भारत-पाकिस्तान के दरमियान बढ़ते तनाव और अमेरिका की मध्यस्थता पर विवाद। क्या जंग का ख़तरा है या बातचीत से हल निकल सकता है?
साउथ एशिया का Geopolitical scenario हमेशा से ही Global Diplomacy का केंद्र रहा है। भारत और पाकिस्तान—दो पड़ोसी मुल्क जिनका इतिहास जंग, संघर्ष और कश्मीर के सवाल से गहराई तक जुड़ा है—आज फिर एक नए तनावपूर्ण दौर में प्रवेश कर चुके हैं। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार का हालिया बयान, जिसमें उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मध्यस्थता दावे को ख़ारिज किया, इस बहस को और गर्म कर गया है।
डार ने साफ़ कहा कि भारत ने कभी भी किसी तीसरे पक्ष की दख़लअंदाज़ी स्वीकार नहीं की है। यह वही पुराना रुख़ है जो भारत दशकों से दोहराता आ रहा है—कि भारत-पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दे द्विपक्षीय हैं और इन्हें किसी बाहरी ताक़त की भागीदारी के बिना ही हल किया जाना चाहिए।
मगर सवाल यह है कि मौजूदा तनाव, ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिका की कूटनीतिक कोशिशों के बीच भारत-पाक रिश्ते किस दिशा में बढ़ रहे हैं?
ट्रम्प ने दावा किया था कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य कार्रवाई रुकवाने में मध्यस्थता की। पाकिस्तान ने पहले इस दावे को हवा दी, लेकिन अब इशाक डार ने इसे नकार कर एक नई बहस छेड़ दी है।
भारत का रुख़ हमेशा से साफ़ रहा है: “नो थर्ड पार्टी, नो इंटरवेंशन।” शिमला समझौते (1972) से लेकर आज तक भारत का यही स्टैंड है कि बातचीत सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लामाबाद और नई दिल्ली के बीच होगी।
अमेरिका की भी पॉलिसी समय-समय पर बदलती रही है। कभी वह पाकिस्तान का “स्ट्रैटेजिक पार्टनर” बनकर सामने आता है, तो कभी भारत के साथ स्ट्रैटेजिक डिफेंस और ट्रेड एग्रीमेंट करता है।
ट्रम्प के बयान पर भारत ने चुप्पी साध ली, लेकिन पाकिस्तान की पॉलिटिक्स में यह मुद्दा आंतरिक बहस का केंद्र बन गया।
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भारत का मानना है कि तीसरे पक्ष को शामिल करने का मतलब है कि मसले को अंतर्राष्ट्रीयकरण देना। यह भारत की डिप्लोमेसी के ख़िलाफ़ जाता है।
शिमला समझौता (1972) और लाहौर डिक्लेरेशन (1999) दोनों यही कहते हैं कि भारत-पाक मुद्दे सिर्फ़ द्विपक्षीय हैं।
भारत को डर है कि अगर तीसरे पक्ष को जगह दी गई तो कश्मीर का मसला वैश्विक एजेंडा बन जाएगा।
यही वजह है कि चाहे वॉशिंगटन हो, बीजिंग या यूनाइटेड नेशन्स—भारत हमेशा “बिलेट्रलिज़्म” पर जोर देता है।
इशाक डार ने कहा कि पाकिस्तान बातचीत के लिए अब भी तैयार है, मगर बातचीत में कश्मीर, आतंकवाद और व्यापार सभी मुद्दे शामिल होने चाहिए।
पाकिस्तान की पॉलिटिकल ज़रूरतें साफ़ हैं:
कश्मीर एजेंडा को जिंदा रखना — पाकिस्तान की घरेलू पॉलिटिक्स के लिए यह सबसे बड़ा नैरेटिव है।
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को घेरना — पाकिस्तान हमेशा यह चाहता है कि ग्लोबल पावर उसकी तरफ़दारी करें।
आर्थिक दबाव से निकलना — IMF और वर्ल्ड बैंक के कर्ज़ में डूबा पाकिस्तान, शांति वार्ता को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए एक रास्ता बताता है।
लेकिन भारत की तरफ़ से सबसे बड़ा अड़ंगा है “क्रॉस-बॉर्डर टेररिज़्म।” जब तक आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक दिल्ली बातचीत को बेनतीजा मानती है।
भारत-पाक रिश्तों पर दुनिया की बड़ी ताक़तें हमेशा से नज़र रखती आई हैं।
अमेरिका: एक समय पाकिस्तान का मुख्य सहयोगी, अब भारत के साथ रक्षा और व्यापार साझेदारी में गहरे रिश्ते।
चीन: पाकिस्तान का “आयरन ब्रदर,” CPEC प्रोजेक्ट का संरक्षक, मगर भारत के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा अलग तनाव पैदा करती है।
रूस: पारंपरिक रूप से भारत का दोस्त, लेकिन अब पाकिस्तान को भी हथियार सप्लाई कर रहा है।
अरब देश: पहले पाकिस्तान के साथ थे, अब भारत के बड़े आर्थिक साझेदार।
यूरोपियन यूनियन और UN: शांति की अपील करते हैं, मगर असर नगण्य।
भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न मुल्क हैं। किसी भी जंग का मतलब होगा:
लाखों जानें ख़तरे में
अरबों डॉलर की आर्थिक बर्बादी
क्षेत्रीय अस्थिरता
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर असर
यानी युद्ध का विकल्प सिर्फ़ विनाशकारी है।
भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में मीडिया अक्सर युद्धोन्माद को हवा देता है। टीवी डिबेट्स, सोशल मीडिया कैंपेन और राजनीतिक बयानबाज़ी माहौल को और बिगाड़ते हैं।
मगर हक़ीक़त यह है कि दोनों तरफ़ आम लोग शांति चाहते हैं। सोशल मीडिया पर भी शांति की आवाज़ लगातार सुनाई देती है—“जंग नहीं, अमन चाहिए।”
ट्रैक-टू डिप्लोमेसी — बैकचैनल बातचीत ज़रूरी।
ट्रेड और कल्चरल एक्सचेंज — रिश्तों को सामान्य करने का जरिया।
टेररिज़्म पर ऐक्शन — भारत की सबसे बड़ी शर्त।
ग्लोबल सपोर्ट — अमेरिका, रूस और चीन को स्थिरता में दिलचस्पी है।
भारत-पाकिस्तान रिश्ते सिर्फ़ दो देशों का मसला नहीं हैं, बल्कि पूरे एशिया और ग्लोबल पॉलिटिक्स को प्रभावित करते हैं। जंग दोनों मुल्कों के लिए आत्मघाती साबित होगी।
इशाक डार का बयान और ट्रम्प के दावे ने यह साफ़ कर दिया है कि बातचीत का रास्ता आसान नहीं, मगर ज़रूरी है। भारत अपनी पॉलिसी पर अडिग है—द्विपक्षीय बातचीत और आतंकवाद पर ज़ीरो टॉलरेंस। पाकिस्तान अपनी आंतरिक और बाहरी पॉलिटिक्स में बातचीत को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा है।
अंततः यही कहा जा सकता है:
“जंग से नहीं, डायलॉग से हल निकलेगा।”
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।