SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद विपक्षी दल CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने आंतरिक टिप्पणियों को सामान्य प्रक्रिया बताया है। अप्रैल में 73 राज्यसभा सांसदों ने भी नोटिस दिया था।
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नई दिल्ली | 24 सितंबर 2026 | अपूर्वा चौधरी
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष की नई तैयारी
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर विपक्षी दल संसद के दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। 24 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक संयुक्त विपक्ष की ओर से प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और उसे कानूनी विशेषज्ञों से जांच कराने के बाद लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस दिए जाने की योजना है।
यह घटनाक्रम चुनाव आयोग में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े फैसलों और आंतरिक टिप्पणियों को लेकर उठे राजनीतिक विवाद के बीच सामने आया है। हालांकि अभी यह केवल प्रस्ताव लाने की तैयारी है। ज्ञानेश कुमार पद पर बने हुए हैं और संसद ने उनके हटाए जाने का कोई फैसला नहीं किया है।
एसआईआर को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि क्या है?
विवाद की पृष्ठभूमि में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव, मतदाता नामों को जोड़ने, हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार कुछ आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी और प्रशासनिक फैसलों से जुड़ी थीं। इनमें मतदाता सूची के केंद्रीयकृत प्रबंधन और चुनावी डेटा से संबंधित डिजिटल प्रणालियों को लेकर भी सवाल उठाए जाने की बात कही गई।
इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका पर सवाल उठाए तथा ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसदीय कार्रवाई की मांग तेज की।
चुनाव आयोग ने रिपोर्ट पर क्या कहा?
चुनाव आयोग ने इन घटनाक्रमों को अलग तरीके से प्रस्तुत किया है। 23 सितंबर को जारी अपने बयान में आयोग ने कहा कि किसी बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव, सवाल और अलग-अलग विचार निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा होते हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अंतिम फैसले पूर्ण आयोग की मंजूरी के साथ लिए जाते हैं।
आयोग के अनुसार, एसआईआर समेत पिछले एक साल में लिए गए फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम रहे हैं। आयोग ने यह भी कहा कि केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों पर ध्यान देने से पूरी निर्णय प्रक्रिया की तस्वीर सामने नहीं आती।
चुनाव आयोग ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म और मतदाता डेटा से जुड़े सिस्टम के संबंध में भी सुरक्षा प्रोटोकॉल का हवाला दिया। आयोग का कहना है कि उसके डिजिटल सिस्टम में अनधिकृत छेड़छाड़ और हेरफेर रोकने के लिए सुरक्षा जांच और ऑडिट व्यवस्था मौजूद है।
इसलिए उपलब्ध जानकारी में दो अलग-अलग पक्ष सामने आते हैं। एक ओर मीडिया रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की दर्ज आपत्तियों का विवरण है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग इन टिप्पणियों को संस्थागत deliberation और internal checks-and-balances का हिस्सा बता रहा है।
विपक्ष अब क्या करने की तैयारी में है?
24 सितंबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार विपक्षी दल दोनों सदनों में नया Removal Motion लाने की तैयारी कर रहे हैं। प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने और उसे कानूनी विशेषज्ञों से vet कराने की बात कही गई है। रिपोर्टों के मुताबिक INDIA ब्लॉक के सहयोगी दल इस प्रयास में साथ काम कर रहे हैं।
कांग्रेस सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार नोटिस अगले कुछ दिनों या अगले सप्ताह तक पेश किए जाने की संभावना बताई गई है। हालांकि अंतिम तारीख और प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले सांसदों की संख्या इस समय निश्चित रूप से सार्वजनिक नहीं हुई है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी राजनीतिक दल या गठबंधन द्वारा प्रस्ताव लाने की घोषणा अपने आप में CEC को हटाने का निर्णय नहीं होती। संसदीय नोटिस को स्वीकार किया जाना, उसके बाद निर्धारित जांच और दोनों सदनों की संवैधानिक प्रक्रिया अलग-अलग चरण हैं।
अप्रैल में भी दिया गया था नोटिस
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ यह पहली संसदीय कोशिश नहीं है। 24 अप्रैल 2026 को 73 विपक्षी राज्यसभा सांसदों ने उनके हटाने की मांग वाला नोटिस राज्यसभा में दिया था। उस नोटिस में संविधान के अनुच्छेद 324(5) समेत संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लेख किया गया था।
