढांचा नहीं, बल्कि सामाजिक विविधताओं का विशाल लोकतंत्र भी है।
ज़मीनी हकीकत यही बताती है कि UCC की बहस में सबसे ज्यादा फोकस मुस्लिम पर्सनल लॉ पर रहता है। ट्रिपल तलाक कानून के बाद यह मुद्दा और संवेदनशील हो गया।
लेकिन कई संवैधानिक विशेषज्ञ कहते हैं कि बहस को सिर्फ एक समुदाय तक सीमित करना गलत होगा। हिंदू उत्तराधिकार कानून से लेकर जनजातीय परंपराओं तक, कई क्षेत्रों में अलग कानूनी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
यानी अगर वास्तव में “समान कानून” लागू करना है, तो सवाल सभी धार्मिक और सामाजिक समूहों पर समान रूप से उठेंगे।
UCC समर्थक इसे महिला अधिकारों से जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि कई पर्सनल लॉ में महिलाओं को बराबरी का अधिकार पूरी तरह नहीं मिलता।
दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि सुधार जरूरी है, लेकिन सुधार का तरीका संवाद आधारित होना चाहिए। उनका सवाल है कि क्या एक समान कानून विविध सांस्कृतिक परंपराओं को कमजोर करेगा?
यही वह बिंदु है जहां संविधान के दो महत्वपूर्ण पहलू आमने-सामने दिखाई देते हैं। एक तरफ समानता का अधिकार, दूसरी तरफ धार्मिक स्वतंत्रता।
फिलहाल ऐसा तुरंत होता नहीं दिख रहा। क्योंकि भारत का संघीय ढांचा राज्यों को कई मामलों में स्वतंत्रता देता है। अलग-अलग राज्यों की सामाजिक संरचना भी भिन्न है।
उत्तराखंड और असम जैसे राज्यों में राजनीतिक समर्थन मजबूत दिखाई देता है। लेकिन दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में इस पर गंभीर आपत्तियां भी सामने आ रही हैं।
संभावना यही है कि आने वाले वर्षों में अलग-अलग राज्य अपने मॉडल तैयार करें। बाद में केंद्र व्यापक राष्ट्रीय मॉडल की तरफ बढ़ने की कोशिश करे।
सुप्रीम कोर्ट कई बार अपने फैसलों में समान सिविल कानून की आवश्यकता पर टिप्पणी कर चुका है। शाह बानो केस से लेकर कई अन्य मामलों तक अदालत ने सरकारों को इस दिशा में विचार करने की बात कही।
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून बनाना संसद और सरकार का अधिकार क्षेत्र है। इसलिए अंतिम फैसला राजनीतिक नेतृत्व और विधायी प्रक्रिया से ही निकलेगा।
यही सबसे बड़ा सवाल है।
भारत में शादी, परिवार और विरासत सिर्फ कानूनी विषय नहीं हैं। ये सामाजिक पहचान, धार्मिक मान्यता और पारिवारिक परंपराओं से गहराई से जुड़े मुद्दे हैं।
इसलिए किसी भी बड़े बदलाव के लिए सिर्फ संसद में बहुमत काफी नहीं होगा। समाज में भरोसा और संवाद भी उतना ही जरूरी रहेगा।
अगर सरकार पारदर्शिता, परामर्श और चरणबद्ध सुधार का रास्ता अपनाती है, तो समर्थन बढ़ सकता है। लेकिन अगर बहस राजनीतिक नारों तक सीमित रही, तो विरोध भी तेज होगा।
2026 और 2027 की राजनीति में UCC बड़ा मुद्दा बन सकता है। खासकर उन राज्यों में जहां पहचान आधारित राजनीति मजबूत है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि UCC का मुद्दा बीजेपी के कोर वोटबेस को मजबूत कर सकता है। वहीं विपक्ष इसे “संविधान बनाम केंद्रीकरण” के नैरेटिव में बदलने की कोशिश करेगा।
इसका असर सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगा। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और टेलीविजन डिबेट्स में यह मुद्दा लंबे समय तक गर्म रह सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब देश पहले से महंगाई, तेल संकट और वैश्विक जियोपॉलिटिक्स के दबाव का सामना कर रहा है।
ईरान-अमेरिका तनाव के कारण पेट्रोल-डीजल कीमतों को लेकर चिंता बनी हुई है। कई राज्यों में ईंधन कीमतें राजनीतिक मुद्दा बन चुकी हैं। ऐसे माहौल में UCC जैसी वैचारिक बहसें जनता का फोकस बदल सकती हैं।
यानी भारत की राजनीति में आर्थिक नैरेटिव और सांस्कृतिक नैरेटिव अब साथ-साथ चल रहे हैं।
असम में UCC बिल पास होना सिर्फ एक राज्य का फैसला नहीं माना जाएगा। यह आने वाले वर्षों में भारत की संवैधानिक बहस, चुनावी राजनीति और सामाजिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है।
लेकिन सबसे अहम बात यह रहेगी कि क्या यह बदलाव सहमति और संवाद से आगे बढ़ता है, या फिर राजनीतिक टकराव में बदल जाता है।
भारत जैसे विविध लोकतंत्र में किसी भी बड़े कानूनी बदलाव की असली परीक्षा संसद में नहीं, समाज के भीतर होती है।
और फिलहाल, UCC उसी परीक्षा के शुरुआती दौर में खड़ा दिखाई देता है।
Assam Passes UCC Bill
UCC Debate Intensifies
India’s Civil Code Battle
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।