📍नई दिल्ली 🗓️21 अक्टूबर 2025 ✍️आसिफ़ ख़ान
फर्स्ट एड काउंसिल ऑफ इंडिया ने देशभर में स्कूल स्तर से फर्स्ट एड एजुकेशन लागू करने का प्रस्ताव रखा है। संस्थापक डॉ. शबाब आलम का मानना है कि यह कदम भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में क्रांति ला सकता है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था लंबे समय से इलाज़ की महंगाई, डॉक्टरों की कमी और असमान सुविधाओं से जूझ रही है। लेकिन अब एक नया विचार सामने आया है — “हर बच्चा आधा डॉक्टर बने।”
यह विचार जितना अनोखा है, उतना ही दूरदर्शी भी।
फर्स्ट एड काउंसिल ऑफ इंडिया की पहल
फर्स्ट एड काउंसिल ऑफ इंडिया ने यह ऐलान किया है कि देशभर के स्कूलों में “फर्स्ट एड एजुकेशन डिपार्टमेंट” जोड़ा जाए। इसका मकसद है — हर बच्चे को बेसिक मेडिकल ज्ञान देना ताकि वो आपात स्थिति में मदद कर सके।
काउंसिल के फ़ाउंडर डॉ. शबाब आलम कहते हैं —
"भारत में 1 लाख लोगों पर सिर्फ़ 1 डॉक्टर है। लाखों गाँवों में लोग बिना इलाज के दम तोड़ देते हैं। अगर हर बच्चा फर्स्ट एड जान ले, तो समाज में एक नई मेडिकल सुरक्षा चेन बन सकती है।"
कोविड-19 ने सिखाया आत्मनिर्भर स्वास्थ्य का महत्व
महामारी ने दुनिया को झकझोर दिया। हज़ारों लोग अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ बैठे।
डॉ. आलम याद दिलाते हैं —
"कोरोना ने हमें बताया कि अब हर इंसान को फर्स्ट रिस्पॉन्डर बनना होगा। अगर बच्चों को शुरू से यह सिखाया जाए, तो वे न सिर्फ़ खुद को बल्कि अपने परिवार को भी बचा पाएँगे।"
यह बात सीधी है: जब सिस्टम बोझिल हो, तो समाधान नीचे से ऊपर आना चाहिए।
यही वह सोच है जो इस अभियान को अलग बनाती है।
12 वर्षीय रोडमैप: बदलाव की रूपरेखा
काउंसिल ने जो रोडमैप तैयार किया है, वह केवल शिक्षा नहीं, बल्कि मानवता की ट्रेनिंग है।
इसमें प्रमुख बिंदु शामिल हैं:
हर स्कूल में फर्स्ट एड एजुकेशन डिपार्टमेंट की स्थापना।
अनसर्टिफाइड प्रैक्टिस यानी झोलाछाप डॉक्टरों पर रोक।
मेडिकल एजुकेशन को सस्ता और सुलभ बनाना।
प्रमाणित फर्स्ट एड ट्रेनिंग के ज़रिए आम लोगों को प्रशिक्षित करना।
यह रोडमैप न सिर्फ़ हेल्थ सेक्टर में सुधार लाएगा, बल्कि सामाजिक ज़िम्मेदारी को भी मज़बूत करेगा।
हेल्थकेयर पर सवाल और सिस्टम की हकीकत
भारत में हेल्थकेयर का निजीकरण तेज़ी से बढ़ा है।
एमबीबीएस की फीस करोड़ों में पहुँच चुकी है, जिससे डॉक्टरी पेशा सेवा नहीं, व्यापार बन गया है।
डॉ. आलम का कहना है —
"जब तक मेडिकल शिक्षा सस्ती नहीं होगी, तब तक सस्ती स्वास्थ्य सुविधा आम लोगों तक नहीं पहुँचेगी।"
यह बयान सिर्फ़ आलोचना नहीं, बल्कि सवाल है उस सोच पर जो स्वास्थ्य को commodity बना चुकी है।
बदलती जीवनशैली और बढ़ती बीमारियाँ
आज मोबाइल, जंक फूड, देर रात की नींद और मानसिक तनाव ने शरीर को मशीन बना दिया है।
डॉ. आलम बताते हैं —
"अगर लोग सिर्फ़ सूर्यास्त के बाद खाना छोड़ दें, तो आधी बीमारियाँ खुद दूर हो जाएँगी।"
यह कथन सिर्फ़ परंपरा नहीं, बल्कि science of prevention है।
जब तक लोग अपनी दिनचर्या में सुधार नहीं करेंगे, अस्पतालों की भीड़ कम नहीं होगी।
भविष्य की तस्वीर: हर घर में एक हेल्थ गार्डियन
फर्स्ट एड काउंसिल ऑफ इंडिया का सपना है —
हर भारतीय बच्चा फर्स्ट एड में प्रशिक्षित हो, हर घर में एक हेल्थ गार्डियन हो।
यह वही मॉडल है जो जापान और फिनलैंड जैसे देशों में पहले से काम कर रहा है।
डॉ. आलम कहते हैं —
"हम बच्चों को सिर्फ़ पढ़ा नहीं रहे, उन्हें जागरूक नागरिक बना रहे हैं। जब शिक्षा मानवता से जुड़ेगी, तभी असली भारत बनेगा।"
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
यह विचार उत्कृष्ट है, पर सवाल यह है — क्या भारत का एजुकेशन सिस्टम इस बदलाव के लिए तैयार है?
क्या शिक्षकों को फर्स्ट एड सिखाने की ट्रेनिंग दी जाएगी?
क्या यह विषय परीक्षा के बोझ में खो नहीं जाएगा?
सुधार की शुरुआत इरादे से होती है, लेकिन सफलता क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
इसलिए सरकार, शिक्षण संस्थान और चिकित्सा समुदाय — सभी को मिलकर इस योजना को ज़मीनी हक़ीक़त में बदलना होगा।
मानवता और स्वास्थ्य का संगम
यह अभियान सिर्फ़ हेल्थ पॉलिसी नहीं, बल्कि एक मानवता आंदोलन है।
क्योंकि असली डॉक्टर वो नहीं जो डिग्री रखता है, बल्कि वो जो किसी की जान बचाने की समझ रखता है।
अगर भारत का हर बच्चा यह सीख लेता है, तो वह “आधा डॉक्टर” नहीं, बल्कि पूरा इंसान बनेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।