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मनरेगा : ग्रामीण रोजगार की नई बहस और सियासी साया

None 2025-12-15 14:27:27
मनरेगा : ग्रामीण रोजगार की नई बहस और सियासी साया

 मनरेगा बनाम नया कानून: रोजगार, नाम और नीति
 

ग्रामीण भारत का भविष्य: गारंटी, गरिमा और राजनीति
 


केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा की जगह नए ग्रामीण रोजगार कानून की तैयारी ने नीति, राजनीति और प्रतीकों पर बहस तेज कर दी है। सवाल रोजगार के दिनों का नहीं, भरोसे, पहचान और परिणामों का है।

📍नई दिल्ली 🗓️ 15 दिसंबर 2025✍️ Asif Khan

 बहस का असल मुद्दा
ग्रामीण रोजगार पर चर्चा अक्सर कागजों से शुरू होकर नारों पर खत्म हो जाती है। पर गांव में रहने वाले परिवार के लिए सवाल सीधा होता है। काम मिलेगा या नहीं, समय पर मजदूरी आएगी या नहीं, और सम्मान के साथ काम होगा या नहीं। मनरेगा के स्थान पर नए कानून की खबर ने इसी सरल सवाल को फिर से सामने रख दिया है। सरकार का दावा है कि नया ढांचा ज्यादा सक्षम होगा। विपक्ष कहता है कि नाम और प्रतीक बदलकर ध्यान भटकाया जा रहा है। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।

मनरेगा की विरासत और उसकी सीमाएं
मनरेगा ने ग्रामीण भारत में संकट के समय सहारा दिया। सूखे में, महामारी में, और पलायन के दौर में यह योजना सुरक्षा जाल बनी। पर यह भी सच है कि कई जगह भुगतान में देरी, काम की गुणवत्ता, और स्थानीय राजनीति ने असर कम किया। गांव के एक मजदूर की कहानी याद आती है, जिसने कहा कि काम मिला, पर मजदूरी तीन महीने बाद आई। नीति की सफलता आंकड़ों से नहीं, ऐसे अनुभवों से मापी जाती है।

नया कानून: वादा और भाषा
नए प्रस्ताव में 125 दिन की गारंटी, आजीविका पर जोर, और मिशन मोड की बात है। कागज पर यह आकर्षक है। अतिरिक्त दिन मतलब अतिरिक्त आय, और आजीविका का अर्थ केवल गड्ढा खोदना नहीं, बल्कि कौशल, संपत्ति और स्थायित्व। यहां एक अंग्रेजी शब्द अक्सर सुनाई देता है, आउटकम। सवाल यह है कि आउटकम किसका और कैसे मापा जाएगा। यदि लक्ष्य रोजगार के साथ उत्पादकता बढ़ाना है, तो प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच और स्थानीय जरूरतों का तालमेल जरूरी होगा।

विकसित भारत का फ्रेम और ग्रामीण सच
विकसित भारत का विजन प्रेरक है। पर गांव की सड़क, नहर और स्कूल बिना रखरखाव के हों तो विजन दूर लगता है। नीति को बड़े सपने के साथ छोटे कदम भी चाहिए। 2047 का लक्ष्य तब सार्थक होगा जब 2025 में मजदूरी समय पर मिले। यह साधारण बात लगती है, पर यहीं पर सिस्टम की परीक्षा होती है।

नाम, प्रतीक और राजनीति
नाम बदलने की सुगबुगाहट ने बहस को भावनात्मक बना दिया। विपक्ष का तर्क है कि विरासत कमजोर की जा रही है। सरकार की ओर से औपचारिक पुष्टि नहीं, पर चुप्पी सवाल बढ़ाती है। प्रतीक राजनीति में शक्तिशाली होते हैं, पर अंततः पेट प्रतीक से नहीं भरता। फिर भी, प्रतीक भरोसे से जुड़े होते हैं। जब भरोसा हिलता है, तो सबसे पहले गरीब हिचकता है।

रोजगार बनाम आजीविका: फर्क समझना जरूरी
रोजगार दिन गिनता है, आजीविका साल गिनती है। नया कानून यदि आजीविका को केंद्र में रखता है, तो यह स्वागत योग्य है। पर इसके लिए स्थानीय उद्योग, कृषि से जुड़ी प्रोसेसिंग, और महिला स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करना होगा। केवल कानून बदल देने से बाजार नहीं बनते। यहां नीति को जमीन से जोड़ना होगा।

क्रियान्वयन की कसौटी
भारत में कानून अच्छे बनते हैं, पर क्रियान्वयन कमजोर रहता है। पंचायत स्तर पर क्षमता, पारदर्शिता और तकनीक का संतुलन जरूरी है। डिजिटल उपस्थिति मदद करती है, पर नेटवर्क और साक्षरता की कमी बाधा बनती है। एक बुजुर्ग महिला का कहना था कि मशीन बोली समझ नहीं आती, इंसान समझ आता है। तकनीक सहायक हो, बाधा नहीं।

वित्तीय अनुशासन और प्राथमिकताएं
125 दिन की गारंटी का अर्थ है अधिक संसाधन। क्या बजट में जगह है। यदि है, तो भुगतान समय पर होगा। यदि नहीं, तो देरी बढ़ेगी। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि धन कहां से आएगा और कैसे बहेगा। पारदर्शिता यहां राजनीति से ज्यादा अर्थव्यवस्था का सवाल है।

विपक्ष की आपत्तियां और उनकी ताकत
विपक्ष नाम और खर्च पर सवाल उठा रहा है। यह आलोचना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती। कार्यालयी बदलाव का खर्च वास्तविक होता है। पर विपक्ष को भी यह बताना होगा कि वे सुधार कैसे करेंगे। केवल विरोध से गांव का भला नहीं होता। एक मजबूत बहस वही है जो विकल्प दे।

संघवाद और राज्यों की भूमिका
ग्रामीण रोजगार राज्यों के साथ मिलकर चलता है। नया कानून यदि केंद्रित होगा, तो राज्यों की विविधता दब सकती है। पहाड़ी राज्य, सूखा क्षेत्र, और आदिवासी इलाकों की जरूरतें अलग हैं। लचीलापन जरूरी है। एक आकार सब पर फिट नहीं बैठता।

मजदूरी, गरिमा और काम की गुणवत्ता
मजदूरी केवल रकम नहीं, गरिमा का सवाल है। काम ऐसा हो कि गांव की संपत्ति बने। जल संरक्षण, मिट्टी सुधार, और सार्वजनिक सुविधाएं लंबे समय तक लाभ दें। यदि काम दिखेगा, तो भरोसा बनेगा। यदि काम कागज पर रहेगा, तो अविश्वास बढ़ेगा।

राजनीति से परे संवाद
इस बहस में कटुता से ज्यादा संवाद की जरूरत है। सरकार, विपक्ष, और नागरिक समाज मिलकर सुधार कर सकते हैं। संसद में चर्चा केवल औपचारिक न हो, अनुभवों से भरी हो। गांव की आवाज वहां पहुंचे, तभी कानून जीवित रहेगा।

 नाम नहीं, नतीजा
  आखिर में सवाल सरल है। क्या नया कानून गांव के जीवन में ठोस सुधार लाएगा। यदि 125 दिन सच में मिलेंगे, मजदूरी समय पर आएगी, और आजीविका बनेगी, तो नाम पीछे छूट जाएगा। यदि नहीं, तो सबसे सुंदर नाम भी बोझ लगेगा। नीति का धर्म परिणाम है, और राजनीति की परीक्षा भी वहीं होती है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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