रिपोर्टों के अनुसार इससे पहले मार्च में भी दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने का प्रयास हुआ था, जिसे संबंधित पीठासीन अधिकारियों ने स्वीकार नहीं किया। अप्रैल का राज्यसभा नोटिस अलग प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया गया था और 24 सितंबर की रिपोर्टों में इसे लंबित नोटिस के रूप में भी संदर्भित किया गया है।
इस पृष्ठभूमि में अब प्रस्तावित नया नोटिस विपक्ष की ओर से CEC के खिलाफ संसदीय कार्रवाई की एक और कोशिश होगी।
CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सामान्य सरकारी पद से अलग है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों और प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act की धारा 11 भी स्पष्ट करती है कि CEC को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान तरीके और समान आधारों पर ही हटाया जा सकता है। अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए व्यवस्था अलग है और उन्हें CEC की सिफारिश के आधार पर हटाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के लिए संविधान के अनुच्छेद 124(4) में removal का आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता बताया गया है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के कारण CEC के खिलाफ प्रस्ताव केवल राजनीतिक असहमति के आधार पर स्वतः हटाने का आदेश नहीं बन जाता; निर्धारित संसदीय प्रक्रिया आगे बढ़ना आवश्यक होता है।
प्रस्ताव के लिए कितने सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए?
हटाने की प्रक्रिया में प्रारंभिक नोटिस के लिए भी न्यूनतम सांसदों का समर्थन आवश्यक है। Judges (Inquiry) Act, 1968 की धारा 3 के अनुसार लोकसभा में ऐसा नोटिस कम से कम 100 सदस्यों और राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर के साथ दिया जाना चाहिए। इसके बाद संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति के पास प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होता है।
यदि प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है, तो जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है। कानून में समिति की संरचना में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, हाईकोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता को शामिल करने का प्रावधान है।
जांच के दौरान आरोपों को निश्चित रूप में तैयार किया जाता है और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाता है। समिति अपनी जांच पूरी करने के बाद रिपोर्ट संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी के समक्ष रखती है।
अंतिम हटाने के लिए क्या जरूरी है?
यदि जांच के बाद हटाने के आधारों की पुष्टि होती है, तो मामला संसद के दोनों सदनों में आगे बढ़ता है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार हटाने के लिए प्रत्येक सदन में प्रस्ताव को उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
इसके बाद दोनों सदनों से आवश्यक संवैधानिक समर्थन मिलने पर राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश जारी किया जाता है। इसलिए केवल नोटिस देना या किसी सदन में चर्चा शुरू होना CEC के पद से हटने के बराबर नहीं है।
अभी ज्ञानेश कुमार की स्थिति क्या है?
24 सितंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर बने हुए हैं। विपक्ष नए प्रस्ताव की तैयारी कर रहा है, लेकिन प्रस्ताव का मसौदा, आवश्यक हस्ताक्षर, संबंधित सदन में उसका स्वीकार होना और उसके बाद की जांच व संसदीय प्रक्रिया अभी अलग-अलग चरणों में हैं।
इसी वजह से इस घटनाक्रम को फिलहाल CEC को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की विपक्षी तैयारी के रूप में देखना अधिक सटीक है, न कि CEC को हटाए जाने के निर्णय के रूप में।
राजनीतिक आरोप और संस्थागत जवाब को अलग-अलग देखना जरूरी
इस पूरे विवाद में विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने कहा है कि अलग-अलग टिप्पणियां और आंतरिक सुझाव किसी बहु-सदस्यीय संस्था की deliberative process का हिस्सा हैं और अंतिम फैसले आयोग की सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।
इसलिए फिलहाल उपलब्ध तथ्यों में राजनीतिक दावों, मीडिया रिपोर्ट में सामने आए आंतरिक दस्तावेजों और चुनाव आयोग के आधिकारिक जवाब को अलग-अलग दर्ज करना जरूरी है। प्रस्तावित संसदीय कार्रवाई का आगे क्या परिणाम होगा, यह संबंधित सदनों में नोटिस की स्वीकार्यता, संभावित जांच और बाद की संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।