जौनसार की लोक गायिका कृपा रांटा को फोक आर्ट में योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट सम्मान मिला। उन्होंने सम्मान का श्रेय परिवार, दिवंगत पिता और गुरुजनों को दिया।
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मथुरा / चकराता, उत्तराखंड
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अक्टूबर 2026
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Wasi Siddiqui
जौनसार की लोक आवाज को सम्मान
चकराता। जौनसार-बावर की लोक संस्कृति, परंपराओं और लोक विरासत को अपनी आवाज के जरिए व्यापक पहचान दिलाने वाली लोक गायिका कृपा रांटा को लोक कला और फोक आर्ट के क्षेत्र में योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट सम्मान दिए जाने की जानकारी सामने आई है। यह सम्मान कोलंबिया पैसिफिक ग्लोबल ऑनर्स काउंसिल की ओर से प्रदान किए जाने की बात कही गई है।
परिषद अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर मानद डॉक्टरेट को सामाजिक, सांस्कृतिक, कलात्मक और अन्य उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाने वाले सम्मान के रूप में बताती है।
मथुरा में हुआ सम्मान समारोह
उपलब्ध जानकारी के अनुसार मथुरा में आयोजित दीक्षांत समारोह में अलग-अलग क्षेत्रों में योगदान देने वाली करीब 10 विभूतियों को मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया। इसी क्रम में फोक आर्ट के क्षेत्र में कृपा रांटा को सम्मान प्रदान किए जाने की जानकारी है।
हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में इस विशेष समारोह की विस्तृत आधिकारिक सूची स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं मिली है। इसलिए समारोह से जुड़े विवरण को उपलब्ध सूचना के आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
जौनसारी लोक संस्कृति से जुड़ी पहचान
कृपा रांटा लंबे समय से जौनसारी, जौनपुरी और उत्तराखंडी लोकगीतों के माध्यम से पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को सामने रखने का कार्य कर रही हैं। उनकी गायकी में स्थानीय लोक परंपराओं, यमुना घाटी की आस्था और जौनसार-बावर की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े तत्व दिखाई देते हैं।
लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं। पहाड़ी समाज में इनके जरिए स्थानीय इतिहास, सामाजिक परंपराएं, धार्मिक आस्था और सामुदायिक जीवन की स्मृतियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। ऐसे में लोक कलाकारों की भूमिका सांस्कृतिक संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सम्मान को परिवार और गुरुजनों को समर्पित किया
सम्मान प्राप्त करने के बाद कृपा रांटा ने इसे अपने परिवार और स्वर्गीय पिता के आशीर्वाद का परिणाम बताया। उन्होंने अपनी उपलब्धि का श्रेय संस्कृति गुरु डॉ. नंदलाल भारती, लोक गायिका मीना राणा, खत मशक के स्याणा फतेह सिंह सहित अपने गुरुजनों, सहयोगियों और शुभचिंतकों को दिया।
उनके इस बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि वह अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि को व्यापक सांस्कृतिक परंपरा और अपने मार्गदर्शकों के योगदान से जोड़कर देखती हैं।
जौनसार-बावर की सांस्कृतिक पहचान
जौनसार-बावर उत्तराखंड का ऐसा क्षेत्र है, जिसकी अपनी विशिष्ट लोक परंपराएं, बोली, संगीत और सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत है। यहां के लोकगीतों में स्थानीय जीवन, कृषि, पर्व, आस्था और सामाजिक संबंधों की झलक मिलती है।
कृपा रांटा का काम इसी लोक परंपरा को गीत-संगीत के मंच के जरिए आगे बढ़ाने से जुड़ा है। उनके लिए यह सम्मान व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।
लोक कला और नई पीढ़ी
लोक संस्कृति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में बदलती जीवनशैली, नई मनोरंजन संस्कृति और पारंपरिक कलाओं के लिए घटता मंच शामिल हैं। ऐसे माहौल में युवा कलाकारों का लोक संगीत से जुड़ना सांस्कृतिक निरंतरता के लिहाज से अहम है।
कृपा रांटा को मिला सम्मान इस संदर्भ में क्षेत्र की युवा पीढ़ी के लिए भी चर्चा का विषय बना है। खास तौर पर बेटियों और युवा महिला कलाकारों के लिए यह संदेश देता है कि स्थानीय भाषा, लोकगीत और सांस्कृतिक विरासत को पेशेवर पहचान का आधार बनाया जा सकता है।
यमुना वैली संगम संगठन ने दी बधाई
कृपा रांटा की उपलब्धि पर यमुना वैली संगम संगठन, डाकपत्थर की ओर से हर्ष व्यक्त किए जाने की जानकारी है। संगठन ने उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दीं।
संगठन के अनुसार यह सम्मान केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि जौनसार-बावर और उत्तराखंड की लोक संस्कृति से जुड़ी उपलब्धि है। संगठन ने इसे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय बताया।
सम्मान का सांस्कृतिक महत्व
मानद डॉक्टरेट एक अकादमिक शोध डिग्री से अलग प्रकार का सम्मान है। परिषद के अनुसार ऐसी मानद उपाधियां किसी व्यक्ति के सामाजिक, सांस्कृतिक, कलात्मक या अन्य उल्लेखनीय योगदान की मान्यता के तौर पर प्रदान की जाती हैं।
इसलिए कृपा रांटा को मिला सम्मान उनके लोक कला क्षेत्र में योगदान की मान्यता के रूप में देखा जाना चाहिए, इसे औपचारिक शैक्षणिक डॉक्टरेट के समान नहीं माना जाना चाहिए।
आगे की राह
कृपा रांटा की उपलब्धि के बाद जौनसार-बावर की लोक संस्कृति को नए मंचों पर पेश करने की उम्मीद भी जुड़ती है। लोक कलाकारों के सामने अब चुनौती केवल पारंपरिक गीतों को संरक्षित करने की नहीं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी और नए श्रोताओं तक पहुंचाने की भी है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म, लाइव सांस्कृतिक कार्यक्रम और नई संगीत प्रस्तुति शैली लोक विरासत को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने के अहम माध्यम बन रहे हैं। ऐसे में क्षेत्रीय कलाकारों की भूमिका और बढ़ती है।
कृपा रांटा को लोक कला के क्षेत्र में मानद डॉक्टरेट सम्मान दिए जाने की जानकारी जौनसार-बावर की सांस्कृतिक दुनिया के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनकी गायकी के जरिए जौनसारी और उत्तराखंडी लोक परंपराओं को मंच मिलता रहा है।
सम्मान की वास्तविक अहमियत इस बात में है कि स्थानीय लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने वाले कलाकारों के योगदान पर सार्वजनिक विमर्श बढ़े। जौनसार की लोक आवाज को मिले इस सम्मान ने एक बार फिर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।